रंगनाथ रामायण

[ राजा गोनबुद्ध-रचित मूल तेलगू से अन॒दित ]

ऋचुक/द्क

श्री ए०,सी० कामसाक्षि राव संग्पादुक श्रीअवधनन्दन

हार-राष्ट्रमाषा-परिषद

पठना

प्रकार्णेक बिहार-राष्ट्रभाषा-परिपद पटना

सर्वस्वत्वाधिकार प्रकाशकाधीन १८८२ शकाब्द; २०१७ विक्रमाव्द; १९६१ खुध्टाब्द सजिल्द मृल्य ६. ४०

मुद्रक बेदी साधज प्रेस रांची

वक्तव्य

प्रस्तुत ग्रथ' 'रगनाथ रामायण” को पाठकों के सम्मुख उपस्थित करते हुए हमें बडा हर्ष हो रहा है परिषद्‌ का मूल उद्देश्य जहाँ अधिकारी विद्वानों द्वारा मौलिक प्रथों का प्रणयणन कराकर प्रकाशित करना रहा है, वहाँ देश और विदेश की समृद्ध भाषाओ के उत्कृष्ट ग्रथो का हिन्दी-अतुवाद कराकर उनके प्रकाशनो से हिन्दी-साहित्य की समृद्धि में योगदान भी रहा है इस प्रकार, परिषद्‌ से अवतक जर्मन भाषा से रिचर्ड पिशल-लिखित 'प्राकृत भाषाओं का व्याकरण” तथा फ्रच भाषा से मारिस मेटर- लिक-रचित नाटक 'तीलपर्छ/ के अनुवाद प्रकाशित हो चुके हें इन दोनो के अतिरिक्त सस्कृत-साहित्य से काव्यमीमासा' तथा कथासरित्सागर' (प्रथम खड ) के अनुवाद मूल सस्क्ृत के साथ भी परिषद्‌-द्वारा प्रकाशित हुए है। 'कथासरित्सागर का दूसरा खण्ड इसी साल प्रकाणित होनेवाला है और उसके अन्तिम खण्ड का अनुवाद-कार्य सम्पन्न हो रहा है पाइचात्य भाषाओं के साहित्य के अलावा परिषद्‌ ने सविधान द्वारा स्वीकृत चौदह भाषाओ और उनके साहित्य पर परिचयात्मक निवन्ध उन-उने भाषाओं के अधि- कारी विद्वानों से लिखवाकर, उनके सगम्रह के रूप में चतुर्देश भाषा-निवन्धावली' प्रकाशित क्री है तदुपरान्त भारत की प्रमुख लोकभाषाओ में से पन्द्रह लोकभाषाओ और उनके साहित्य पर निवन्‍्ध लिखवाकर पचदश लोकभापा-निवन्धावली' नाम का सग्रह प्रकाशित कियः हुँ। उपर्थक्त पुस्तकों का हिन्दी-ससार में अच्छा स्वागत हुआ--यह हमारे लिए प्रसन्नता की बात हैं

किन्तु, भारतीय भाषाओं के साहित्य से अनुवाद द्वारा हिन्दी-भाण्डार को भरने की दिशा में परिषद्‌ ने सकल्प किया था कि सर्वप्रथम दक्षिण भारत की चार--तमिल, तेलुगु, कन्‍्तड और मलयालम--भाषाओ के साहित्य से एक-एक ग्रय॒ चुनकर अनूदित कराया जाय। तदनुसार ही तमिल' और तेलुगु के एक-एक ग्रथ॒ और उसके अनुवादक का चुनाव किया गया और अनुवाद के काम सौपे भये। इस योजना में हमें तेलुगु की 'रग- नाथ रामायण' के अनुवाद की पाण्डुलिपि सबसे पहले प्राप्त हुई और आज हम उसी रामायण को आपके सामने उपस्थित करने में समर्थ हो सके हैँ हमें प्रसन्नता हैं कि इसके बाद ही हम तमिल का 'कब रामायण' का हिन्दी-अनुवाद भी यथाज्षीघ्र प्रकाशित कर हिन्दी-ससार के सामने रख सकेंगे।

मूल रगनाथ रामायण” के सौष्ठद के सम्बन् में मं [स-विश्वविद्यालय के विद्वानू गैडर तथा तेलुगु-विभाग के अध्यक्ष श्रीनिडदवोलु वेंकट राव ने अपने परिचय में जो उद्गार प्रकट किये हे, वे इसी ग्रथ में अन्यत्र देखने को मिलेंगे फिर, इस ग्रथ के अनुवादक श्री ए० सी० कामाक्षि राव ने भी, अपनी भूमिका में, तेलुगु-साहित्य का विवेचन करते हुए इस ग्रथ की महत्ता पर जो कुछ प्रकाश ड़ाला है, वह अलम्‌ है उसके बाद इस

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पम्बन्ध में और कुछ लिखना पिप्टयेषण ही होगा। हम तो कवल इतना ही कहग कि दक्षिण भारत के प्राचीन एवं मूर्वन्य साहित्य की गरिमा एव्र आभा से हिन्दी-साहित्य के भाण्डार के भरने की दिग्षा में हमारा यह विनम्र अनुप्ठान नगण्य समझा जायगा।

इस अवसर पर हम सबसे पहले श्री म० सत्यनारायण को साथुवाद दिये विना नहीं रह सकते कि उन्होने परिषद्‌ को इस दिग्या में अपने विचार और सुझाव दकर अत्यधिक उत्साहित किया है प्रारभ में हमें उनका सहयोग प्राप्त होता, तो शायद हम -इस ग्रंथ को तना शीघ्र प्रकाण में ला सकते साथ ही हम दक्षिण भारत के गाँवनगाँव में हिन्दी की घूनी रमानेवाले श्रीअवधनन्दनजी के कृपापूर्ण सहयोग और साहाय्य को शब्दों में वाँवना नही चाहते इसम रचमात्र भी अत्युक्ति नहीं कि उनके प्रयत्त का ही यह परिणाम हैं कि हम इस अनुवाद को हिन्दी-जगत्‌ के सामने ला सके हें। उन्होने अनुवादक से सारी पाण्डुलिपि प्राप्त कर पढ जाने की कृपा की, साथ ही सम्पादन भी यथासाध्य किया। निसकोच रूप से हम यह कह सकते हें कि इस कार्य में साहित्य के प्रति उनका अदम्य उत्साह और परम पवित्र निप्ठा गौरव एवं ध््प्या की वस्तु है हम श्रीनिडदवोलू वेंकट राव के प्रति अतिशय क्ृतज्ञ हें कि उनका परिचय हमें इस ग्रथ के लिए उपलब्ध हो सका अनुवादक और सम्पादक के साथ-साथ हम उनका भी आभार स्वीकार करते हे, जिनका साहाय्य हमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राप्त हो सका हूँ

आजा हैँ, सुधी पाठकों को रमनाथ रामायण के अनुशीलन से प्रसन्नता होगी और वे देंख सकेंगे कि वाल्मीकि रामायण एवं तुलसीदास के रामचरितमानस से यह किन- किन वातो में एक और किन-किन वातों में भिन्न है, और यह अनुभव करेंगे कि भाषा और वेश-भूषा की भिन्नता होते हुए भी हमारे सम्पूर्ण देश की मूल सस्कृृति किस प्रकार सर्ववा एक, अभिन्न अखण्ड हैँ |

७-२-६१ मुवनेश्वरनाथ मिश्र माधव सचालक

प्रस्चिय

तेल्गु-साहित्य में राम-कथा को अग्रस्थान प्राप्त हुना हूं; और आज तेलुगु में रामकथा से सत्रधित रचनाओ की संख्या लगभग तीन-चार सौ तक हूँ। पुराण, प्रवध, द्विपद, शतक, वचन, यक्षगान, दंडक, पद, गोत एवं सकीत्तंन--मतरूव यह कि आज तल्गु में महाकाव्य जैसे शास्त्रीय रूप से अपढ़ प्रामीण जनता के द्वारा गाये जानेवाले लोकगोौतो तक में रासकथा उपलब्ध हूँ साहित्य-रचना के रूप में रामकथा-साहित्य का प्रारंभ तेरहवीं सदी में हुआ और उस समय से उस साहित्य की उत्तरोत्तर उन्नति होती गई इस साहित्य को प्रेरणा देवेवालो में भव्राचलूम सें विराजमान श्रीरामचद्ध के अनन्यभवत रामदास तथा अमरगायक भ्रक्‍त त्यागय्या सर्वश्रेष्ठ हेँ।

तेलगु-साहित्य फे सभी युगो में रामकथा विशेष आकर्षण की वरतु रही है। भआाज भी जब तेलगु-साहित्य में भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ जन्म ले चुकी है और जन्म ले रही है, तेलुगु-नाषा के कई प्रसिद्ध आधुनिक कवियो ने रासकथा को श्ञास्त्रीय पद्धति पर लिखा है और आज भी कुछ कवि इस कथा फो लिखने में लगे हें। यह इस बात को प्रमाणित करता हूँ कि राम-भक्ति तेलगु-जनता के हृदय को ही नहीं, बत्कि उनकी प्रतिभा पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ चुकी हूँ। प्राच्य तथा प्रतीच्य विद्वन्‌ू रमत्ूण फा अध्ययन आधुनिक ढग से करने लूगे हें। अतएवं आधुनिक विचार एवं सास्कृतिक परिपाइव की दृष्टि से इस सहाकाव्य की व्याख्या करना आवश्यक हूँ चूंकि दक्षिण की भाषाओं में भो संस्कृत-रामायण को कथा अनुवादों के रूप में अथवा मौलिक रचना के रूप में गई है, हमें विचार करना होगा कि आय एवं आरयेतर सरकृतियो का समन्वय करने में रामायण का क्या स्थान हुँ और रामायण भारत की सामासिक सस्कृति का प्रतीक फैसे बनी हुई हू आदि

'रंगनाथ रामायण' एक द्विपद-काव्य है, जो तेलुगू की रामकथा-सबधी क्ृतियो में अत्यंत्त लोकप्रिय हूँ उसकी सरल, शुद्ध तथा प्रवाहमयी देशी शेल्ली ने पडित एव पामर दोनो को समान रूप से आऊक्रृप्ट किया है। इस कथा के कुछ भाग 'तोलुवोम्म लाटा (एक विशेष प्रकार कीं पुतलियों का नृत्य) जैसी लोक-क्ला फः कार्य त्रमो में भी गाये जाते हूं और यह इस बात को स्पष्ट करता है कि कवि रास की अमर-पथा को तेल्ग्‌-हृदय तक पहुंचाने में किस प्रकार सफल हुए हूँ

चूंकि इस कृति का नाम रंगनाथ रामायण है, सहज ही यह भ्रम हो जाता है कि इसका कवि 'रगनाथ” नामक कोई व्यक्ति रहा होगा किन्तु, इस विषय पर

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जो झोवष-कार्य हुआ है, उससे यह प्रमाणित हो गया हूं कि तेरहवीं सदी में बूदपुर (ऐतिहासिक बोबान नगर) के आसपास राज करनेवाले सूर्यवंत्ी राजा विदृठलराजु के क्षादेशानुसार उनके पुत्र गोनवुद्ध राजा से इसकी रचना की इसका उल्लेख कवि स्वयं काव्य के प्रारंभ सें कर चुके हे। प्रकाशित एवं अप्रकाशित शिलालेखों के आधार पर यह प्रमाणित हो चुका है कि इस काव्य की रचना रूगनग १३८० ई० में हुई थी 'रंगनाव रामावर्णा की विज्ञेपता यह है कि उसकी रचना उस समय तक जनता में प्रचलित राम-कथा के आवार पर हुई हैँ, जो संस्छृत-रामायण से कई स्थानों में भिन्न हे यद्यपि, रामायण आर्यावरत्त या उत्तराप्य के राजा राम की क्‍या है, तथापि वह परंपरायत लोक-क््याओो के रूप में सारे दक्षिण में अति प्राचीच काल से व्याप्त थी।

अब यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो चुका हुँ कि दक्षिण की भाषाएँ, तमिल, तडुगु, कन्नड और महूयालम--जो संस्कृत भाषा-परिवार से सर्वया भिन्न परिवार की हूँ -- अपनी प्रारंभिक अवस्था में संस्छृत से कसी प्रकार का संबंध नहीं रखतो थीं। ऐसी दक्षा में यह बाद्या नहीं की जा सक्रती कि इन भाषाओों के दोलनेवाले वाल्मीकि रामायण की मूलकथया का ज्ञान प्राप्त करें उन्होने स्वृलठ रूप में कया को ग्रहण किया होगा बीौर सिश्च-भिन्न व्यक्तियों ने भिन्न-भिन्न युगो में उतत कथा का अपने ढंग से मोड़- तोड़कर प्रचार क्या होगा। यह कोई जआाइचय नहीं, यदि घर-घर में इस क्या का प्रचार हो गया हो और उत्सुक वालक्न-वालिकाओं के मनोरंजन के लिए तथा उनमें राम तथा उनकी पत्नी चीता के आदर्श जीवन में प्रतिविवित आवे-धर्म को प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से घर के बड़े-बूढ़े, रामायण के इतिवृत्त का छोटी-छोटी कहानियो के रूप में प्रसार किया हो हमारे यहाँ ऐसी प्रवा रही भी है। महाकवि कालिदास अपने मेघदूत में कहते हूँ कि कौश्ांदी नगर में ब्रामवृद्ध अपने पोते-पोतियों को उदयन की कथा सनातें थे स्वयं कालिदास-छत रघुव॑ंश में वर्णित राम-कबा कुछ स्थावों में मूलकया से भिन्नता रखती हूँ

राम की कवा त्रेतायुग की होने के कारण उदयन की कथा से भी अधिक प्राचीन है ओर कदाचित्‌ उसने द्वाविड़ों के हृदय एवं प्रतिभा पर अमिद प्रभाव डाला होगा इसका एक कारण यह भी हो सकता हैँ कि रामायण के द्वो प्रधान पात्रों में रावण दक्षिय का था। हूंका का राज्य, राम के विजय प्राप्त करने के पहचात्‌ भी बना रहा जौर विभोषण उसका पारूतन करता रहा। आवुनिक युग की भाँति यदि राम भी रूंका को जीतने के पढचात्‌ अपने फिसो भाई को अपनी तरफ से रूंका का राज्य चलाने के लिए नियुक्त करते, तो कदाचित्‌ दक्षिणापव्र का इतिहास कुछ बातो में भिन्न होता

तेलाए-भाषा तमिल के मुकाबले में प्राचीन होने पर भी कुछ हु॒द तक प्राचीन हो कही जा सकतो हूं; उस भापा के बोलनेवालो में बहुत समय तक वाल्मीकि रामायण को बवेक्षा छोक-कृयाओं के द्वारा प्रचलित राम-क्या का ही आदर होता रहा ऋमशः तेचुगु-नायानायो संस्कृत के प्रति आहृष्ट हुए और उस भाषा के परकांड पंडित बन गयें। “रंगवाव रामायर्णा बौर “भास्कर रामायर्णा के कवि संस्कृत के महान्‌ पंडित थे और

( हद )

उन्होंने अपनी क्ृतियों में स्पष्ट कहा भी हूँ कि उनकी कृतियाँ वाल्मीकि रामायण को आधार मानकर चलती हे। फिर भी, वे जनता के बीच प्रचलित रामकथा की सर्वथा उपेक्षा नहीं कर सके

कहा जाता है कि सन्‌ १३१० ई० में कवित्रया के प्रसिद्ध कवि एरंना से मूल संस्कृत-रामायण का सही अनुवाद तेलगु-पद्य में लिखा था। खेद है कि वह रचना आज हमें अप्राप्त है--केवल उसके कुछ एक पद्च तेलुगु के एक लक्षण-प्रन्थ में हमें मिलते हें। एर्रना के पश्चात्‌ सन्‌ १८६० ई० तक किसी और कवि ने वाल्मीकि रामायण का सही-सही अनुवाद तेलूयु में प्रस्तुत नहीं किया सन्‌ १८६० ई० में गोपीनाथ वेंकट कवि ने संस्कृत-रामायण का सही अनुवाद तंलगु-पत्य में प्रस्तुत किया उसके पद्चात््‌ कितने ही कवियों ने अपनो प्रतिभा के अनुसार सस्क्ृत-रामायण का अनुवाद किया।

कहने का तात्पयं यह है कि १८६० ई० तक रास क्वी कथा पर जो काव्य लिखे गये, उनपर लोक-कथाओ का ही अत्यधिक प्रभाव रहा।

आज के शूभ समय में, जबकि भारत की विभिन्न सस्कृतियों में आदान-प्रदान का कार्य प्रारम हो गया है, यह अत्यंत हुं की बात हूँ कि दक्षिण के एक सुयोग्य तथा हिन्दी-तेल्गु-भाषाओ के निपुण विद्वान्‌ श्री ए० सी० कामाक्षि राव ने, तेलगु क्री अत्यत लोकप्रिय द्विपद रामायण का अनुवाद राष्ट्रभाषा हिप्दी के गद्य में किया है, जिससे वह भारत के सभी साहित्यों तक पहुँच सके

तेलुगु की 'रंगनाथ रामायण अपने इतिवृत्त, भाव, कला एवं शैली के कारण तीन करोड़ तेलयू-भाषाभाषियों के हृदय में राम-भक्ति को जायरित करने में सफलता प्राप्त कर चुकी है यदि उसका हिन्दी-अनुवाद आसेतुहिमाचछल व्याप्त चालीस करोड़ भारतवासियो के हुदयो में राम-भक्ति जागरित करनेवाली प्रबल दवित का स्रोत बन सके, तो आइचर्य नहीं करना चाहिएं। जयहिन्द ।'

त्ा० ८, शाके १८८२ विद्यारत्न निडद्वोलु वैंकट राव, एम्‌० ए० चैन्न, सोमवार रीडर तथा तेल्गु-विभाग के अध्यक्ष श्प-रे-६० ई० सद्रास-विश्वविद्यालय

१. आन्ध्र महाभारत' तीन प्रसिंद्ध कवि नन्नैया, तिककना और एरंना कवित्रया के नाम से विख्यात हेँ। प्रस्तुत परिचय मूल अगरेजी लेख से अनूदित

नस्तावना

[ ३९

लेलए-थ/क/-विदेशी पडितो के द्वारा 'इटालियन ऑफ दि ईस्ट' (पवार छाल ए०50 कही जानवाली तलगु-भाषा, द्राविड़-भाषा-परिवार क्ली समृद्ध एवं साहित्य-सपन्न भाषा है वैसे तो इसके तीव नाम हे--तेल्‌गु, तेनुगू, आंध्रमु; किन्तु तेलगृ' शब्द का ही अधिकाधिक प्रयोग होता हे आंध्र शब्द पहले जाति-परक था, किन्तु बाद को वह देश- परक हुआ और निदान आपछ्रदेश क्ली भाषा आप्रमु' कहलाई। तेलगू अजंत भाषा हे--- प्रायः इसके सभी शब्द स्वरांत और विशेष रूप से उकारात होते हे। (उदा०-सतोषमु, साहसमु, नीनु, नेनु आदि)। अत., यह भाषा अधिक सगीतभय होने की क्षमता रखती हूँ। फदाचित्‌ इसी कारण से विदेशी विद्वानों ने इसे पूर्व की इटालियन भाषा कहा होगा

इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी समय आंध्र-साम्राज्य उत्तर में पाठलि- पुत्र से फावेरी नदी फे दक्षिण तक फैला हुआ था। किन्तु, समय-समय पर इस साम्राज्य पर बहुत-से आक्रमण हुए और इसका बहुत-सा भाग इसरो के अधीन हो गया। विजयनगर के प्रसिद्ध सम्राट कृष्णदेवराय के समय में तेलगु-प्रदेश उत्तर में पटक से प्ररम्भ कर दक्षिण में मदुरे तक फैला हुआ था। आज भाषावार प्रान्तो के विभाजन के बाद तेलगु-प्रदेश की सीमाएँ बहुत हद तक निश्चित-सी हो गई हे ॥/ आज इसकी उत्तरी सीमा उत्त र-पुर्द में वरहमपुर से प्रारंधभकर उत्तर में गोदावरी नदी के किनारे होते हुए न॑जामा- बाद फे कुछ उत्तर तक चली गई है इसकी दक्षिणी सीमा मद्रास के उत्तर में ूूगभग तीस मील से प्रारंभ कर कोलार तक हूँ और पूर्व में समुद्र-तट तक यह प्रदेश फैला हुआ है। इन सीमाओ के भीतर-स्थित विज्ञाल भू-भाग में तथा भारत के अच्यास्य प्रान्तो में बसे हुए तेलुगु-भाषाभाषियों की संख्या १९५१ ई० की जन-गणना फे अनुसार तीन करोड़ तौस लाख हूं। भारत में हिन्दी-भाषाभाषियो के बाद तेल्गु-भाषाभाषियों की संख्या ही अधिक हूँ

तेलगु-भाषा के दो रूप हमें देखने फो मिलते हँ--साहित्यिफ भाषा का रूप ओर बोलचाल की भाषा का रूप। साहित्यिफ भाषा का रूप प्रदेश-भर से एक ही है, किन्तु बोलचाल को भाषा के रूप में कहीं-कहीं थोडा-सा अन्तर दिखाई देता हूँ। सन्‌ १८७५ तक साहित्य-रचना को लिए फेवर साहित्यिक भष्षा का ही प्रयोग होता रहा, किन्तु उसके बाद बोलचाल की भाषा को भी साहित्य सें स्थान देने के लिए आवदोलन

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शुरू हुआ यह आंबवोलन आज तक चल रहा है। आज स्थिति ऐसी है कि तेलुगु के पचहत्तर फी सदी लेखक अपनी साहित्य-साधना बोलचाल की भाषा के साध्यम से करते हे। साहित्यिक भाषा (ग्राथिक भाषा) और बोल्चाल की भाषा (व्यावहारिक भाषा) में जो अन्तर हैँ, वह विशेषतया क्रियाओं तथा कुछ शब्दों के रूपो तथा संधि के नियम- पालन के ऊपर मिर्भेर करता हूँ एक उदाहरण से यह अन्तर स्पष्ट करेंगे।

सा्रहितल्यिक-थ?7०7--शी राम चरित्रमु परम पावन मैनदि अंदुवलनने तेलुगुलो

ननेकुल रासायण-मुनिदिवरलों रचियिचिरि। इप्पटिकिनि राचचुचु तम जल्ममुन्‌ चरितार्थम्‌ गाविचु कोनु चुन्नाद व्यावहारिक सापा--

श्रीराम चरित्र परस पावन सेदि। अंदुबल्लने तेलगुलो अनेकुलु रासायणाप्लियिदि बरलो ब्रासाद इप्पढिकी व्रास्तु तम जन्मान्नि चरितार्थम्‌ चेसुकुंटुल्नार।

(श्रीराम की कहानी परम पावन हैँ। इसलिए, कई लोगो ने अवतक रामायण की रचना की। आज भी कुछ लोग इसकी रचना करते हुए अपने जीवन को चरितार्थ कर रहे है ।)

जैसा हम पहले निवेदन कर चुके हे, तेलगु द्राविड़-भाषा-परिवार की एक मुख्य भाषा है किसी समय तमिल, तेलुगू, कन्नढ़ और मलयारूस मूल द्वाविड़-भषा की _ बोलियाँ सात्र थीं। किन्तु, बाद को भिन्न-भिन्न वातावरण में पनपने के कारण आज ये एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होती हे। तेलुगु-प्रदेश पर कई राजवंशो ने राज्य किया सातवीं शताब्दी तक सातवाहन, इक्ष्वाकु, बृहत्फलायन, शालंकायन, पत्ल्व, विप्णकुडिन तया पूर्व चालक्य राजाओ ने तेलगु-प्रदेश पर राज्य किया था इन राजाओ की राज- भावा या तो सस्कृत थी या प्राकृत जो शिलालेख अबतक उपलब्ध हें, उनसे बहुतों फो भाषा प्राकृत हूँ इन राजाओं में कुछ तो वेदिक घर्मावलंवी थे और कुछ बुद्ध के अनुयायी थे। इस तरह तेरूगु-प्रदेश में राजभाषा तथा धर्म की भाषा की हैसियत से संस्कृत तया प्राकृत का अत्यधिक प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में देशभाषा पर पड़ता रहा। परिणाम यह हुआ कि आज तेलूगू में पचहत्तर फी सदी शब्द सरक्षत्त या प्र-क्ृत भाषाओं क्र तत्सन या तदूभव रूप हें। तेलगु-प्रदेश के पंडितो का संस्कृत के प्रति इतना

अधिक आग्रह रहा कि तेलुगु का सब से प्रथम व्याकरण संस्कृत-भाषा में लिखा गया

तेलुगू की साहित्यिक भाषाके भी दो रूप सिरूते है एक रूप वह है, जो सस्कृत शब्दों तथा समस्त पदों से भरा हुआ होता है और दूसरा वह, जिसमें ठेंठ तेख्ग शब्दो फा ही बाहुलय हूँ ठेठ तेलुगु को जानू तेनुग! कहते हूँ इन दोनो रूपो में संसकृत- बहुल भाषा का ही अधिक आदर होता रहा और घौरे-घोरे ठेठ तेलूग के प्राचीन काच्यो के बहुत-से शब्दों का प्रचलन कम होता गया। इसलिए, ठेठ तेलग के प्राचीन काव्यो को समझना बहुत-से तेलुगु-भापाभाषियो के लिए भी आज कठिन-सा ही गया हूं। शव जा सस्कतवहुल तंलुगु क॑ उदाहरणो को देखने से इन दोनों में अंतर स्पष्ट

ठेठ तेलगु-- चेप्पु लोनिरायि चेविछोनि जोरीग, कटिलोनि नलुसु, फकालिसुल्ल, इटिलोसि पोर इंतित कादया

(जूतो में पड़ा हुआ कफड, फान में पहुँचा हुआ कीडा, आँख की फ़िरफिरी, पैरो में काँटा और घर में ऋगड़ा--इनकी पीड़ा असहनीय होती हे।) संस्कृतबहुल ते लुगु--

अधरमु _गदली गदलक अधुरमु उप भाष लूडियि मोन त॒तुडी अधिकार रोग पुरित बधिराधक शवबम्‌ जूड पापमु सुमती

[ अधरो को बिना हिलाये, मधुर भाषा से रहित हो, मौन ब्रत धारण फरनेवाला अधिकार-रोग से भरा व्यक्ति बहरे तथा अंधे दाव फे बराबर हे। उसे देखना भी पाप है। (रेखाकित शब्द संस्कृत फे है ।) ]

इन दोनो शैलियों का सामंजस्थ भाषा फे जिस रूप में पाया जाय, जिसमें तेलुगु का मुहावरा भी और संस्कृत का मधुर एवं गभीर शब्द-समूह भी हो, वही तेलुगु अधिक लोकप्रिय है और वही सुंदर समझी जाती है रंगवाथ रामायण की भाषा में ऐसी ही सुंदरता पाई जाती है इसकी चर्चा यथास्थान आगे की जायगी

चपेलुए-सराहछित्य-महाकवि नन्नवया का आध्र-महाभारत तेलुगु-साहित्य फे उपलब्ध काव्य-प्रत्यो में सबसे प्राचीन है इसकी रचना ग्यारह॒वीं शताव्दी फे मध्य में हुई थी। इस काव्य को प्रौढ भाषा एवं उत्कृष्ट कला-कौशर फो देखकर चिद्दान्‌ यह अनुमान फरते हें कि यही महाभारत तेलुगु-साहित्य का आदिकाब्य नहीं हो सफता। उनका विचार हैँ कि किसी भी भाषा फे प्रथम साहित्य का रूप इतना विकसित एवं प्रौढ नहीं हो सकता; शताब्दियों की साहित्य-साधना फे परिणास-स्वरूप ही ऐसी प्रौढ रचना का प्रगयन संभव हैं वह विचार कल्पना-मात्र कहा नहीं जा सकता। सातवीं तथा आठवीं शताब्दी फे जो शिलालेख एवं ताँबे फे दानपत्र अबतक उपलब्ध हुए, उनमें उत्कृष्ट काव्य-स्वरूप के नमूने मिलते हुं। अत., यह फहना सत्य से दूर नहीं होगा कि तेलुगु सें साहित्य-रचना का प्रारभ ईसा की सातवीं शताब्दी सें ही हुआ होगा, किन्तु सातवीं से दसवीं छाताबइदो तक का साहित्य हमें आज उपलब्ध नहीं हो सका

सन्‌ १०४५० ई० से आजतक के तेलंगु-साहित्य फे इतिहास को पाँच यूगो में विभाजित किया जा सकता है--

१. पुराण-युग (१०५०--१३५० ई०)

श्रीनाथ-परुग (१३५०--१४५०० ई० )

प्रबब->युग. (१५००--१६०० ई०)

दक्षिणाप्रयुग (१६००--१८७४५ ई०)

५- आधुनिक-युग (१८७५ ई० से)

हे

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प्रत्येक युग फा सक्षिप्त परिचय इस प्रकार हँ--

दुशाण-चुय--बैदिक धर्म तया उसके समर्थक पुराणों के प्रचारार्थ इस युग में साहित्य-पावना का प्रारंभ हुआ। महाकवि नज्नया ने महाभारत को रचता प्रारभ की भौर बरण्य-पर्व का अद्धं भाग लिख भी पाये कि उनका स्वर्गवास हो गया उसके दो सौ वर्ष के पश्चात्‌ तिककना सोमयाजी ने विराद पर्व से प्रारंभ कर शोष पंद्रह पर्वों की रचना की। उसके पद्चात्‌ एरंनाप्रगडाने अरण्य-पर्व का अघूरा अंदर पूरा किया इस तरह भहाभारत की रचना तीन कवियों के द्वारा लगभग तीन सौ वर्षों में पूरी हुई इन तीन सहाकवियों को कवित्रय कहते हैँ आश्र-महाभारत तेल्गु-माषाभाषियों के लिए एक साथ, पर्मश्ास्त्र, नोति-प्रन्य, पुराण तथा महाकाव्य हैँ। उसका प्रभाव तेलुगु- जन-जीवन पर अक्षुण्ण हूँ

इसी युग में रामायण की रचना भी हुई गोनबुद्धराजु ने बेशज छन्द 'द्विपदा में रामायण की रचना की, जो साधारण जनता के बीच अत्यंत प्रिय हुई, जिसका हिन्दी-अनुवाद उपस्थित हे। भास्कर रासायण्णा को रचना भी इसी युग में हुई, किन्तु वह केचर पंडितों क्षे बीच समादुत हुई महाभारत तथा रामायण के अलावा इस युग में शव फाव्यो की रचना अत्यधिक मात्रा में हुई नश्नेचोड़ कवि रूत कुमारसम्भवं, पालकुरिकि सोमनाथ-कृत वसवपुराणम! सतथा पंडिताराध्यचरित्र' इस युग की श्रेष्ठसम शैवभक्तिपरक रचनाएं हूँ, जो तेलगु-साहित्य के उज्ज्वल आभूषणों की भाँति शोभायमान हूं। इस युग के एक भौर प्रतिद्ध कवि नाचन सोम हे, जिनका उत्तर- हरिवश एक बडी ही सूंवर छुति है।

अरिना/थ-सुण--इस युभ के प्रसिद्ध कवियों में श्रीवाथ तथा पोतना अग्रगण्य हे। श्रीनाव राजदरवार के महाकवि तथा मभहापंडित थे उन्होने कविता-शैली में क्रांतिकारी परिवत्तेव किया उनके प्रसिद्ध प्रन्थ हे--काशीखलंडम', “ूंगारनैघधम” दथा पलसाटि घरित्रमु! इनमें काशीलंडमु' और “शूृंगारनपधम' संस्कृत को काव्यों के अनुवाद हे आर पलनाटिचरित्रमु' ऐतिहासिक वीर-काच्य हुँ श्रीमाथ के अनुवाद की शैली भी निराली है मूल ग्रन्थ को आधार मानते हुए, उसके समस्त काव्य-सौंदर्य को तेलुगु की मूहावरेदार भाषा में मूत्तिमान्‌ करने की उनकी क्षमता अद्भूत है। उनके समकालीन कवि पीत्तना, तेलुनु-भाषाभाषियों को हृदय-पीठ पर सर्वदा विराजमान रहेंगे। उनकी उत्कृष्ट रचना आश्च-महाभागवर्त हैँ, जिसका प्रचार गरीब की भोपड़ी से अमीरो के सहलो तक में हूँ पोतना राम के भक्‍त थे, किन्तु उन्होने कृष्ण-प्रधान काव्य की रचना की उनकी भक्त विलक्षण थी। राम-हकृष्ण, छिव-केशव में उन्होने कोई भेद नहीं किया। उनकी भागवत के कुछ भाग, जैसे प्रद्लाद-चरित्र, गजेन्रमोक्ष तथा कृष्ण-लीलाएं आदि तेलुगु-अदेश में इतने असिद्ध हूँ कि लोग उन्हें जबानी याद करके समय-समय पर भगजित- भाव से गाते रहते हे।

अवन्ध-युण --गह.. पुग तेलुगु-साहित्य का स्वर्ण-युग साना जाता हैं विजयनगर- साम्राज्य के विस्यात राजा श्रौकृष्णदेवराय का प्राश्नय पाकर तेलयु-साहित्य ने अभूतपूर्व

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उन्नति को। श्रीकृष्णदेवराय स्वयं भो कवि थे और उन्होने आमुफ्तमालयदा' नामक एक प्रौढ काव्य की रचना को थी। उनके दरबार में आठ सहाफति थे, जो अष्टदिश्गज के नाम से प्रख्यात थे। इस युग में कई प्रबंध-काव्यो की रचना हुई तेलगु सें प्रवध- काव्य को एक विलक्षण परिभाषा प्रचलित है किसी पौराणिक, ऐतिहासिक अथवा काल्पनिक प्रेमार्यान को आश्वित कर आवश्यकता तथा औचित्य की दृष्टि से उसे घटा-बढ़ाफर अपनी प्रतिभा एवं कला-कौशल के अनुसार तेलुगु फ्री मुहावरेदार भाषा में, तेलुगु-जन- जीवन फो प्रतिबिबित करते हुए जिस कला-कृति का निर्माण फवि फरता है, उसे प्रबध- काव्य कहते हे। ऐसे प्रबंध-काव्यो में अल्लसानि पेहना फा सनृचरिचत्र', तिम्पना का 'पारिजातापहरण' तथा रामराजभूषण का वसुचरित्र' अत्यत प्रसिद्ध हे धूर्जटि फवि फा 'कालहस्तीइवरशतक' ओर तेनालि रामकृष्ण का 'पाडरगमाहात्म्यमु' इस युग के भक्ति-परक महाकाव्य हे। इस युग फे उत्तराद्ध में पिगलि सूरना ने 'फलापूर्णोदियमु नामक एक मौलिक प्रबधन्‍्काव्य फी रचना की, जो घस्तु, भाव एवं कला की दृष्टि से बेजोड हैँ। उन्होने 'राघवपांडवीयमु' नामक एक हृ॒यर्थो काध्य लिखा, जो अपने ढंग का प्रथम फाव्यह इसको अपना आदर्श सानकर आगे कई फवियो ने तीन-तोन, चार-घार अथंबाले फाव्योकी रचना की

दुश्षिण79-युण-पिजयनगर-साम्राज्य के पतन के पश्चात्‌ आद्न-साम्राज्य दक्षिण तंजाऊर और गदुरे में प्रस्फुटित हुआ घहाँ के प्रायः राजा स्वय विह्ान्‌ होते थे और विद्वानों तथा कवियों फा बहुत आदर करते थे। उनका आश्रय प्राप्त करके फई तेलूगु- फर्वि तेलगु-साहित्य-मदिर फो अपनी सरस कृतियों से सजाने छगे। इस युग फी कविता भी प्रबंध-शली को ही अपनाकर चली, फिन्तु समय के साथ-साथ उसकी भाव-प्रवणता में शिथिलता आती गई। भाव-सौंदयं की अपेक्षा पाडित्य-प्रदर्शन एवं आश्रयवाता फी अत्युक्तिपूर्ण प्रशंसा फो ही फवि अधिक महत्त्व देने छबगे फिर भी, इस युग में कई सूंदर फाव्यो की रचना हुई, जिनमें फकटि पापराजु-कृत उत्तर- रामायण', घेमकूरि वेंकट कवि-कृत 'विजयविलासमु', फवयित्री मोल्ला द्वारा विरचित रामायण” तथा कवयित्नरी मुदुदु पलनो कृत राधिका स्वातनमु' आदि अत्यत प्रत्चिद्ध है आधुनिक काल के साहित्य का परिचय देने के पहले तेलुगु-साहित्व की एक और प्रवुत्ति का उल्लेख कर देना आवश्यक है तेलुगु की प्रवध-फाव्य-धारा के साथ ही 'सुकक्‍तक-काव्य-धारा का भी विकास समानातर में होता रहा मुक्तक-साहित्य के बतर्गत दशातक, गीत, सकीत्तेंन तथा यक्षणान आदि आते हे तेल॒गु में लगभग एक हजार शतक हे, जिनमें बहुत-त प्रकाशित हो चुके हे। पेलगु-साहित्य में इन शतको का महत्त्वपूर्ण स्थान है इनमें बहुत-से शतक भक्तिपरक हे, कुछ नीति-बोधक्त हूँ और कुछ शुद्भार-रस से भरे हे। इनकी फविता उच्चकोटि की है। इसके अलावा समय-समय पर भवक्‍तो के द्वारा रचे हुए पद तथा संकीत्तंन साहित्य तथा सगीत की दृष्टि से अद्वितीय हूं अश्नप्तय्या, त्यागय्या ओर क्षेत्रय्या, ये तेलुगु के तीन भक्त-कवि हे, जिन्होने भगित के उन्सेष में

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कितने ही मधुर गीतो का गाव किया है त्यागय्या (त्थायराज ) तमिलनाड के तिरवाड़ी वामक स्थान में हुए थे उनके कीत्त॑न सारे दक्षिण में गाये जाते हूं।

आधुनिक छुए--भाषुनिक युग में तेल्गु-गद्य की ञच्छी उन्नति हुई हक गद्य की विभिन्न प्रतत्तियों को प्रारभ करके गद्य का विकास करने का श्रेय स्व० श्रीवीरेशलिगम्‌ पंठुलू को है उन्होंने स्वयं कितने ही निबव, नाठक, प्रहलन तथा उपन्यास आदि लिखे और दूसरे लेखक्नों को लिखने की प्रेरणा दी आधुनिक तेलगु-साहित्य में उचका वही स्थान हैँ, जो हिन्दी में भारतेन्दु हरिश्चद्ध का है इस युग के प्र'रभ में कई ऐसी सस्थ(थों की स्थापना हुई, जो गद्य-साहित्य के निर्माताओं को प्रोत्साहन देती थीं। चिलकर्माति लक्ष्मीमरसिहस्‌, पानुगि नरासहराव, ग्रजाड़ अप्पाराव उन प्रारभिक लेखको में से हे, जिन्होने गद्य-साहित्य के निर्माण में अपक परिश्रम किया था | इसी समय व्यावहारिक भाषा को साहित्य-रचना के लिए प्रयोग करने को प्रश्न पर जबरदस्त आादोलन शुरू हुआ। कई युवा-लेखको तया पत्र-पत्रिकाओ ने इस आंदोलन का समर्थन किया। इस आंदोलन के फलस्वरूप बहुत बड़ी संस्या में गद्यनलेखक निऊड आये, जो आजतक गद्य-साहित्य की सर्वतोम्‌खी उन्नति के लिए प्रयास कर रहे हें

फविता फे क्षेत्र में भी तेलगु-साहित्य भारत की अन्यान्य भाषाओं की साहित्यिक प्रगति के साथ कदम-ब-कदम भागे बढ़ रहा है। अँगरेजी साहित्य का अध्ययन, स्वतंत्रता- आंदोलन, पत्तं मान जीवन का संघर्ष और व्यक्ति-स्वातंत्यवाद ने इस युग फे कवियों को एक नई दुष्टि प्रदान की तथा उसका प्रभाव उनकी कविताओ में लक्षित होने छूगा छाया- वाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की जैसी कविताएँ हिन्दी-साहित्य में पाई लाती है,वबैसी रचनाएँ तेलुगु में भी हे। भेद इतना ही है कि तेलुगु में उनके नाम मिन्न- भिन्न हे--जैसे भाव-कविता, अतिवास्तविक कविता, अभ्युदय-कविता आदि। वर्त्तमान समाज भे पाई जानेवाली आर्थिक असमानता, संघर्षमय जीवन, प्राचीन रूढियो तथा परंपराओं के प्रति विद्रोह तथा समस्त मानव-जाति के कल्याण का आग्रह आज की कविताओ में दिखाई पड़ते है

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रामायण, महाभारत एवं भागवतपुराण भारत की सांस्कृतिक एकता को सुरक्षित रखनेवाले महत्त्वपूर्ण प्रन्य हें। राम औौर कृष्ण भारतीय संस्कृति के प्रतीक है वस्तुत., मासेतुहिमाचल इन अलोकिक महापुरुषों को पूजा होती हैँ और प्रत्येक भारतीय भाषा के कवि इनके जीवन-वृत्तो का गान करने में ही अपने कवि-कर्म की सफलता मानते आये हे रामायण की कथा नित्य नवीन है हम अपनी वाल्यावरथा से ही जाने कितनी बार और कितने लोगो के द्वारा इस कथा को सुनते तथा स्वयं पढ़ते रहे हे, फिर भी जव-जव इसे सुनने या पढ़ने का अवसर सिलता है, तव-तव हम में नवोत्साह जागरित हो उठता हूँ यही इस कथा की महत्ता है वाल्मीक्ति-रासायण में चतुरानन के मुंह से निकले हुए निम्नलिखित शब्द अक्षरद्वः सत्य प्रमाणित होते हूँ -- यावत्‌ स्यास्य॑च्ति गिरयः सरित्तत्च महोतले तावत्‌ रामायणक्रथा लोकेषु प्रचरिष्यति

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तेलुगु भाषा में रामकथा-संबंधी कितने ही काव्य है ये काव्य प्राय दो रूपों में मिलते है--प्रबध-काध्य तथा मुक्तक-गीत। प्रबंध फे रूप में प्राप्त होने वाल काध्यो में अधिकतर काव्य वाह्मीकि-रमायण फे सरस अनुवाद-मात्र हें। 'रगनाथ रामायंण' तथा 'मोल्ल रामायण' ही वो ऐसे प्रबंध-काव्य हे, जो स्वतंत्र रचना कहे जा सफते हे इन दोनों फी कथा यद्यपि प्रधानतया वाल्मीकि-रामायण को आधार सानकर चली हूं, तथापि काव्य-रचना फे लक्ष्य में, कथा-वस्तु फो विधान में वर्णनो में, तथा चरित्न- चित्रण में नवीवता हे इन दोनो में 'मोल्ल रामायण आकार में छोटी है। “रंगनाथ रामायण! ही आंध्र-देश में अधिक लोकप्रिय है इसके रचता-काल तक जनता में प्रचलित रामकथा-सबधी कई ऐसे प्रसंग इस रामायण में मिलते हैँ, जो चाल्मीकि- रामायण में नहीं मिलते अबतक रामकथा-संबधी जितने प्रबध-काव्य उपलब्ध हुए, उनमें यही सब से प्राचीन काव्य हे।

“रगनाथ रामायण सबधी चर्चा प्रारभ करने के पहले हम एक विषय स्पष्ट कर दना आवश्यक समभते हे। जिस प्रकार तुलसी-रामायण उत्तर-भारत के लोक-जीवन के पोर-पोर में व्याप्त होकर, उसके पारिवारिक सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन फो प्रभावित कर सकी, उसी प्रकार ओर उसी मात्रा में तेलगु-भाष,भाषियों के जीवन फो तेलुगु-रामायण प्रभावित नहीं कर सकी। आंध्र-जनता के बीच वह कार्य आध्र-महाभारत तथा आांध्र-महाभागवत ने किया। इन दोनो ग्रन्थों ने तेलुगु-प्रदंश् में लोक-जीवन को प्रभावित ही नहीं, बल्कि अनुप्राणित भी किया है तुलसी-रामायण हिन्दी-भाषाभाषियो फे लिए एक साथ धर्म-प्रन्थ, पुराण, नीतिशास्त्र, समाजश्ञास्त्र तथा लोक-जीवन का पथ-प्रदर्शक है तेलुगु-प्रदेश में वह स्थान तेलगु-रामायण को नहीं बल्कि तेलुगु-भागवत फो प्राप्त हैँ तेल्गु-भाषाभ,षियो के लिए आंध्र-महाभःरत्त' एक साथ पम्मंशास्त्र, वेदान्त-ग्रन्थ, नीति-प्रन्थ, महाकाव्य और इतिहास हे।

परन्तु, फिर भी राम फो कथा, जो परपरा से जनता के बीच लोक-कथाओं तथा लोक-गीतो के रूप में प्रचलित थी, अपना अक्षण्ण प्रभाव लोगो के जीवन पर डालती रही। आद्र-देश में समय-समय पर कई ऐसे भक्‍त हुए, जिग्होने अपने भवित-रस पूर्ण गीतों एवं भजनों फे द्वारा राम-भक्ति का ऐसा प्रचार छोगो में किया कि श्रीराम आपफ्रो के इष्टदेव-से हो गये आफ्र-प्रदेश में विरछा ही ऐसा कोई गाँव होगा, जहाँ श्रीराम का सबदिर मिलता हो। तेलगु-भाषाभाषियो में रामय्या, रामन्ना, रामराब, रामचन्द्र राव, सीतय्या, लक्ष्मन्नला आदि नामो की तो गिनती ही नहीं हूं

किक्तु, प्रइवन यह हुँ कि तुलसी-रासायण फे समान सर्वव्यापक तथा प्रभावज्ञाली राम-काव्य तेलुगु में क्यो नहों लिखा जा सका ? एसी बात नहीं कि तेलगु-प्रदेश में इसके लिए आवश्यक प्रतिभा का अभाव था यदि ऐसी बात होती, तो महाभारत एव भाग वत जैसेगप्रौह एव सरस महाफाव्यो की रचना ही तेलगू में नही होती मत. इसका कारण जानने के लिए हमें इतिहास का आश्रय लुना पडेगा।

ग्रह सर्वेविदित हैँ कि भगवान्‌ वुद्ध की धामिक फ्रान्ति से वेदिक घर्म को बडा भारी धवद्रा लगा बौद्धधर्म कई शाताब्दियो तक उत्तर-भारत के राजाभो के द्वार

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समादव रहा उत्तर-भारत के कुछ राजाओ ने जैनबर्म को भी अपनाया था। घीरे- घीरे इन दोनों धर्मों अपनी विजय-पात्रा सदूर दक्षिण तक बढ़ाई दक्षिणापथ के कई राजाओं ने इस घ॒र्म आगे अपने घुटने देक दिये। आंध्र-राजाओ में सबसे या दातवाहन थे, जिन्‍्होने वैदिक धर्म के अनुयायी होते हुए भी वौद्ध तथा जैन धर्मों का आदर किया इन्हीं शातवाहनों के सामत इक्ष्वाकु-बद्य के राजा (ई० पुृ० २०० ) बौद्धपर्म को अनुयायी बने इन्होने बौद्ध तथा जैन धर्मों को बहुत आदर दिया और चैंदिक' धर्म के प्रभाव फो नप्ठ करने का भी यथाशवित प्रयत्वन किया इस प्रकार, दक्षिण भारत में वैदिक, वौद्ध एवं जैन धर्मों के बीच कई शताब्दियों तक सघर्ष चलता रहा। वोच-बोच में ऐस आंध्र-रजा भी हुए, जिन्‍्होने वंद्िक धर्म को प्रोत्साहन दिया और बौद्ध तथा जैन धर्मों को समूल नष्ट करने का प्रयत्व किया।

सन्‌ ८२५ ई० में शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ उन्होने बौद्धधर्म के प्रचार को रोकने तथा वैदिक धर्म को पुत्र. प्रतिष्ठापित करने का जो प्रयत्न किया, उससे क्ांध्र-प्रदेश के वैदिक घर्मावलंवियो को आंध्र-देश से बौद्धधर्म को समूल उखाड़ फेंकने क्ी प्रेरणा सिली। उन्होने कई मो्चों पर बौद्धधर्म का विरोध किया बीद्धघर्मावलंबियो फो तरह-तरह की यातनाएँ दी गईं और कई ऐसे प्रन्यो के निर्माण का प्रयत्न हुआ, जिनके द्वारा वैदिक धर्म तथा उनके समर्थक पुराणों की प्रतिष्ठा बढ़ी। वातावरण भी इसके लिए अनुकूल था उसी समय तमिल-देश में अनेक वेष्णव तथा शव सतो का भाविर्भाव हुआ, जिन्होंने अपनी सरस एवं सबल रचनाओं से बौद्ध तथा जैन धर्मों का विरोध आरंभ किया उसी युग में मांध्र में राजराज नरेन्द्र नामक एक विख्यात राजा हुए जो वेदिक धर्म के अनन्य अनुयायी थे। इन महापुरुषों का प्रोत्साहन पाकर तेल्यू-साहित्य में पुराण-पुग॒ प्रारंभ हुआ, जिसमें प्रधानतया पुराणी और इतिहासो फा अनुवाद-कार्य हुआ इन प्रस्यों की रचना करने में कवियों का उद्देश्य यही था कि उनके द्वारा भगवान्‌ फै उस लोकरंजनकारी रूप फो अभिव्यवित की जाय, जिसको आलंवन सानकर मानव- हृदय वैदिक धर्म के कल्याण-मार्गय की औौर अपने आप आक्षप्ट हो सके लगभग छनू १०२५ ई० में कवि नन्नया ने महाभारत का अनुवाद प्रारंभ क्या, किन्तु वे महा- भारत के केवल ढाई पर्व-परात्र की रचना कर पाये थे कि उनका स्वर्गवास हो गया। इसके पवचात्‌ तलगु-रामसायण (रंगनाथ रामायण) की रचना हुई

तेल्गू में रामायण को रचना को प्रेरणा देनेवाली परिस्थितियाँ तुसी-रामायण फी रचना के लिए प्रेरणा देनेवाली परिस्थितियो से भिन्न थीं। रगनाथ रामायण का उद्देश्य वैदिक धर्में की प्रतिप्ठा को बढ़ाना तथा रामचन्ध जैसे अलौकिक शक्तिशाली एवं सौंदय- पंपन्न व्यक्ति तथा अवतार-पुरुष के भव्य चरिच्न को प्रस्तुत करना था, जिसकी अनुभूति- मात्र से मानवच्हदय गद्गद हो उठे। या यो कह सकते है कि रंगनाथ रामायण उस प्यापक पृष्ठभूमि को तैयार करने में सफल हुई, जो पीछे चलकर राम के प्रति भक्ति- भावना को जन्म देने के लिए आवश्यक थी। भक्ति का प्रादुर्भाव अचानक नह

हीं होता। अनंत सौंदर्य, शक्ति और शीरू से सपन्न चरित्र के प्रत्यक्षीकरण से व्यक्ति का हृदय पहले

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अइचरय से भर जाता है और धोरे-धीरे वह उस गक्ति-सपन्न व्यक्ति के महत्व की अनुभूति करते रूगता है। उसको उपरात उसकी प्रशसा करने की इच्छा सहज ही उसके मन में जागरित होती है महान्‌ व्यवित की प्रशसा करने क्वी यह इच्छा ही भक्ति की पहली सीढ़ी है रंगनाथ रामायण के प्रतिभावान्‌ रदथिता ने अपनी रचना के द्वारा यही कार्य संपन्न किया।

रंगनाथ रामायण बाल्सीकिरामायण का सात्र अनुवाद नहीं है स्थूल रूप से वाल्मीकिरामायण की कथा इसमें भा तो गई है, किन्तु उसके कवि ने बीच-बीच में ऐसे प्रसंग भी जोड़ हे, जो फदाचित्‌ उस ससय तक जनता के बीच लोक-कथाओं के रूप में प्रचलित हो चुके थे हम नीचे ऐसे कुछ प्रसगो का उल्लेख करेंगे, जो चाल्मीकि- रासायण में नहीं मिलते, यद्यपि उनमें से कुछ प्रसग ज॑नग्रस्थों में सिलते हे। कदाचित्‌ कवि ने वहीं से इन प्रसगो को लेकर अपनी रामायण में सम्मिलित कर दिया हो

१. जंबुमाली का बृत्तात, २. रावण से तिरस्कृत हो विभीषण का अपनी माता फे पास जाना, ककेसी (रावण की साता) का रावण को हितोपदेश, ४. रावण का राम की धृर्विद्या-कुशलता की अद्यंस, करना, ५. गिलहरी की भवित, ६. नागपाश में बद्ध होकर राम-लक्ष्मण को पास नारदजी का आना, ७. रावण के जागे सदोदरी का रास की महिसा एवं शौय की प्रशसा करना, दूसरी बार सजीवनी लाते सम्॒य हन्‌ मान्‌ तथा सात्यवान्‌ का युद्ध, ६. कालनेमि का वृत्तात, १०.सुलोचना का बृत्तात, ११. शुक्राचायं के आगे रावण का दुखड़ा रोना, १२. रावण का पाताल-होम, १३१. अंगद का रादण के समक्ष सदोदरी को बुरा लाना, १४. रावण फी नापज्ति में स्थित अमृत-बल्छा को सोखने के निमित्त आश्ेयास्त्र का प्रयोग करने की विभीषण को सलाह; १५ लक्ष्मण फी हंसी

उक्त प्रप्तयों में जबुमाली का वृत्तांत, कालनेसि का वृत्तात, रावण के समक्ष अंगद का मंदोदरी को घसीटकर छाना, आग्नेयासस्‍्त्र का प्रयोग करने कौ विभीषण की सलाह जादि ऐसे हूं, जो मूलकथा की घठनाओ को अधिक तकें-सगत सिद्धि करने फे निमित्त जोडे हुए प्रतीत होते हे। रावण से तिरस्क्ृत होकर विभीषण का अपनी माता फे पास जाना, केकेसी का हितोपदेश और सुलोचना का वृत्तात आदि रावण के परिवार के लोगो के चरित्र पर प्रकाश डालने के साथ ही साथ इस ओर भी इगित करते हें कि रादण भूत-प्रेतोी का वशज एवं भूत-प्रेतों का राजा नहीं था, किन्तु एक दिलक्षण परिवार में उत्पन्न हुआ विशिष्ट व्यदित था रावण का, राम की घनुविद्या की छुशलता की प्रशसा फरना, मंदोदरी का रावण के समक्ष श्रीराम की महिसा एवं पराक्षम क्ी प्रदंसा करना, गिलहरी का बृत्तात आदि प्रसंग राम के उस छोकोत्तर व्यक्षितत्व पर प्रकाश डालते हें, जो शत्रुओ की भी प्रशंसा प्राप्त करने की क्षमता रखता था। साथ ही साथ, वे रावण तथा मंदोदरो के चरित्र पर भी प्रकाश डालते हें उक्त प्रसगो के अकाधा इस रामायण में यत्र-तन्न ऐसे वर्णन भी मिलते हैँ, जो वाल्मीकिरामायण में नहीं मिलते, किन्तु जिन्हें कवि ने वैदिक धर्म में लोगो फी निष्ठा बढाने के निमित्त जोडः हैं

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पात्रों का चिक्र०/-पात्र-चित्रण की दृष्टि से रगनाथ रामायण विद्येष महत्त्व रखती है जैसा हमने पहले ही निवेदन किया है, रगनाथ रामायण में श्रीराम के महिमा-समन्वित शक्ति, शील तथासौंदर्य से परिपूर्ण चरित्र को प्रस्तुत करने का अधिक प्रयत्न हुआ है इस रामायण के नायक राम जहाँ एक धौरोदात्त वीर तथा सर्वंगुणसंपन्न व्यक्ति थे, वहाँ इस काव्य का खलनायक रावण भी उदार, चीर, साहसी, असमान पराक्रमी, राजनीतिकुशल, स्वाभि- सानी एवं शिवजी का अनन्य भक्त भी था किल्तु, उसके दोष भी उसके गुणोसे कम नहीं थे। वह कामुक, अभिमानी तथा उद्धत था। इसलिए, इस रामायण के कविने रावण को चरित्र का चित्रण करने में अपनी अद्वितीय प्रतिभा एबं सहृद्यता का परिचय दिया है उन्होंने एक कलाकार तथा इतिहास-लेखक--इन दोनो फे उत्तर- दायित्व को सफलतापूर्वक निभाया है जहाँ उन्होने रावण के कृष्ण पक्ष की निंदा की है वहाँ उसके उज्ज्वल पक्ष को प्रकट करने की उदारता भी दिखाई हूँ उनकी दृष्टि में रावण एक विलक्षण वोर था, जिसमें जड़-चेतन तथा गुण-दोषो का अद्भुत सम्मिश्रण था। उसका पतन इसलिए हुआ था कि जड ने चैतन्य पर पूरा-पुरा अधिकार प्राप्त कर लिया था | कदाचित्‌ यह रामायण के प्रति द्वाविड़ दृष्टि का प्रमाण भी हो। द्राविड़ लोग रावण को उसी दृष्टि से नहीं देखते, जिस दृष्टि से आर्यों ने उसे देखा और राक्षस, निद्याचर आदि नामो से सबोधित किया द्रविड़ दृष्टि में रावण भी एक वीर, विद्वान, पराक्रमी मनुष्य ही था, किन्तु उसके गरणों पर दुर्गुणो ने विजय प्राप्त कर ली थी ओर यही उसके सर्वताश का कारण हुआ इसके अतिरिक्त, कलूग की दृष्टि से देखा जाय, तो हमें यह मानना पड़ेगा कि रामचन्द्रजी का प्रतिहन्द्री केबल एक रूपट तथा नीच व्यक्ति नहीं हो सकता था रावण को अपने बल-पौरुष का जहाँ अभिमान हूं, वहाँ उसके हृदय में अपने झात्रु के गुणों के प्रति आदर भी हैँ | वह राम के बल- विक्रम पर आइचयं ही प्रकट नहीं करता, वल्कि उनकी प्रशंसा भी करने रूगता है। श्रीराम की घत्रुविद्या की निपुणता देखकर रावण कहता है-- -

नल्‍लवो रघुराम नयनाभिराम, विललविद्या गृदव, वीरावतार वपुरे, राम भूपाल, छोकमुल नीपादि विलुकाडु नेचुने करूग ? (हे चीलूमेघश्यास, नयनाभिरास, धनुविद्या-निपुण, वीरावतार, रघ्राम, हे राजा राम, इस संसार में तुम्हारे समान घतुवर और कोई हो सकता है?) रावण की इस प्रशंसापूर्ण शब्दों को सुनकर रावण के मतन्नी रावण से कहते हूं क्कि आपका इस श्रकार जझत्रु की प्रशंसा करना आपको शोभा नहीं देता। तब रावण कहता है-- विल्लुविद्या पेपुनू , विक्रम ऋ्ममु, गलितनवुनु, बाहुगव॑ राजसम, लादियों गुणमुल नधिकुडनहि, फोदंडदीक्षा गरनितो राज वरुनितो, रामभूवरुनितो नोरलू पकिचि चूड नेपद्ट्न नेन, साबिये इस्मूड्‌ जगमुलूयदु ? मेटि शूरुल पंषु पेच्चंग वलदे?

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(धर विद्या-नेपुण्य, पराक्तम, झौयं, बाहुबल आदि गुणों में श्रेप्ठ राजा राम की समता फरनेवाला तीनो लोको में कोन है ? क्या भहान्‌ पराक्तमी व्यवितयों की महानता की प्रद्मयसा नहों करनी चाहिए ?

रावण के इन शब्दों से फवि दो उद्देश्यो की पूति फरना चाहते हे। रावण फे ये वचन जहाँ एक ओर उसकी उदारता प्रकट करते हूं वहाँ वे शत्रु के द्वारा भी प्रशता प्राप्त करनेवाले श्रीरास के असाधारण एवं अलौकिक व्यक्तित्व पर भी प्रकाश डालते है

यही नहों, रावण अच्छी तरह जानता था कि श्रीरास विष्णु को अपर रूप हे और उनके हाथो मरने से मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए, वह सोचता हूं फि युद्ध के लिए ललकारनेवाले दात्रु के सामने घटने टेककर म॑ अपनी दीनता क्यो प्रकट फरूे और अपनी वीरता फो क्यो करूकित फरू जब मदोदरी राम की महिसा का वर्णन करके रावण को युद्ध करने से रोकने का प्रयत्न करती हूँ, तो रावण कहता है --

ये चेल्लभगुलू निक राघबुल बोनीक चपुदु। भूमिज नीय वारूठ बलडने, यदु गाक येनू श्रीरामु शरमुलूचे जत्तुनेनि ताकवासूलू मेच्च ना फोसचून्न बेकुंठ मेदुरागवच्चु निच्चटिक्कि ललन नीवेटिकि ? लक येमिदिकि ? दलकोन्नु मुक्ति सत्पथमु गेकोदु।

(अब में किसी भी प्रकार राघवों फा वध करूँगा हो; मे सीता को नहीं दूंगा। यदि इसकी विपरीत में श्रीराम के शरो से ही सारा जाऊँगा, तो मेरा चिर अभिलषित स्वर्ग सेरे पास स्वयं जायगा और स्वर्ग के निवासी मेरी प्रशसा करेंगे जब में मुक्तिपथ को प्राप्त करने जा रहा हूं, तबहे सुन्दरी ! मुभो तुम्हारी आवश्यकता हु लका फो।)

वाल्मीकिरासायण सें सुलोचना का वृत्तात नहीं मिलता हैँ तुलसी-रामायण की कुछ प्रतियों में इस कथा का बडा सरस वर्णन मिलता है। फिन्तु पडितो का विचार हूं कि तुलसी-रामायण का यह अंद प्रक्षिप्त है रंगनाथ रामायण में इस महान्‌ साध्वी फे चरित्र का अत्यृत्तम चित्रण सिलता है बेंगला-कवि साइकेल मधुसूदन ने अपनी रचना 'मेघनाद-व्ध में सुलोचना के चरित्र को विशेष प्रधानता दी है और उस वीर एव सती-साध्वी स्त्री का एक भव्य चरित्र उपस्थित किया हैँ ईनच्वजीत की मृत्यु के उपरफ्त उसकी वीर पत्नी सुलोचना अपने पति के सृत शरीर के साथ सती होना चाहती हूँ अतः, वह अपने ससुर रावण से इच्रजीत के मृत शरीर फो मेंगा देने की प्रार्थना फरती हैं। किन्तु, रावण अपनी असमर्थता प्रकट करता हुँ; क्योकि इन्द्रजीत का शब शनत्रुओ के अधीन सें था तब सुलोचना अपने पति का मृत दरीर प्राप्त करने के हेतु स्वयं साहस के साथ शत्रु-शिविर में चली जाती है वहाँ पहुंचकर वह पहले रामचन्धजी से पति-शिक्षा देने फी प्रार्थना करतो हे उसके साहस पति-भक्ति एवं निर्मेल चरित्र से प्रभावित होकर रामचन्द्र उसकी प्रार्थता स्वीकार करने को प्रस्तुत-से होते दीखते हे तब हनुमान्‌ उन्हें

बजा

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पमभाते है कि ब्रह्मा का लेख भूठा नहीं होने देवा चाहिए। इस पर रामचन्द्र सलोचना को आइवासन दते हे कि अगले जन्म में तुम अपने पति के साथ चिरकाल तक सुसमय जीवन व्यतीत करने को उपरांत बैकठ-घाम प्राप्त करोगी। इसके पश्चात्‌ सुलोचना राम से अपने पति का ज्रीर मॉँगती हु तब सुत्रीव उसे ताना देते हुए बहता है-- यदि तुम पतिव्रता हो,तो अपने मृत पति से बात्ताकाप करो सुझोचना इस चुनौती को स्वीकार करती हैँ और युद्ध -भूमि में पड़े हुए अपने पति के शव के पास जाकर बड़े ओोजपूर्ण घब्दों में कहती है--यदि में सन, वचन, रर्म से अपने एतिक्की सच्ची भवित करती हूं, तो मेरे पति सजीव होकर मुझे वार्त्तालाप करें। तब मेघनाद का शव आँखें खोलकर कहता है--हे प्रिये! मेरे पिता ने ही मुझे सारा है। नहीं तो और किसकी ऐसी शक्ति यी कि मझो मार सके, काल की गति प्रवलू है। इतलिए चिन्ताभत करो इतना कहकर इच्द्जीत की आंखें सदा के लिए बंद हो जाती हूं। इसके एशचात्‌ सूती सुलोचना अपने पति के शव को साथ लेकर जातो है और उसके साथ सती होकर देवलोक में पहुंच जाती कल7-फक्छ "ला की दृष्टि से भी रंगनाथ रासायण उच्छ कोटि का महाकास्य है फला के उत्द्ृप्द चचत्कार इसके प्रत्येक पृष्ठ में दृष्टिगोचर होते हंं। कवि सरह्ष्त के फाव्य-शास्त्र के निष्णात विद्वान्‌ होने के कारण उदित-वेचित्र्य एवं अर्थगौरव, इन दोनो फा उचित अनुपात दनायें रखने में सर्वथा सफल हुए हैँ उनकी क्ला-लाधना में पग-पण पर उनका हत्य बेटलेवाले अनुप्नास एवं यसक अलंकारों की छठा कवि के अगाध पांडित्य एवं भाषा पर उनके विलक्षण अधिकार का प्रमाण प्रस्तुत करती हूँ भावों की मासिक अभिव्यंजना फे लिए प्रयुक्त अथलिकार इतने स्वाभाविक हुँ कि हम कवि की नोचित्य-प्रियता पर भसुग्ध हो जाते है रंगनाथ रामायण की भाषा विल्क्षण साधुर्य एवं घंभीरता से परिपूर्ण हे तेलुगु की साहित्यिक भाषा के जिन दो रूपो की चर्चा पहले की गई हैँ, उन दोनो झगो का सुन्दर सम्मेलन इस काव्य में हो गया हूँ कवि का तेलग एवं संस्कृत दोनों भाषञों पर पुरा-पुरा अधिकार था और दोनो भाषाओ के एव्द-भांडार उनके आदेश का पारूम के लिए सर्वथा प्रस्तुत रहते दिखाई देते हूं कवि ने तेल्गु की सजीव एवं मधुर महावरेदार भाषा के साथ संस्कृत-शब्दो का

एंसा सुन्दर मेल कराया हूँ कि भाषा में मणि-कांचन-योग की-सी शोसा भा गई है इसकी भाषा का एक नमूना नीचे दिया जाता है--

राज-तिलक चेतोविनिर्मलशिप्द्‌ विशिष्ठ, गौतम जावालि कह्यप कप्व वामदेवादलो वरमुर्तीइवदल सप्मादि बहुबेद चतुर बोबकुल भरतुडु रप्पिचि भय भवत लोप्प, परम सस्झृद दचोभंगुलू, मेरय नी रामुनकु प्ट्राभिषेकंदु सेयूडारूढ रियतितो! नि पलक दार पृत्ति मंगल तूर्यमुलू मोयुचुंड, जानकी रामुरू चदुरोप्प तेच्चि रमणीयतरसेन रत्तपीठयन, कोररोप्प निरवुर कूर्चुड बनि चि सानित वेदोवत मंत्र पूर्वक्मुग अभिषेकंव कर रथिचेय ना राम नौदल ना पूर्णदारि वार डब्यस्नप्पुडु तग चूडनोप्पे गीर्वार्ण सृस्यरू क्ीतेनल सेय पार्वती सहिदुड प्रषुर्तिपनोप्पु मंगजहर सोलि त्मल से तोदगु यंगा नदिय बोले फ्सनीयथ मगच ना तीयेंघरल

( १७ )

अंश्रुक् फोलिकि भूतलंबुन निडि पोलपारे जूड हरिपाद मुन बुद्धि अय्यादि गंग घरणि प॑ बरगुविधबल्चु पडग बरिकिप रास भूपालछुंडपुडु हरुड्विप्णवबु, दानयनु माड्किनूंड

(भरत ने निर्मेलचेता एवं सदाचार-संपन्न वसिष्ठ, गौतम, जाबालि, परयप, बष्ठ, वामदेव आदि मुवीदवरों को तथा चतुर्वेद-पारंगत विबुधों को बुलाकर दिनय एवं भदित के साथ उनसे कहा--आप कृपया विधिदत्‌ श्रीराम का राजतिलक कीजिए तब संगल-वाद्यो की धघ्वन्ति के साथ वे जानकी तथा राम फ्ो बुला लाये और रमणीय रत्तपीठ पर उन दोनो को आसीन कराया और बेदसंत्र-पुर्वक पुण्य सलिल से उनका अभिषेक किया। राम के सस्तक पर से गिरनेवाली वह पुण्य जलधारा देखने में बहुत ही रमणीय प्रतीत होती थी। देवताओ की स्तुतियो को प्राप्त करते हुए पार्वती के साथ विलसित होनेवाले परसक्षिव की जठा से भरनेवाली गंगा नदी की भाँति वह जलघारा अत्यत कमनीय दीख रही थी वह (जलूघधारा) क्रमशः उनके चरणों से होकर पृथ्वी पर ऐसे गिरने रूगी, मानो विष्णु क॑ चरणों में जन्म लेकर पवित्न गगा पृथ्वी पर उतर रही हो। इस प्रकार, उस समय रासचन्द्र स्वयं विष्णु तथा शिव की भाँति शेभायमान हुए ।)

मुहावरों का सस्यक्‌ प्रयोग, भावों के अनुकूल भाषा, स्वाभाविक अनुप्रासो फी छठा, उक्ति-सौंदयं तथा ओज, प्रसाद एवं साधुर्य गुणो से युक्‍त शलो, ये सभी फ्रवि के विलक्षण पांडित्य तथा कवित्व-शब्ति का परिचय देते हें

वैसे तो अनुवाद का फार्य ही कुछ कठिन है; क्योक्ति कितना भी प्रयत्न क्या जाय, मूल की सुन्दरता अनुवाद में नहों सकतो एक भाषा की श्रेष्ठ कलाकृति फा दूसरी भाषा के गद्य में सरस अनुवाद प्रस्तुत करना स्वभावत. कठिन फार्य है तेलुगू और हिन्दी दो भिन्न भाषा-परिवार की भाषाएँ हे और उनके अपने-अपने मुहावर हूं। मुहादरो का अनुवाद तो हो नहीं सकता। हाँ, यह प्रयत्व अवश्य हो सकता है कि तेलुग मुहावर फा सिलता-जुलता हिन्दी-मुहावरा फा उपयोग किया जाथ। फिर भी, अनुवाद अनुवाद ही हे। अनुप्रास, यम्क आदि अलकारों का सौंदर्य एवं उक्ति-बेचित्र्य आदि अनुवाद में लाना कठिन है उदाहरण के लिए--

_तोगल्‌ बेट्वितुमु दुष्टारि सतुल, तोगलू जानकि इक तोल गग

_तोगलार ! इकभीद तोग येट्टि दनुचु, तोगतेहल चिदिभि बेतु रु पेच्चु पेरिगि।

तोग' के कई अर्थ हे--दु ख, कप्ट, घरूल यहाँ फचि ने यझक अलकार के हारा तोग' शब्द के प्रयोग से भिन्न-भिन्न अर्थों की अभिव्यजना की हु; किन्तु यह सुन्दरता अनुवाद में लाना असभव है।

फिर भी, अनुवादक ने मूल के प्रति निप्ठा बरतते हुए यथ.सभव सूल रचना की सुंदरता को अनुवाद में लाने की भरपूर चेष्टा की है उसे कहाँतक सफलता मिली हैं, इसका मूल्याकन करता सहृदय पाठकों का काम हूँ

( र८ )

में अंत में दक्षिण-भारत-हिन्दी-प्रचार-सभा के भूतपूर्व संयुवत मंत्री परम आदरणीय पडित अवधनदनजी के प्रति अपनी हादिक क्ृतनज्ञता प्रकट करता हूं, जो इस ग्रन्य के संपादन का कार्य बडी दक्षता के साथ संपन्न करते हुए लगातार मेरी सहायता करते रहे। मे॑ विहार-शणष्ट्रभाषा-परिषद्‌ का भी अधभार मानता हूँ, जिसने सुर्भे इस कार्य के लिए बोग्य समझकर नेरें द्वारा यह अनुवाद कराया यदि यह प्रन्य हिन्दी-भाषा-

भाषधियों फो तेलुगु की विपुल साहित्य-संपत्ति का किचित्‌ भी आभास करा सकेगा, तो से अपने परिश्रम को सफल मानूँगा

श्री रामनव सती

ता० १६, शके १८८२ ए० सी० कामाक्षि राव प-४-१६६० ६ई०

विषयानुक्रमणी

परिचय एन्डे यरत/एवनए शनि बालकोड १-4९

देवस्तुति---३, ग्रन्थ-रचना का कारण--४, कथा का प्रारभ--६, कुश-लव का रामायण-गान--&, परुत्रकामेष्टियज्ञ करने के लिए दशरथ का मत्रियों से परामर्श--8, ऋष्यश्वग का वृत्तान्त--१०, वेश्याओ के साथ ऋष्यश्व॒ग का रोमपाद के घर आना--१२, दशरथ का यज्ञदीक्षा लेना--१४, & रावण के अत्या- चारो के बारे में ब्रह्मा से देवताओो की शिकायत--१४, १० देवताओ का विष्णु की स्तुति करता--१५, ११ दशरथ को यज्ञपुरुष का पायस देना--१६, १२ देवताओ को वानरो के रूप में जन्म लेने के लिए ब्रह्मा की सलाह--१६, १३ श्रीराम आदि का जन्म---१७, १४ श्रीरामादि का बचपत--१5०, १५ विदवामित्र का आगमन--१८, १६ यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम को भेजने के लिए राजा से विश्वामित्र की प्राथंना--१६, १७ राम-लक्ष्मण को विदश्वामित्र के साथ भेजने के लिए वसिष्ठ की सम्मति--२०, १८ विद्वामित्र के साथ राम-लक्ष्ष्ण को भेजना--२१, १६ अनगाश्रम का वृत्तान्त---२१, २० विद्वामित्र का श्रीरामचन्द्र को ताडका का वृत्तान्त सुनाना--२२, २१ ताडका का वध--२३, २२ विद्वामित्र का श्रीराम को भृशाइव-सतान-रूपी दछास्त्र देता--२४, २३ कौशिक का श्रीराम को सिद्धाश्रम का वृत्तात सुनाना--२६, रहें वद्वामित्र का यज्ञ--२६, २५ कौशाबी का वृत्तात--२5, २६ गंगा नदी का वृत्तात--३३ , २७ गगावतरण को कथा--३५, २८ अमृतन्मथन की कथा--३६, २६ गौतम के आश्रम का वृत्तात--४२, ३० मिथिला में आममन--४३, ३१ विद्वामित्र को दवित का परिचय---४४, ३२ शिव-धनुष का वृत्तात--५३, ३३ शिव-धनुभग---५४, ३४ दशरथ का वशक्रम--५८, ३५ राजा जनक की वशावली--६०, ३६ सीता

और राम का विवाह--६३, ३७ परशुराम का गर्व-भग--६५, रे८ अयोध्या में प्रवेश---६८

झयोध्यय्कोीड ७९-१२२

रामराज्याभिषेक का सकल्प--७३२, मथरा की कुमत्रणा--७६, कैकेयी के महल मे दक्षरथ का आगमन--७८, दशरथ से कंकेयी का वर माँगना--८० ,

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कैकेबी के भवन में राम का दश रथ से भेंट करता--5२, कौसल्या का दुख --८४; लक्ष्मण का क्रोव और राम का समकाता---5५, राम का कौसल्या को धैर्य देना--5७, राम का अभिषेक-बग का वृत्तात सीता को सुनाना--छ८; १० रान का सीता तथा लक्ष्मण को भी साथ चलने की अनुमति देना--६०, १६ राम- लक्ष्मण का सम्पत्ति-दान--६१, १३ त्रिजठाख्य को राम का गायो का दान देना--६१॥ १३ सीता-लक्ष्मणसहित रामका दशरथ के दर्शावा्थ जाना--६२, १४ कैकेयी पर वसिप्ठ का ऋब--६५, १५ राम का दगरव को सात्वता देना--६६, १६ सीता को सीख देना--६६, १७ राम का वन-गमन--&७, १८ गुह से राम की भेंट--१००, १६ राम का गगा पार करके वन में प्रव्रेश करना--१०२, २० काकासुर-बृत्तात--१०३, २१ सुमत्र का अयोध्या पहुँचना--१०३, २२ दणअरथ का कौसल्या को अपने शाप का वृत्तात सुनाना--१०४, २३ दशरथ का स्वर्गवास--१०5८, २४ भरत का अयोध्या में प्रवेश---११०, २५ भरत का कौसल्या के घर जाना--१११, २६ भरत का राम के पास जाना--११३, २७ भरत का भरद्वाज के आश्रम में पहुचना--१ १४, २८ भरत की राम से भेंट--११६, २६ भरत का रास को दशरथ की मृत्यु का समाचार देना--१ १७, ३० श्रीराम को जावालि का उपदेश--१२०, ३१ पादुका-दान--१२०

ऋएफण्यकीड 7९३-/४० चित्रकूट से प्रस्थान--१२५, राम का दण्डक वन की यात्रा करना-- १२६, मे विराव का वध--१२६, श्रीराम का शरभग के आश्रम में पहुँचना---१२७, श्रीराम का सुतीक्षण मुनि के आश्रम में पहुँचना--१२८, मदकर्णी का वृत्तात-- १३०, अगस्त्य से भेंट--१३०, जठायु से मित्रता--१३२, हेमत-वर्णन--- १३२, १० जवुमालि का वृत्तात--१३३, ११ चूंणखा का वृत्तात--१३६; १२ खर- टदूपण का वब--१३६, १३ लका में अकपन तथा रावण का वार्त्तालाप--१४५; १४ घूंगल्ला का रावण से दीनालाप--१४६, १५ रावण का पुत्र मारीच के पास जाना--१४७, १६ मारीच का पुनः उद्वोवन--१४८, १७ मारीच का माया-मृग के रूप में आना--१४६, १८ राम का माया-मृग का पीछा करना--१५१, १६ भिक्षुक के वेश में रावण का सीता के पास आना--१५३, २० जानकी का शोक--१५५, २१ जठाय्‌ू और रावण का युद्ध--१५६, २२ जानकी को अज्नोकवन में रखना--१५६, २३ श्रोराम का ढु ख--१५६, २४ लक्ष्मण का राम को सात्वना देना--१६३, २५ जटायू का अग्ति-सस्कार करता--१६५, २६ कवंघ का वध--१६६, २७ राम-लक्ष्मण की शवरी से भेंट--१६७, २८ श्रीराम का ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचना--१६८।

मकिश्किकाकाड ९७९-२९०

पपासरूदर्भन--१७३, हनुमान की राम से भेंट--१७५, हनमान्‌ का अपने जन्म का दूत्ताव चुनाना--१७६; नुन्नीव का सताके आभूषणों को देवा--१७८,

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वालिनसुग्रीव का दंदवयुद्वध--१८३; तारा का वालि की रोकमा--१५५; वालि का सहार--१८७, तारा का शोक--१५६; वालिका सुग्रीव को उपदेश देता--१६१, १० सुग्रीव को किष्किधा का राजा बनाना--१६२, ११ राम का माल्य- वंत पर पहुँचना--१६३, १२ लक्ष्मण का किष्किधा में जाना--१९५; १३ सुग्रीव का साल्यव॒त पर पहुँचता--१६७, १४ सीता के अन्वेषण के लिए सुग्रीव का वानरो को भेजना--१६८, १४ हनुमान्‌ को मुद्रिका देता--१६६, १६ महर्षि कइु के आश्रम में--२०१, १७ स्वयप्रभा का सत्कार--२०२, १८ वानरो की व्याकुलता--२०३, १६९ सपाति से भेंद--२०४, २० सीता का पता बताना--२०५, २१ वानरो का अपनी शक्ति का परिचय देना--२०६, २२ समुद्र लाँघने के लिए हनुमान्‌ को प्रेरित करना--२०७, २३ समुद्र पार करना--मैनाक से भेंट--२०८

इन्द्रकोड २११-२७६ हनुमान्‌ का लका में प्रतेश--२१३, लकिणी का हनुमान्‌ को रोकना--

२१४, हनुमान्‌ का लका में सीता का अन्वेषण --- २१५, हनुमान्‌ का रावण के अत पुर में प्रवेश करना--२१६, हनुमान्‌ का रावण के उद्यान में जाना--२१८, हनुमान्‌ की सीता से भेंट--२१६, सीता से रावण का प्रलाप--२२०, सीता का रावण की निन्‍्दा करना--२२२, &€ मनन्‍्दोदरी का रावण को उपदेश--२२३; १० राक्षसियो को सीता को दुख देना--२२४, ११ त्रिजटा का स्वप्न--२१२४, १२ हनुमानू का सीता को राघवों का वृत्तात सुनाना--२२५, १३ हनुमान्‌ का सीता को राम की अंगूठी देना--२२६, १४ सीता का सदेह--२२६, १५ अशोकवन का ध्वस--२३०, १६ हनुमान्‌ का राक्षसों का वध करना--२३१, १७ अक्षयकुमार का हनुमान्‌ पर आक्रमण करना--२३५, ६८ इन्द्रजीत का हनुमान्‌ को बन्दी बताना-- २३७, १६ हनुमान्‌ का रावण को अपने आगमन का कारण बताना--श१३८, २० लका-दहव--२३६, २१ अगद आदि वानरो से हनुमान्‌ की भेंट--२४२, २२ वानरो का मधुवन में विचरण करना--२४३, २३ राम को सीता का कुशल-समाचार सुनाना-२४४

सु्द्धकांड २४७४-७७४७ श्रीराम का हनुमान्‌ की प्रशसा करना--२४६, लका के वैभव का वर्णन--

२५०, हे कपिलसेनाओ की युद्ध-यात्रा--२५२, महेन्द्र पर्वत से राम का समुद्र

को देखना--२५३, सध्या-वर्णन--२५४, मत्रियों के साथ रावण की मत्रणा-- २५५, दानव-वीरो के दर्पपूर्ण वचन--२५६, ए८ राक्षस-बीरों को विभीषण का उपदेश---२५७, रावण को विभीषण का हितोपदेश--२५८, १० कुभकर्ण को सीता- पहरण का वृत्तात सुनाना--२६०, ११ इन्द्रजीत का विभीषण को अपने पराक्रम का परिचय देना--२६२; १२ विभीषण द्वारा इच््रजीत के दभ की निदा--२६२, रावण का विभीषण को नगर से निर्वासित करना--२६३, १४ विभीषण का अपनी माता के भवन में जाना--२६५, १५ विभीषण की शरणागति--२६६, १६ हनुमान

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का विभीवण की योग्यता राम को समावा--२६७, १७ विभीषण को स्तुति---२६८; १८ त्रिकूट पत्रत की उत्पत्ति की कथा--२६६, १६ विभीषण का राम को रावण के बैमव का परिचय देता--२६६, २० राम का विभीषण को लका का राजा वबनाना-- २७१, २१ शुक्र का सदेश--२७१, २२ राम का दर्भ-जयतन--२७२, २३ राम का समुद्र पर ब्रह्मास्त्र का प्रशोग करता--२७३, २४ समुद्र का राम से प्रार्थना करना-- २७५, २४ सेतु-बन्धचन के लिए राम का सुग्रीव को आज्ञा देता--२७६, २६ सेतु- बन्धत--२७७, २७ चन्द्रोदयय का वर्णव--२७७, २८ गिल॒हरी की भक्ति--२७६, २६ सेतु को देखकर राम का हित होता--२००, ३० राघवों का सुवेलादि पर पहुँचना--२८१, ३१ कैकसी का हितोपदेश---२८२, ३२ शुक तथा सारण का राम की सैन्य-शक्ति का परिचय पाना--२१८४, ३३ सारण का रावण को कपियो का परिचय देतना--२८५, ३४ शुक्र का रावण को राम का पराक्रम सुनाना--२८७, ३४५ राम के माया-बतुष तथा सिर दिखाकर सीता को भयभीत करना--श१८८, ३६ माल्यवान्‌ का हितोपदेश--२६०, ३७ सूवेलादि पर से राम-लक्ष्मण का लका को देखना--२६२, ३८ रावण तया सुग्रीव का दद्व-युद्धझ--२६३, ३६ अगद का दौत्य--२६५, ४० रावण का अपना वैभव प्रदर्शत करना--२६७, ४१ रामका रावणके छत्र-चामरों पर अस्त्र चलाना--२६८; ४२ रावण का राम की घनतुविद्या का प्रशसा करना--२६६, ४३ वानरोका लका ध्वस करना--२६९, ४४ राक्षसों तथा वानरों का भीषण सग्राम-- ३००, ४५ युद्धभूमि का वर्णन--३०२, ४६ इन्द्रजीत का माया-युद्ध--३०४, ४७ नाग-पाजवद्ध दाशरथियों को देख सीता का दु खी होना--३०६, ४८ लक्ष्मण के लिए राम का विलाप करना--३ ०८, ४६ विभीषण तथा अगद का वानरो को घैर्य देता-- ३०६, ५० नारद का आगमन--३१०, ५१ राघवो का नाग्र-पाश से मुक्त होता-- ३१०, +*२ घपूम्राक्ष का युद्ध--३१२९, ५४३ जकपन का युद्धझ३१३, ४४ महाकाय का युद्ध--३१५, ५५ अगद के द्वारा महाकाय का सहार--३१६, ५६ प्रहस्त का युद्धब-३२०, ५७ नील के द्वारा प्रहस्त का वध---३२२, ५८ मदोदरी के हित-वचन-- ३२३, ५६ मदोदरी की मत्रणा की उपेक्षा करता--३२४, ६० रावण का प्रथम युद्धड-३२४, ६१ विभीषण का राम को राक्षस-त्वीरो का परिचय देना, ६२ हनुमान्‌ का रावण से युद्ध करके मूच्छित होना--३२७, ६३ नील का रावण से युद्ध करता-- ३१८, ६४ रावण का ब्रह्मणजक्ति से लक्षण को गिराना--३२६, ६५ राम-रावण का प्रथम युद्ध३३०, ६६ रावण का खिन्न होकर लका लौट जाना--३३१; ६७ राक्षमों का कुमकर्ण को जगाना---३३१, ६८ राघवों की युद्ध-यात्रा पर कुमकर्ण का ऋ्रद् होता--३३३, ६६ कुमकर्ण का शाप-ृत्तात---३३५, ७० कुमकर्ण का हितोपदेश--- ३३६ , ७१ रावण का कुमकर्ण के उपदेश का तिरस्कार करना--३३८ , ७२ कुभ- कर्ण की गर्वोक्तियाँ--३३६, ७३ कुभकर्ण का युद्ध के लिए जाना--३४०, ७४ वानर- कुमकर्ण का युद्ध--३४१; ७५ कुभकर्ण और हनुमान्‌ का युद्ध--३४४, ७६ सुग्रीव तथा कुमकर्ण का युद्ध-३४५, ७७ कुभकर्ण का मूच्छित सुग्रीव कों लका ले जाना--३४५, ७८ कुमकर्ण का वानर-सेना को तहस-नहस करना--३४६, ७६ विभीपषण कुभकर्ण बौर का

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वार्तालाप---३४८, 5८० श्रीराम के द्वारा कुभकर्ण का सहार--३५०; ८१ कुभकण की मृत्यु पर रावण का शोक--३५१, ८२ अतिकाय तथा महोदर आदि राक्षसों की युद्ध यात्रा--३५२, 5रे अगद तथा नरातक का दढ्-युद्धझ--३५५, एछ४्ं देवातक तथा त्रिशिर का अंगद पर आक्रमण करना--३५६, ८५ हनुमान्‌ आदि वीरो के द्वारा त्रिशिर आदि राक्षयों का वब--३५६, ८६ अतिकाय का युद्ध--३५७, ८७ लक्ष्मण तथा अतिकाय का दन्द्व-पुद्ध---१६०, ८८ अतिकाय का वध--३६१, 5६ इद्रजीत का द्वितीय युद्ध-- २६२, ६० ब्रह्मास्त्र से इच्रजीत का राम-लक्ष्मण आदि को मूच्छित करना--३६४; ६१ हनमान्‌ का ओषधी-शैलः लाकर वानरो की मूर्च्छा दूर करना--३६६, ६२ वानरो का लका जलाना--३६८, ६३ कुभ-निकुभ का युद्ध के लिए प्रस्थान--३६६, सुग्रीव के द्वारा कुभ का वध--३७२, ६५ मकराक्ष का युद्ध--३७३, ६६ इन्द्रजीत का तूतीयः युद्ध--३७४, €७ इन्द्रजीत का होम करता तथा कृति नामक शक्ति प्राप्त करना--३७५, &८ रामका आग्नेय अस्त्र से इन्द्रजीतः की मायाकों दूर करनता-- २३७६, ६६ इन्द्रजीत का यज्ञ करके रथप्राप्त करता--३७८५, १०० इन्द्रजीत का माया-सीता का सिर काटना--३५१, १०१ इन्द्रजीत का निकुभिल-यज्ञ करना--३८२, १०२ लक्ष्मण का शोक--३८३, १०३ इन्द्रजीत की माया को विभीषण का राघवों को समभझाना--३८४, १०४ लक्ष्मण का युद्ध के लिए प्रस्थान--३८५, १०४ निकुभिल- होम में विषध्त--३८५, १०६ लक्ष्मण तथा इन्द्रजीत का परस्पर तिरस्कार के वचन कहना--३८६, १०७ इन्द्रजीत तथा लक्ष्मण का युद्ध--३८७, १०८ इन्द्रजीत का वध--३६०, १०६ इन्द्रजीत की मृत्यु पर रावण का शोक--३६३, ११० रावण का सीता का वध करने के लिए जाना--३६४, १११ इन्द्रजीत की स्त्री सुलोचना का शोक--३६५, ११२ सुलोचना का राम की स्तुति करना--३६७, ११३ सुलोचना का सहगमन--३६६, ११४ रावण का अपनी प्रधान सेता को युद्ध के लिए भेजना-- ४००, ११५ वानर-सेना को हनुमान्‌ आदि का प्रोत्साहन देना--४०२, ११६ राक्षस- स्त्रियों का रावण की निन्‍दा करना--४०३, ११७ रावण का द्वितीय युद्ध--४०४५, १६८ सुग्रीव के ब्वारा विख्पाक्ष आदि राक्षसों का वध--४०७, ११६ रावण का राघवों पर आक्रमण करना--४०६, १२० रावण की शक्ति से लक्ष्मण का मूच्छित होना-- ४११, १२१ रावण का चिंतित होना--४१२, १२२ लक्ष्मण की मूर्च्छा पर राम का शोक--४१४, १२३ सजीवनी लाने के लिए हनुमान्‌ का द्रोणाद्वि को जाना--४१५, १२४ कालनेमि का वृत्तात--*१६, १२५ मकरी का हनुमान्‌ को निगल जाना--४१८, १२६ धान्यमालिनी का वृत्तात--४१९, १२७ कालनेमि का वध--४२१, १२८ भरत का स्वप्त--४२२, १२६ हनुमान्‌ का माल्यवाम्‌ से युद्ध करना--४२३, १३० लक्ष्मण को लिए राघव का शोक--४२४, १३१ हनुमान्‌ का द्रोण-पर्वत ले आना--४२६, १३२ सजीवकरणी से लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर होता---४२७, १३३ रावण का शुक्राचार्य से परामर्श करना--४२६, १३४ पाताल-होम--४२९६, १३५४५ अगद का मदोदरी को रावण के पास घसीटकर लाना--४३१, १३६ रावण को मन्दोदरी का राघव की

( २४ )

महिमा बताना--४३३; १६७ रावण का तुतीय यद्ध के लिए प्रस्थान--४३५; १३५ वानरो के द्वारा खडगरोम आदि राक्षसों का वव--४३७, १३६ इन्द्र का मातलि के द्वारा राम को रब भेजना--४३८, १४० राम का रावण के वाणों का प्रतिवाण चलाना-- ४४०, १४१ रावण का राम पर शूल चलाना--४४०, ६४२ अगस्त्य के द्वारा राम को बादित्यहृदय का उपदेश---४४१, १४३ राम-रावण का परस्पर दोषारोपण--- ४४२; १४४ रावण की मूच्छा--४४३, १४५ रासका रावण के कर चरणो को खडित करना--४४५, १४६ आग्नेय अस्त्र के प्रयोग से रामका रावण को जक्तिहीन कर देवा--४४७, १४७ ब्रह्मास्त्र से रावण का वव--४४८, (६४८ विभीषण का झोक-- ४४६, १४६ मृत रावण के निकट सदोदरी का आना--४४६, १५० मदोदरी का विलाप--४५१; १५१ राम का विभीषण के द्वारा रावण की अंत्येप्टि कराना--४५३; १५२ विभीषण का राजतिलक--४५४, १५३ हनुमान्‌ का सीता को राम की विजय का समाचार देना--४५४; १५४ राम के आदेश से विभीषण का सीता को लिवा लाना---४५५; १५६ सीता का अग्निप्रवेश---.४५७, १५७ सीता-परिगहण -- ४५०; १५८ दगरथ के दर्गबन--४५९६, १५६ देवताओं का अभिनन्दन--४६०, १६० पुष्पक- बारोहण---४६१; १६१ श्रीरास का सीता को विभिन्न दृष्यो को दिखाकर समझाना-- ४६२; १६२ राम के द्वारा शिवलिंग का प्रतिप्छापन---४६३, १६३ श्रीराम का सेतु को महिमा वताना--४६५; १६४ भरद्वाज मुनिका आतिथ्य--४६७, १६५ हनुमान का भरत को राघवों का कुशल-समाचार सुनाना--*६६, १६६ भरत-मिलाप---४७१, १६७ अयोध्या में प्रवेश---/9३; १६८ राजतिलक---४७४; १६९ मित्रों को प्रीतिभोज देवा--४७५

रंगनाथ जग़माथण

श्रीरंगनाथ जरमाथण

(बालकाँड)

१. देव-स्तुति

चरित रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तर एककमक्षर प्रोक्त महापातकनाशनम्‌ रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे, रघुनाथाय नाथाय सीताया पतये नम

श्रीलक्ष्मीनाथ, दैत्य-विजयी, लोक-रक्षक, नित्य, सदानद, मोक्षदायक, कर्म-रहित, सृष्टि के स्वयभूत आधार, हृदय-कमल में स्थित भक्ति-रूपी आनन्द को व्यक्त करने के साधन-क्रम में तत्पर भुमर-हूपी भगवान्‌, गजराज को मोक्ष प्रदान करनेवाले, अपने आश्वित-लोक के वधु, ससार के बधनों से मुक्ति देनेवालें, वलि को बाँघने का दृढ़ सकलप करनेवाले, प्रणव-रूप, गोपिकाओ के हृदय में विहार करनेवाले, अबोध-गम्य आकारवाले, निराकार, योगियों के हृदय में ओकार-छूप में वत्तं मान, योगिसदर्णित, मोक्ष-प्रचारक, श्रुतियों के शिरोमणि, विश्युद्ध-चेतन्य स्वरूप, अतिलोकवासी, समस्त लोको का आश्रय, ब्रह्माण्डरूपी मुक्ता का आयतन, नित्याधार, अखिन तक्त्तानीत, आदि-अत्त-रहित, पवित्रात्मा, अविनाशी, वेद-रप्री कमल के लिए सूय, अक्षीण कल्याणो का आधार, निशशक मन से सद्भक्ति तथा सेवा करनेवाले भकतो के लिए दया-सिधु, करुणा-सिघु, बोधक, वोध्य तथा बोध--इन तीनो में व्यकत होनेवाले पूर्ण-रूप,

& रंगनगाथ एयायण

आदितत्व, तत्त्वमसि' आदि कथनानुसार भेदातीत, अभेद, प्रतापी परमेश्वर का (भक्ति-युवतत ध्याव करने के निमित्त) मैंने अत्यत वैर्थ के साथ नियमों का पालन किया, कर्म के बबनों को ठकराया, एकात में रहते हुए इन्द्रिय-व्यापारों को भुला दिया, सुस्थिर होकर सुलभ- साध्य तथा परिचित आसन (सुखासन) पर उपविप्ट हुआ, मन को भक्ति-रस-परिपूर्ण बनाया, (शरीर के भीतर रहनेवाली) वह॒त्तर नाडियो का विचार करके उनका परिमार्जन किया, एकचित्त तथा निर्मल मन से ताडियो में अत्यत सूक्ष्म रूप से व्याप्त पवन को रोका, मन को निव्चल बनाकर निरुद्ध प्राण-वायु को मूलाधार-चक्र मेँ प्रविप्ट कराया और उसे क्रमण. छह कमलों को पार कराते हुए चदमडल में पहुँचाया वहाँ योगीन्द्रों के हृदय का भेद परखने के लिए परम-व्योम के रूप में स्थित अनादि ब्रह्म-स्वरूपा, अत्यत सूक्ष्म तथा निर्मेल नाडी को यूप, अविचल मन को यज्ञ-पत्रु, निप्ठानुरक्ति को बेदी, समस्त इन्द्रियों को काप्ठ, ज्ञान को अखड अग्नि तथा आनदन्योग को यज्न-फल के रूप में मानते हुए इच्छित- आनद-प्राप्ति के हेतु, कर्म के द्वारा प्राप्त होनेवाले मोक्ष रूपी परमेश्वर, अगोचर, कर्म-रहित, हमारे देव, कमलनत्रवाले, हमारे पालनहार, आदि नाराबण तथा अखिल लोकार्घीश की भक्ति, स्तुति, प्रार्थना एवं वदना की अपने मन की इच्छा पूर्ण करने के निमित्त हार, कर्पूर, नीहार, गोक्षीर तथा तारको के सदृश उज्ज्वल चारदा देवी की उपासना की; चारु रामायण-रूपी चंद्र के जन्म-स्थान के रूप में विलसित होनेवाले वाल्मीकि का स्मरण किया, भारत-रपी मजरी के पारिजात, तत्त्ववेत्ता परागर-पुत्र का स्मरण किया और उनके पुत्र शुकदेव की उडी भक्ति से स्तुति करने के पद्चात्‌ में अपने मन में एक ऐसे ग्रन्थ की रचना करने का विचार करने लगा, जिसकी कथा के कथन से सभी सज्जन मेरा कीत्ति-गान करेंगे, जिसकी कया का वर्णन करने से मेरे इह-लोक और पर-लोक दोनो सफल होगे और जिस कथा के कथन से ईप्सितार्थ सिद्ध होगे और साथ-ही-साथ पुण्य की प्राप्ति होगी

२. श्रन्थ-रचना का कारण

सृष्टि के समस्त प्राणी, जिस पुण्यात्मा की प्रणसा बडे आदर से करते हे, जो सदा- चार के पुण्य-फलस्वरूप सूर्य के समान उदित होकर कलिकाल का अघकार दूर करते थे, जो श्रेप्ठ वर्म-पयय का महत्त्व जानते थे, जिनके पवित्र तेज के समान झत्रु-रूपी नक्षत्रों के प्रकाश मद पड जाते थे, जिन्होंने अपने खडग की दीप्ति-रूपी गगा-प्रवाह में अन्य राजाओं के ललाट में लगे गर्व-पयक को थो दिया था, असमान वलशाली, सत्यनिष्ठ, शरणार्थी राजा-हूपी भूमरो के लिए (जिनका कर-कमल) आधार था, ऐसे कोनकाट भूपति के वज की कीत्ति वढाते हुए नय, विनय, दया के आगार महाराजा के पुत्र गोनरुद्र नरेंद्र महान प्रतापी तथा पवित्रात्मा थे उनके पीत्र बुद्ध भूषाल अभग, अग्नतिम विक्रमी, कुल-गोत्र के सवर्दधक, देवेद्ध के समान वैभवणाली, थीर और विख्यात थे उनके पुत्र अक्षीण दाक्षिण्य- बनी (अर्थात्‌ अक्षीण कृपावाले), धन-वान्य में कुबेर, मर्म में घर्मराज (युधिप्ठिर) के समान अति-पुण्य सौजन्य-्शील, अत्रुओ के लिए अति शौर्यवान्‌ वामदेव कारत्तिकेय, शुभजन्मा, कामिनियो के लिए कामदेव, अखड विक्रमी और रण-विश्ञारद थे वें चदन, मदार-चद्विका- हार, कदली, कुद, इदु सम उज्ज्वल कीर्निमानू, गोनवश-रूपी पारिजात के फल-स्वरूप

बालकाड 2

दीखनेवाले, गोनवश-रूपी उदयाद्वि पर भानु-सम दीप्त होनेवाले, गोनवश-रूपी क्षीरसागर के (उत्पन्न) चद्र सम सुशोभित, अपनी कीत्ति को दिगू-दिगतो में व्याप्त करनेवाले, अपने दान-धर्म के ह्वारा सबकी प्रणसा प्राप्त करनेवाले, अपने असमान पौरुष से वडी आसानी से शत्रुओं का नाश करनेवाले, महा बलणाली एवं प्रतापी राजाओं के लिए वज्ञपाणि सम दीखनेवाले, (शत्रु) नृप-वन के लिए साक्षात्‌ अग्निदेव, सत्यनिप्ठ, महावलशाली बत्रु-सेनाओ को मथने में मयर पर्वत की भाँति प्रचड रूप धारण करनेवाले, अपने खड्ग-रूपी सूर्य-विम्व की प्रभा से प्रतापी राजा-रूपी अधकार का नाश करके अमर-वधुओ के सुख-कमलो को वीर-मूमरो से अलकृत करनेवाले, शत्रुओ के प्राण-रूपी अनिल का सेवन करखेवाले श्रेष्ठ भुज-भुजगो ( सर्प-रूपी भुजाओं ) पर राज्य-भार वहन करनेवाले थे, वे कुरु, केरल, अवती, कुतल, द्रविड, मरु, मत्स्य, करुष, मगध, पुलिद, सरस, पाण्ड्य, कोसल ओर बर्बर की राज- सभाओ में प्रणसा प्राप्त करनेवाले, साम-दाम-भेद आदि नीतियों में निपुण, प्र।चीन राजाओं के समान समस्त बेभवों से युक्त तथा नय, विनय आदि उपायो से सुस्थिर विजय प्राप्त किये हुए, यशस्वी विद्वुलनरेश, राजाओ में सर्वज्ञ, नरेशों से पूजित, सफल जगद्धित- चातुय्यं-घुरी, एक दिन अपनी राज-सभा में चैठे हुए थे उस समय पुराणवेत्ता, जास्त्रन्, काव्य-ताटक-शिरोमणि, मित्र, मत्री, पुरोहित, आश्वित, पुत्र, सामत राजा और बवहुश्ुत उनकी सेवा में उपस्थित थे राजा भूलोक के देवेन्द्र के समान बडे उत्साह से रसिकजनों द्वारा भारत, रामायण आदि का पाठ सुनकर बहुत प्रसन्न हुए

तत्पश्चात्‌ वे रसिक-णेखर (राजा) राम-कथया-सुधा से अनुरक्त हो, सभा में यो बोले-- तेलुगू में रामायण को सुदर ढग से कहने की कविता-शवित रखनेवाले कवि इस ससार में कौन हे ? तब पडितो ने उस उदात्त, यशस्वी विट्वुलनरेश से कहा-- -

(महाराज) आपके सुपुत्र, निपुण, पापरहित, नीति-निष्ठ, सर्वज्ञ, अनघ, शिप्ट-सपन्न, सर्वपुराणवेत्ता, सुदर कलाओ के मर्मज, सज्जनों को आश्रय देने में ही सुख का अनुभव करनेवाले, कविसावंभौम, कवि-कल्पतरु, कवि-कुल-भोज, कवीच्, शत्रु-राजाओ के लिए वज्ञ- पाणि, शत्रु राजा-हझपी वन के लिए प्रवण्ड पावक के समान दीखनेवाले, जिनके भयकर खड्ग में स्वर्गलोक तक प्रतिबिबित है, त्रिलोक-दुर्दम, श्रेष्ठ-साधु-जन-रूपी कमलो के लिए

- सूर्य, पुरुषश्नेप्ठ, आपके परम भकक्‍त, निखिल शब्द, अर्थ, गुण आदि के ज्ञाता, महापडित, रामायण के मर्मज्ञ बुद्ध-नरेश (रामायण को कथा तेलुगु में कहने की) कविता-शक्ति रखते है (काव्य रचने के लिए) आप उन्हें आदेश दें ।”

यह सुनकर उदात्त चरित्रवाले मेरे जनक ने मुझे बडे स्नेह से बुलाकर यह आदेश दिया--रामायण की कथा पुराणों के ढग पर तेलुगु भाषा में मेरे नाम पर लिखो कि ससार के कवि और पडित उसकी प्रशसा करें ।” उनके मृदु वचनो से अत्यत हर्षित होकर उनकी आज्ञा का पालन करने के हेतु शत्रुओं के लिए भयकर मूत्ति, महानू, ललितसदुगुणा- लकारवाले, निश्वल दयालु, धन्यात्मा तथा पृण्पात्मा मेरे पिता विट्वलनरेश के नाम पर श्रीरामचन्द्र का चरित्र, इस ढंग से लिखूँगा कि राजा, पडित, रसिक, सुकवि श्रेप्ठ, गोष्ठियों में (उसे सुनकर) ह्षित होकर उसकी प्रशसा करेंगे और जिसमें, शब्द, अर्थ, भाव,

दि एस्यगनाशत्र स्यायण

गति, पद, बब्बा, अर्थ-गौरव, बति, रस, कल्पना, प्रासन, अस़मान रीतियाँ जादि होगे और आदि कवि वाल्मीकि की कृपा से सभी सज्जन मेरी प्रशंसा करेंगे क्या का प्रारभ यो है-- ३. कंथा का प्रारंभ

एक दिन श्रेष्ठ तपस्स्वाध्याय-निरत, महान्‌ शीलवान्‌ मुनिश्वेप्ठ नारद से अनघ, तयोनिधि वाल्मीकि ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया--हें मुने, आप कृपया वतलाइए कि इस ससार में, श्वोमान्‌, क्षमाणील, पृण्यात्मा, उन्नत, नीतिज्, प्राज्ष, दुर्दम, उत्तम, जितकाब, अजेय, ईप्याहीन, सपन्न, सृत्रती, उदार और चउरित्रवान्‌ कौन हैं ? किसके क्रो से इद्रादि देवता डरते रहते है ? ऐसा व्यक्ति क्या, कभी हुआ हूँ या आगे चलकर इस पृथ्वी पर जन्म लेनेवाला हैं ?”

बे

यह सुनकर लोकजाता नारद मुनि ने अपने मन में बहुत देर तक सोंच-विचार कर क्हा-- इस पृथ्वी पर श्रीविष्णु, महाराज व्चर्थ के यहाँ जन्मे हे वे नियतात्मा, अति- चौर्यनिधि, कृपानिधि, जयी और स्वजनों की रक्षा में विचक्षण हेँ। वे कबु-कवर, सुदराकार, विवादग ओप्ठ, पीन वक्ष, विद्याल-नेत्र, विजाल जवतस और आजानुवाहु हैँ वे नियतात्मा, वेदवेदाग-कोविंद बेंदविदु, विवेकभृूषण, सूर्य के समान तेजस्वी, समुद्र के समान गमीर, अमराद्ि के समान घोर और पृथ्वी के समान क्षमागील हे उनकी मूर्ति (लोगो को) बपनी जोर आहृप्ट करती है | वे कौसल्या के आानद-दाता, श्वीकर, दीप्तिमानू, त्रिलोक- पावन मूर्ति, राम के नाम से अवतरित हुए है

नर

कप

राजर्पि (विव्वामित्र) के (रामचन्द्र को) मॉगने तथा राजा के भेजने पर वे मुनि के साथ सये (उन्होंने) यज्ञ की रक्षा की, दानवी का नाज्ञ किया, राक्षसो का सहार क्या, झिला को स्त्री बनावा, जिव-बनुष को तोड़ा जौर सीताजी से विवाह करके बडी स्थाति पाई मीताजी के साथ जगेब्या जाते समय बड़े क्रोध से विप्र (प्रणुराम) ने बाकर उन्हें रोका, तो वे उनसे जूक पडे और उनका बयुप छोनकर उसे तोड़ डाला उसके वाद सव लोगों के हृव्यों को आनद ने भरते हुए वे अण्ोब्या पहुँचे

जब पिता (राम को) युवराज वतारऊँगा--ऐसा कहकर अयोध्या का राज देते को उद्चत हुए, तव ढोठ मबरा ने कैकेयी के कान भरे कंकेयी पहले ही युद्ध में दो वर प्राप्त कर चुकी थी। (राजा ने) राघव को कानन में भेज दिया पिता के वचन से वंँबकर, वें सीता और लक्ष्मण के साथ वन में गये, जहाँ उन्होंने बड़े उत्साह से वनों में

में तपस्या करनेवाले सण्मी मूनियों की रक्षा की, खर-दूपणादि राक्षमों के सर चारो से काट डाले,

प्यमूक पर्वत पर सुग्रीद से मित्रता की, एक ही वाण से वालि का सहार किया, (त्तीता को पुत्र प्राप्त करने का) दृढ़ निः्रय करके सेतु को वाँचा तथा पापी दशक्ठ के दसों सिर छकाठ घडाने

उसके पच्चात्‌ आशज्ितों के कन्पवृक्ष रामचद्र, सीता के साथ,

वनचर-समूह तथा इन्द्रादि देवताओं द्वारा स्तुति किये

जाते हुए और खंवा प्राप्त करते हुए, (अबोध्या) जाये और अउतो पृज्य सामूज्य-लक्पो का पालन करते हुए तथा प्रजा को सुख पहुँचाते हुए कृत- इत्वय हुए हैँ ॥”

बालकाड

ईंस प्रकार श्रीराम का चरित्र अथ से इति तक कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को घले गये मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि अत्यत हुं से अपने शिष्य भरद्वाज के साथ सज्जनता की मूत्ति, अकलुष जीवन-युक्‍्त, तमसा नदी के तट पर गये और उस नदी के जल से अपने अनुष्ठान का पालन करते रहे उस नदी के किनारे (पेड पर) क्रौच पक्षियों का एक जोडा बडे प्रेम से मिलकर बैठा था एक व्याध ने जब उनमें से एक को मार गिराया, तब क्रौची शोक से विलाप करते लगी यह देखकर न्याय और धर्म का विचार करके मुनि उस व्याध पर क्रोध करते हुए बोले--हे निषाद, हे पापी, इन्होने तुम्हारा क्‍या बिगाडा था ? जब ये क्रौच बड़े प्रेम से मिले, तब तुमने इस प्रकार एक को क्यो मार गिराया ? इस पाप के कारण तुम बहुत दुख प्राप्त करते हुए अनेक वर्षों तक भटकते रहोगे ।”

इस प्रकार व्याध को शाप देकर वाल्मीकि ने अपने शिष्य भरद्वाज से ठन्दोबद्ध शब्दो में कहा--“मेरे द्वारा कहे हुए बचनो पर बार-बार विचार करने पर मालूम होता है कि इन चार समवर्ण पृक्तियों में छनन्‍्दोबद्धता हैं यह बडे आश्चर्य की बात है कि ये शाप के वाक्य अपने आप एक पद्म के रूप में प्रकट हुए है ।/ तब भरद्वाज आदि शिष्य बडी भवित

००]

से उस पद्य को (दुहराने) पढने लगे अनघ वाल्मीकि अपने आश्रम को लौट आये

एक दिन ब्रह्मा उनके आश्रम में आये वाल्मीकि ने उनकी अग॒वानी की, चरणों पर भुककर नमस्कार किया, कुशासन पर बिठाकर उनकी पूजा की और हाथ जोइकर अपने मुह से निकले छन्दोबद्ध शाप-वचन उन्हें सुनाया तब ब्रह्मा ने मुस्कुराकर कहा--हे अनघ, यह वाणी पद्म के रूप में आपके मुख से व्यवत हुई है नारद ने सारा राम-चरित मुझे सक्षेप में कह सुनाया है आप उसको विस्तार के साथ सुनाइए अपने आप वह चरित्र आपको सूक जायेगा ।” यो कहकर ब्रह्मा चले गये

इस प्रकार बडी ऋपापूर्वक कमलासन के वर देकर चले जाने के पश्चात मुनि ने निर्मेल मति से ध्यान लगाकर सोचा और रघुचरित, दशरथ की कथा, रघुराम का जन्म, राम का आचरण, ताडका-वधघ, उदृण्ड राक्षसों का गवें-भग, यज्ञ-रक्षा, गगा का महत्त्व, गौतम की स्त्री का श्ाप-मोचन, धनुर्भग, सीता-विवाह, अयोध्या जाते समय परशुराम का क्रोध, राम के युवराज्याभिषेक की तैयारी, दुष्ट स्त्री कैकेयी के कदुवचन, अभिषेक में विध्न, राम-वन-गमन, राजा का शोक, दशरथ की मृत्यु, दाशरथि से गृह की भेंट, गगा पार करना, तपोनिधि भरद्वाज से (राम की) भेंट, चित्रकूट पर्वत पर पहुँचना, भरत और राम की भेंट और उनका पादुका प्राप्त करके लौट जाना, दडकवन-गमन, प्रचड विराध का वध, पुण्यात्मा शरभंग के दर्शन, मुनियो को वचन देना, अगस्त्याश्रम में पहुंचना दिव्य अस्त्रो की प्राप्ति, मुनि के आदेशानुसार पर्ण-कुटी बनाकर निवास करना, (राम पर) मुग्ध होकर राक्षसी (शूप॑णखा) का आना, उसके साथ वार्त्तालाप, रामानुज के द्वारा उसका नाण, उधर रावण का वुद्धि-भूष्ट होना, कुटिल मारीच की मृत्यु, राक्षसराज (रावण) के द्वारा सीता- पहरण, राम का विलाप, जटायु की मृत्यु, कबध से भेंट, पपासरोवर को गमन, ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव से भेंट, उससे मित्रता, वालि-सुग्रीव के वैर का कारण जानना, श्षीराम का एक साथ

दर रंगनाथ एयायण

सातो ताड़ के पेड़ो को काट देना, वालि का वध, दारा का बिलाप, रविपुत्र (अगद) का राज्याभिषेक, माल्यवत में उस पुरुषोत्तम का वर्षा-काल विताना, काकुत्स्थ (राम) का कोप, कपियो का आना, अगूठी देकर (उन्हें) भेजना, वानरों के द्वारा सीता का अथक अन्वेषण, बिल का दर्शन, महेन्रगिरि का आरोहण, सपाती से भेंट, समुद्र को लॉघते समय वीच में मैनाक के दर्शन, सिंहिका की वायूपुत्र से मुठभेड और उसकी मृत्यु, लका राक्षसी को तग करना, उस स्त्री से लका का मार्ग जानकर लका में प्रवेश करना, अत पुर में सीता की खोज, अशोकवन का अवलोकन, वहाँ सीताजी का सदर्शन, विश्वास दिलाने के लिए अगूठी देकर उन्हें सान्‍्त्वना देना, अणोकवन को उजाडना, उस समय हनुमान्‌ का अक्षयकुमार को मार डालना, पवनसुत का वधन में पडना, लका नगर को जलाना, मानिनी सीता का चूडा- मणि देकर श्रीराम तथा हनुमान को उत्साहित करना, सूर्यकुलाधिप (श्रीराम) का लका प्र आक्रमण करना, समुद्र-तट पर पहुँचना, समुद्र का मार्ग देने से इनकार करता, श्रीराम का क्रोध, विभीषण का आगमन, विभीयण के दुख से राम का दु-खी होना, सेतु-बधन, जलधि को पार करना, सेना को (उचित स्थानों पर) नियुक्त करना, पराक्रम के साथ कुभकर्ण आदि उम्र वीरों को मार डालना, रावण का वबंब करना, दया से विभीषण को लकाधिपति बनाना, अनुपम शुद्धि (सीता का अग्नि-प्रवेश), ब्रह्मादि देवताओं द्वारा प्रशसित होते समय सीताजी की रामचद्रजी से भेंट, पुष्पक विमान में बडे कुतृहल के साथ समुद्र पार करना, सेतु पर श्रीकठ को प्रतिप्ठित करना, अयोध्या को लौट आना, भरत-मिलन, अद्वितीय ढग से रघुराम का सिहासनारूढड होना, कपि सेनापति, सुग्रीव, विभोषण आदि को विपुल सपत्ति देकर विदा करना, बडे प्रेम से सब प्रकार से प्रजा की रक्षा करते हुए उनका पालन करना, आदि सब वारतें अच्छी तरह जानकर चौवीस हजार इलोको और पाँच सौ सर्गो में तथा छह काडो में रामायण की रचना की वाद की कथा उत्तर-काण्ड में लिखकर वाल्मीकि मुनि सोचने लगें कि कौन इस कथा का पाठ करने में समर्थ होगे और पृथ्वी में यह कथा कैसे फैलेगी ? उसी समय, शुद्धात्मा, मनसिजाकारवाले, मजुमाषी, सगीत-साहित्य-वेत्ता, मुनिवेषधारी कुश और लव उनके पास आये और हाथ जोडकर बोलें---हें अनघ, हम बडे उत्साह से रामायण पढने आये हे, हमें पढाइए (यह सुनकर) ह्पषिंत होकर सुनि ने सोचा, मेरा मनोरथ पूरा हो गया उन्होंने राम का चरित्र, जो ग्रेय, पठनीय तथा पुण्यदायक है, तत्री-लयान्वित रीति से उन्हें पढाया उन्होंने भी श्वगारादि रस, वृत्ति-मेद, सधि, समास, शब्द और अर्थ जानते हुए उसका अध्ययन किया और स्थान-स्थान में, मुनि-समराजों में उसका गान करते हुए उनकी प्रणमा पाते रे काकुत्स्थव्लभ (राम) ने भी अपने भाइयो के साथ बड़े कुतृहल से उन्हें सभा में वुला भेजा उनके रूप, उनकी स्थिरता, उनकी वाणी आदि (श्रीराम को) बहुत श्रिय लगे श्रीराम कथा सुनने लगे वह कथा इस प्रकार है--

कलकोॉडे 6 8. कुश-लव का रामायण-गान

कीसल-देश में सरयू नदी के किनारे, पृथ्वी के उरु-भाग के समान अयोध्या नगर सृशोभित था वह बारह योजन लवा, पाँच योजन चौडा थाऔर शिल्प-निपुण मय द्वारा निर्मिंम था वह शत्रु-राजाओ की आँखों में खटकनेवाला नगर सूर्यवशी राजाओं की राज- धानी था वह रत्तमय गोपुर, मणिमय तो<ण, मणिमय कुद्टिम (फर्श ), गवाक्ष, क्रीडा- गृह, $दक शैल (बनावटी पवव॑त), पट्ह-नाद (नगाडे की आवाज), विज्ञालकाय हाथी, उत्तम घोडे, नाता प्रकार के रथ-समूह, सेना, स्वच्छ सौध, वाजार, कमतीय उपवन, सरोवर, तालाब, बावड़ी ऊख के खेत, धान के खेत, गहरी खाई तथा महलो से भरा हुआ ससार- भर में विख्यात था उस नगर में दशरथ नामक राजा राज्यू करते थे, जो धतुविद्या में निपुण, साम, दाम, भेद आदि चार उपायो के ज्ञाता, (भगवान्‌ के ऐश्वर्य आदि) षड़गुणो के आगार, ( इच्छा, ज्ञान एव क्रिया ) शतक्तित्रय-सधानकर्त्ता, धर्मनिरत, कृताध्वर ( जिसने यज्ञ किया हूं), श्रीसपत्न, धर्मशास्त्र, पुराणादि के ज्ञाता, अजनदन, वाल्यावस्था से,निय्रमानुकूल प्रजा का पालन करते रहनेवाले परमपवित्र व्यक्ति, इन्द्र के निभित्त शबरासुर का गर्व भग कर इंद्र से मदार-पुप्पो को प्राप्त करनेवाले, इन्दुमती के पुत्र और सूर्यवश में श्रेष्ठ राजा थे

वे तेज, काति, त्याग, चातुर्य, उदारता, साहस, आदि सद्गृूणो के भाडार थे वें उदित होते हुए सूर्य की भाँति अपने उम्र तेज से सप्त द्वीपो को दीप्त करते हुए शासन करते थे उस नरनाथ के तीन सौ पचास रातनियाँ थी, जिनमें विशेष कर अचल शील- वाली कोसल्या, कुचकुभ-निर्जित परिधानवाली कैकेयी, पुण्यशीला सुमित्रा त्रयी विद्याओं के समान थी इस पृथ्वी पर उनके हिंतैषी पुरोहित वसिष्ठ आदि पुण्य सयमी थे पुण्यात्मा घृष्टि, विजय, सिद्धार्थ, अर्थशाघक, जयत, नीतिवेत्ता अशोक, धीमान्‌ मत्री सुमत्र आदि उनके आठ सचिव थे सभी सचिव परस्पर मित्र और स्वामिकार्य में विचक्षण और चतुर थे वे परम भर्मों के उद्घाटन में निपुण थे और विचार-पूर्वक प्रजा की रक्षा करते थे समस्त कार्यों को सेमालनेवाले ऐसे आठ मत्रियो से युक्त राजा दशरथ अष्टाक्षर और अष्ट- भुजाओं से समन्वित नारायण की तरह सुझोभित थे उनके राज्य में निर्बल, चुगलखोर, रोगी, दरिद्र, व्यभिचारी, अनाचारी, पापी, क्र, नीच, जड, मूर्ख, मद, एक भी व्यक्ति नही था सारी प्रजा मणि-कुडल आदि से अल॒कृत, धर्मपरायण, कुलाचार-निरत, सकलशास्त्र- पारगत तथा विष्णु-भकत थी इस प्रकार बडी कुशलता से राज्य का पालन करते और राज्य-सुब भोगते हुए राजा दशरथ एक दिन अपने मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगे

५. पुत्रकामेष्ठि यज्ञ करने के लिए दशरथ का मंत्रियों से परामर्श

राजा -दशरथ अपनी निस्सतान अवस्था का तथा अपनी ढलती आयु का विचार -करते हुए बहुत दु.खी हुए उन्होने अपने सभी श्रेष्ठ मत्रियों को बुला भेजा और उन्हें उचित आसन पर बैठते का आदेश देकर स्वय भी आसन पर बैठ गये और उनसे इस प्रकार कहने लगे--“मैंने बहुत दान दिये, अनेक धर्म-कार्य किये, कई यज्ञ किये मौर बहुत

.

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९० रंग्न्ल्थ शयरपक

सालो से जीवन व्यतीत कर रहा हैँ मैने बडी कीत्ति पाई है तुम्हारे जैसे स्नेहीं मंत्रियों के रहते हुए मुझे किसी वात का अभाव नहीं हैं| पुत्र-हीन होने का एकमात्र 5 ज़ ह्ठी मक्के है। कुल का उद्धार करनेवाले पुत्रों के विवा कोई भी व्यक्ति पुण्य और स्वर्गलोक क्वी प्राप्ति नहीं कर सकता इसलिए मेरे भी पुत्र उत्पन्न होने चाहिए। समस्त ससार मेरी प्रथना करें, एत्र्थ में अच्वमेध यज्ञ करूँगा और उसके बाद पुत्र-कार्मेप्टि वज्ष करूँगा इन यज्ञों के कारण मेरा हित होगा जोर में जरूर पुत्र प्राप्त करूँगा | राजा के यो कहने प्र वे सब बड़े सभुमचित्त होकर मन में हर्षित हुए उन्हें प्रसन्न देखकर राजा मन में विचारकर वोले-- में जनुपम रीति से, बडे विनय के साथ अव्वमेब यज्ञ करूँगा, जिसकी प्रणसा देवता करेंगे और पुत्रों के लिए पुत्रकामेप्टि-यम चेत्र-पर्व रीति (दर्मकों की आँखों को तृप्ति देनेंदाली रीति) से करूँगा | ऐसा कहकर उन्होने आवश्यक प्रवन्ध करने के लिए सब लोगो को भेजा उसी समय अनघ वसिप्ठ आदि मुनि वहाँ आये (राजा ने) दण्डवत की और वडी श्रद्धा से उन्हें लिवा लाये और उनसे बोले--हे महान्‌ सबमी तथा पुण्यवान्‌ वसिष्ठ ! यथाओघक्र आप मुझे श्रेष्ठ अच्वमेव ये करवाइए, जिससे मुझे एक पुत्र की प्राप्ति हो 7 इस पर (मुनि वोले)--(तुम्हारे द्वारा सपन्न होनेवाले अब्बमेध यज्ञ का निर्वाह हम करेंगे उस श्रेप्ठ यज्ञ की महिमा का वर्णन करना क्‍या सहज हैँ ? इसके अतिरिक्त पुत्र-कामेप्ठि करने से तुम वन्यात्मा पुत्रों को प्राप्त करोगे यह सुनकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ उन्होने सबको विदा किया और रनवास में पहुँचकर सभी रानियो को यह जुम सवाद सुनाया तब से वे प्रमन्नचित्त रहने लगे | एक दिन जनघ सूत (सुमत्र) राजा के पास आकर एकान्त में यो कहने लग्रे--

<. ऋष्यथूृग का वृत्तांत

सुमत्र ने कहा-- हें महाराज, इसके पहले आपको सतान-प्राप्ति कैसे होगी, इस सम्बन्ध में मेने एक कथा सुनी थी। आप उसे सुने | अगराज के पुत्र गृणवाल्‌ रोमपाद के राज्य में जाने उनके किस अपराब से वर्षा नहीं हुई अपने राज्य में कही भी वर्षा होते देख राजा बहुत दुखी हुए उन्होने श्रेप्ठ मुनियो से वर्षा के निमित्त बहुत हवन करवाये, फिर भी वर्षा नहीं हुई | तव राजा को अत्यत दुख से पीडित देखकर मुनियों ने कहा-- हैं महीपाल ! हे राजचन्द्र! इस पृथ्वी पर वर्षा होने के लिए हम शुद्ध मन से आपको एक उपाय वठायेंगे हे पर्वत के समान घोर! परहितनिरत विभाडक के पुत्र पुण्यनिधि ऋष्यम्धंग जन्म से नगरज्राम के सम्बन्ध में कोई ज्ञान रखने के कारण स्त्रियो के नाम तक में अनभिन्न हैँ | वे तपस्वी की वृत्ति में जगलों में रहते हे हें वनुधेश उनके यहाँ बाते ही अनावृष्टि-दोष तुर्त दूर हो जायगा इसपर राजा अपन मन में सोचने लगे कि उस मुनिश्वेप्ठ को नगर में कंसे ले भा सकूँगा उन्होंने वुद्धिमान्‌ मत्रियों तथा मुनियों को बुलाकर बड़े प्रमन्न चित्त से पूछा मुनियों तथा मत्रियों ने भी बडी प्रसन्नता से उपाय वतावे, तो राजा मन ही मन बहुत हर्षित हुए मुनियों ने कहा--“महाराज, अभी भाप कई (प्रव्यर के) मिप्दान्न तथा सुन्दर वस्तुएँ देकर वेब्याओं को वन में सेजिए

/ का

ब/लकाड गँ

वे प्रौद् कामिनियाँ सीधे वहाँ जाकर, अच्छी तरह उस मुनि के दर्शन करेंगी, उनकी महिमा देखेंगी, उन्हें मिष्टान्न देंगी और बडे प्रेम से उनके मन को विचलित करेंगी वे कामिनियाँ अपनी विलास-चेष्टाओ से उनके मन को रसाई बना देंगी और अपने मोहक रूप की माया का प्रभाव डालकर यहाँ वापस आयेंगी तब वे भी उनके पीछे-पीछे यहाँ आयेंगे

यो कहकर सभी मुनि चले गये उस ठिन रात्रि को राजा बहुत प्रसन्नचित्त रहे ! सबेरे उठते ही राजा ने मुनियो का स्मरण करते हुए बडी अनुरक्ति के साथ अनुपम यौवन- रूप-सपन्न, कामदेव के मोहन मत्र के सदृश सुन्दर तथा चतुर वेश्याओं को बन में भेजा वें यूवतियाँ उस मुनि के वन में गईं और उनके आश्रम्त के पास जा पहुँची उन्होने अपनी ताट्य-कला तथा सगीत-कला का परिचय मुनि को दिया वे पृण्यनिधि यह जान सके कि वे स्त्रियाँ हे, और सगोीत आदि का रसास्वादन कर सकने के कारण सोचने लगे कि ये इस वन में रहनेवाली मदगामिनी कोई अनोखी मृगी है एक दिन वे रमणियाँ उनके पास पहुँच गईं उन्होनें कामिनियो को अच्छी तरह देखा, उनके कुचों का नाम पूछा, कुच्छो पर डोलनेवाले हारो का उद्देश्य पूछा और कहने लगे--“मेरे सिर पर तो एक ही श्वग है, लेकिन आपके उर पर दो श्यग निकल आये हे आपके ये वल्कल वस्त्र बडे ही कोमल हे ये अनुपम वलकल किस पेड से प्राप्त होते है ? आपके जटाजूट मेरी जठाओ के समान नहीं हे, वे चमक रहे हैं आपके शरीर पर मली हुई राख सुगध दे रही है आपके ये वेद-ताद श्रुतिमधुर हे मेने इस वन में ऐसा दृश्य अबतक नही देखा हैं, सुना हूँ कही मुनियो की भी ऐसी वेष-भूषा होती है ? आप कहाँ के मुनि हे ?”

उस महान्‌ व्यक्ति को अपने जाल में फेपते देख उन स्त्रियों ने हँपते हुए कहा-- “हैं मुनि, कर्ण-मधुर साम-गान करते हुए, उसके अनुसार शुद्ध रीति से पदन्यास करके दिखाना हम जानती हे इंप् पृथ्वी पर हमारा कौशल जानना आपके लिए कहाँ सभव है ? इस तरह अपनों वचन-चातुरोी से उस मुनिनाथ को भुलावा देकर उन सुदरियो ने पूछ:-आप कौन हे ? किनके पुत्र हें ”? क्यो इस वन में रहते हे, बताइए तब उन्होंने कहा--*में शुद्ध कीत्तिमान्‌, पुण्यात्मा विभाडक का पुत्र हूँ मेरा नाम ऋष्यश्वग है तप में महान्‌ निष्ठा रखते हुए तपस्या करने के लिए ही में यहाँ रहता हूँ मेरे पिताजी भागीरथी में स्तान करने की इच्छा से योगिपुगवों के साथ गये हुए हे वे अन्य देशो में ते जाकर बडी तपस्याएँ करते हुए अमल तथा भक्तियुकत चित्त से यही पर रहते हे आप लोगो के यहाँ आने से में पापरहित हुआ, क्ूतार्थ हुआ अपने पिताजी की क्ृपा से बहुन अधिक तपश्चर्या में लोन में भी यही रहता हूँ | इन वनो में आप जैसे नागर लोगों को , देखकर मुझे आइचय हुआ क्या अब हम सब आश्रम में चर्ले ?

यो कहकर उन मुनियों को (उन वार-वनिताओं को) अपने आश्रम में ले जाकर ऋष्पश्ञग ने उनका आदर-सत्कार किया उन युवतियों ने प्रसन्नता से उन मुनि का आतिथ्य ग्रहण करने के बाद कहा--हें मुनिवर, यह लीजिए, हम अपने वन से श्रेष्ठ फल लाये हूँ ।' यो कहकर उन्होने स्वादिष्ठ एवं मनोहर लड्डू, पूडी और तरह-तरह के स्वादिप्ठ भिष्ठान्न उन्हें दिये मुनि उन्हें खाते जाते थे और वीच-बीच में उनके स्वाद की प्रशसा

श्र रंगन/शथ शायायण

करते जाते थे उन युवतियों की ओर देकर वार-वार मिठाई माँगतें, परवण-से -होकर हाथ फैलाते और कहते--हे मुनिवर, से ने अब तक ऐसे फल कही नहीं देखे आपका ही तप श्रेष्ठ तप है ।' यह सुनकर उन युवतियों ने मुस्कुराते हुए अपनी तनुलताओं को उनके शरीर से छुलाकर, अपने सौरभमय उच्छ्वासों से उनके घैयँ को डिगाते हुए होलें-हौले अपने मुख-कमलो को उनके मुख से सटाया और मीठे वचन, हाव भाव, मबुर संगीत तथा मादक दृष्टियों से उन्हें मोहित कर उनके हृदय को रसाद्र करते हुए, अपने कुचों से कसकर आलिगन पाश में उन्हें परवण बनाया और फिर कहने लगी--हे अनघ, अब हमें आज्ञा दें कि अपने आश्रम को वापस जायें यो कहते हुए विभाडक के आगमन के भय से पीडिते वे वहाँ से रवाना हो गईं और उस वन के निकट ही रहने लगी उत्त कमल- लोचन रमणियों के जाने के पछचातू, ऋष्यश्वग ने यह सोचते हुए कि जाने वे फिर कब लौट आयेंगी, सारी रात जागकर ही व्यतीत कर दी और दूसरे दिन वे उस जगह पर जा पहुँचे, जहाँ पहले दिन उन्होने उन रमणियो को देखा था

७, वेश्याओं के साथ ऋष्यश्रृंग का रोमपाद के घर आना

पायलो का ककार करती हुई, राजहसो की गति से वे युवतिणं मुनि के पास आईं और प्रफुलल वदन हो चारो ओर से उन्‍हें घेरकर कहने लगी--हे मुनिवर, आप हमारे वन में पधारें जब उन्होने स्वीकार कर लिया, तब वे उस श्रेष्ठ मुनि के चित्त को द्रवित करनेवाली वातें करते हुए, अपने उपायो तथा हाव-मावों से उनको मोह-मुग्ध कर लिया और उन्हें अगन्देंश में इस प्रकार ले आईं, जैसे शिकारी पक्षी किसी नये शिकार को पकड- कर ले जातें समय विस्तृत पथ के भय से उसे बचाने के लिए अपने हस्तपललव-रपी पालकी में (चंगुल में) ले जाता है उस ऋष्यश्ग के आते ही अग-राज्य में घोर वर्षा होने लगी और जझस्य बढ़ने लगे राजा सकल सौभाग्य से युवत हो सतुप्ट हुए उन्होंने वी भक्ति से उस मुनि की पूजा की और अपनी पुत्री जानता का विवाह उनके साथ कर दिया | वें मुनि उसी राजा के यहाँ रहते हे यदि दशरथ उस मुनि को अपने यहाँ ले आकर उनसे पुत्र-कामेप्टि यज्ञ करायें, तो वे (दशरथ) चार बहुश्रुत तथा महान पुत्र तथा भमृद्धि प्राप्त करेंगे इस प्रकार मुझसे पहले सनत्कुमार ने कहा था इसलिए आप उस ऋषप्यश्षग से भक्तियुक्त प्रार्थना कर उन्हें यहाँ ले आयें ॥7

इस प्रकार कहकर सूत चले गये उनके जाने के बाद मन में हर्ष तथा भक्ति का जनुभव करने हुए चतुर दशरथ उस राजा रोमपाद के यहाँ गये जौर मुनिश्वेप्ठ ऋष्यश्वग को प्रणाम करके कहा--हें पवित्र आत्मा मुनिराज, आप मेरी विनती सुनें | में अपने,मन में पृत्र प्राप्ति की इच्छा लेकर आपके यहाँ आाया हूँ आप मुझे अपनाइए राजा ने उनकी कूपा प्राप्त करने के लिए इस प्रकार उनकी स्तुति की और उनसे यज्ञ का ऋत्विक्‌ बनने की प्रार्थना की फिर अनुपम पालकी में उन्हें ब्ठिकर अयोध्या के लिए रवाना हुए उन्होंने दूतो के द्वारा अपने नगरनिवासियों को यह आदेश भेज दिया कि नगर इन्रपुरी के समान सुन्दर सजाकर रखा जाय दतो ने नगरनिवासियों को यह आदेश

ब/7लठकोछ र३

सुनाया उन्होंने नाना प्रकार से नगर को सजाया और जहाँ-तहाँ दुदुभि, णशख, आदि का तुमुल नाद करने लगे उसी समय राजा ने भी नगर में प्रवेश किया और मगलवाद्यों के बजते हुए, विघ्ननाशक (ऋष्यश्वग) को शाता देवी के साथ, बड़ी चतुरता से अयोध्या में लाये

राजा ने ऋष्यश्वग को लाकर अन्त पुर में ठहराया अध्य-पादादि देकर विधिवत्‌ उनकी पूजा की और अपने को कहतार्थ मानकर प्रसन्न हुए उसी समय कौसल्या आदि रानियो ने राजा की आज्ञा लेकर वडे हर्ष से शार्न्ता देवी को श्रेप्ठ भूषण, वस्त्र, माला आदि देकर बहुविधि से उनका सत्कार किया

बिक

कुछ दिन के पश्चात्‌ सस्नार के प्राणियों को आनदित करने हुए वसन्‍्त ऋतु आई तव राजा बडे उत्साह से ऋष्यश्ग के पास गये और बडी भक्ति से प्रणाम करके विनय किया--है सयमीग्रवर !' आप मुझसे यज्ञ कराके मेरा उद्धार कीजिए ।' तब उन्होने-- ऐसा ही हो, कहकर रविकुलोत्तम राजा दशरथ से आगे कहा--हे राजन, यज्ञ के लिए विधिवत्‌ आवश्यक सामग्री शीघ्र मेँगवाइए !! तब राजा ने योग्य व्यक्तियों को उन सब वस्तुओं का सचय करने के लिए भेजा और सब सामग्री मेंगवाई (उन्होंने) सुमत्र को भेजकर कीत्तिमान्‌ केकयराज, अप्रतिहत तेजस्वी काणिराज, जनक महाराज, अगराज आदि पुण्यचरित्र नरेशों को यज्ञ देखने के लिए सविनय आमत्रित किया (इसके पदचातृ) उन्होने सुमत्र से कहा--तुम शीघ्र जाकर पुण्यवान्‌ वेदवेदाग-पारगत, गृहस्थ, निपुण एव महिमा-समन्वित ब्राह्मणों को तथा सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, महात्मा वसिष्ठ तथा वामदेव आदि (पुरोहितो) को लिवा लाओ

सुमत्र बडी प्रसन्नता से गया और बडी श्रद्धा से उन सबको लिवा लाया। (राजा ने) उन्हें अध्यं, पाद्य आदि देकर (उनका स्वागत-सत्कार किया) वे अपने निर्मल ब्रत की निष्ठा के अनुकूल धघर्मसम्मत तथा उचित वचन यो बोलें-- है मुनिश्रेष्ठ, पुत्रहीन होने से अत्यन्त दुखी हूँ, पुत्र-प्राप्ति की इच्छा बलवती होने के कारण मित्रो के परामर्णग से अद्वमेब यज्ञ, तथा पुत्र-प्राप्ति के लिए पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करने के लिए इन ऋष्यश्षगजी को आमत्रित किया हैं (अब) आपके अनग्रह का प्रार्थी हैँ ।”

राजा की बातो से प्रसन्न होकर वसिष्ठ आदि तपोधन सुनियों ने कहा--हे रवि- कुलोत्तम, लोकहितार्थ पूत्रो को प्राप्त करने की आपकी इच्छा सर्वथा सगत हैँ अब अव्व को छोडिए इस अश्वमेंध से आपके विश्वरक्षक एवं उज्ज्वल परातक्र्मी चार पुत्र होगे ॥”

इससे बहुत सतुष्ट होकर राजा ने यज्ञ के लिए योग्य जवनाश्व (तेज जानेवाला घोडा) को चुनकर, भुवनपावन मूत्ति की पूजा करके, उस घोड़े के ललाट पर अपना तामाकित एक पद्ट बाँवकर, एक साल तक उसे अपनों इच्छा से घूमने के लिए छोड दिया उस अश्व की रक्षा के लिए पराक्रमी सेना तथा सामत नरेश भी सेजे उसके वाद वसिष्ठ आदि मुनियों की अनुमति से अनुपम जिल्पकारों को बुलाकर सरयू नदी की उत्तर दिशा में बवेंद-विधि के अनुसार एक्र यज्ञ-शाला का निर्माण करने के लिए भेजा और सभी देश के राजाओं तथा उन देशो में निवास करनेवाले विप्न, क्षत्रिय, बैर्य तथा शूरों को भी आमत्रित किया

श्छ रंगनाथ रएयायणग

इनने में एक वर्ष पूरा हुआ जौर मथुमास आया | तव राजा ने चिर तपोनिधि ऋष्यश्यूग की अनुमति तथा गुर की आज्ञा लेकर एक अच्छे मुद्त्तं में बडे उत्साह से जानता तथा ऋष्यश्वृग के साथ, यज्ोपकरणों तथा हवन-कुड्द से युक्त, इक्कीस सुन्दर यूपों से शोभायमाल, श्रौतधर्म-क्रियाचार-विहित, मायाप्रवीण, राक्षसो से रहित तथा समस्त पाप- रहित यज्ञ-शाला में प्रत्रेश किया

5. दशरथ का यज्ञ-दीक्षा लेना

यज्ञाव्व के आते ही, यनरनदीक्षा ग्रहण कर, यतिजुद्धि प्राप्त करके, वसिप्ठ आदि श्रेष्ट मुनिजनो को ऋटत्विको के रूप में वरण कर, अपनी इच्छा से सवनत्रय को पूरा करके, विमल यूपकाप्ठो से बेचे हुए जलचर, वतचर, विहग, उरग आदि तीन सी पशुओं तथा प्रद्यात यज्ञाव्व का वध करके श्रुतियों में जिन-जिन मत्रो के साथ, जिन-जिन आहुतियो को देने को विधि बताई गई है, उन मत्रों के साथ ऋत्विको ने उन आहुतियों का हवन किया अग्निदेव सपन-जिह्लाओं से प्रज्वलित हुए देवता उन आहुतियो से तुप्त हुए उस यज्न के दिनों में कोई भूखा रहा, कोई सतप्त रह गया सभी भिष्टान्न, वस्त्र स्वर्ण, मणिभषण आदि से सत्तृप्त किये गये

जब किसी भी विध्न के विना यज्ञ समाप्त हुआ, तब ज्योतिप्टोम, विध्वजित्‌ आदि महान्‌ यज्ञ-क्रियाओं को साग रूप से पूरा कया और यज्ज-दक्षिणा के रूप में अध्वर्यू (यज्ञ- करानेवाले चार ऋत्विको में से एक) को (अपने राज्य का) दक्षिण का भाग, होता को पश्चिम का भाग तथा उद्गाता को उत्तर का भाग दिया अयोध्या को छोड वाकी सभी देशों को (दान में) दें दिया, जिससे ऋत्विक्‌ प्रसन्ष होकर कहने लगे---“कव हम आपके दिये हुए राज्य का शासन करें और कब अपने अनुष्ठान का पालन करें हम कहाँ और देश का गासन कहाँ ? हे राजन, आप हमें इस राज्य का मूल्य दे दें ।” तब राजा ने दस करोड़ ख्वर्ण-मृद्रएँ, सोते की चौगूरी चाँदों और एक लाख गार्ये उन्हें दी ऋष्यश्वग आदि ऋत्विक्‌ उस बन को आपस में बॉटकर सतुप्ठ हुए उस विमल यज्ञ-कर्म में प्रवृत्त परिचारको को राजा ने एक करोड स्वर्ण-मुद्राएँ दी मॉँगनेवालो को श्रेष्ठ आभूषण दिये जिसने जो कुछ माँगा, राजा ने प्रेम से उसे वह दे दिया | उन्होनें सभी कब्र,ह्मणो को भक्ति से प्रणाम किया और क्रप्मण उनके आजोीर्वाद पाते हुए उन्हें दिव्य वस्त्राभरण देकर जअकलक चित्त से यज्ञात स्नान किया (उबर) ऋष्यश्वग के द्वारा कराये गये पुत्र- कामप्टि यज्ञ में आकर क्रप्रण अपने-अपने यज्ञ-भाग प्रष्प्त करनेवाले देवता रावण के सम्बन्ध में अपने मन में विचार करने लगे

९. रावण के अत्याचारों के वारे में ब्रह्मा से देवताओं की शिकायत ब्रह्म के पास पहुँचकर (देवताओं ने) उनको प्रणाम किया और यो विनती की-- हे प्रमो ! आपके वर को शक्ति से दशकबर, पुण्यात्मा आचार्यों ब्रह्मर्धियों, देवताओं तथा मुतियों को दुच दे रहा है | हैं कमलासन | हमारा खयाल है कि आपके वर की प्रचण्ड शक्ति के कारण ही हम उसको जोत नहीं सकते वह देवताओं के साथ इन्द्र को भी पकड़कर उतका अपमान करता हैँ और उन्‍हें दुख देता रहता है। (अपने) भुजवल के दर्प से

ह4,

बालकाोंड ९९

वह गंघर्व, यक्ष आदि देवगणो, मुनियों तथा साधुओं को पंकेंडकर कप्ट दे रहा हैं।

सभी कुल-पर्वत उसके नाम से डरते हे सूर्य भी ताप फैलाने से डरता हैं। वह जिस नगर में रहता है, वहाँ पवन भी अपनी पूरी शक्ति के साथ चलने से डरता है उसके अतिशय प्रताप से डरकर समुद्र अच्छी वरह गर्जन नहीं कर पाता है दीख पडने पर हमें भी दुख देता हैँ ऐसे पापी दशकंधर क्रा अन्त करने का उपाय आपको सोचना चाहिए ।”

तब ब्रह्मा ने उन सारी बातो को हृदयगम करके देवताओं से कहा--“ (रावण) अमरो के हाथ नहीं मरेगा, राक्षसों से नप्ट नहीं होगा, गधर्वों से मिटेगा नहीं, रजनीचरो से समाप्त नहीं होगा, भुजगों से मारा नहीं जायगा, यक्षो से हत नहीं होगा, पक्षिसमृह से पराजित नहीं होगा मेरे वर देते समय उसने नरो का नाम नहीं लिया था, इसलिए वह नरो से ही मरेगा स्पप्ट सुनो, हिरण्यकशिपु जब सारे ससार को दुख देता था, तब नारायण ने स्वयं नरसिह का रूप धारण कर उसे चीर डाला था उसी ने अब विश्ववसु के यहाँ जन्म लिया हैँ ! इसलिए नारायण ही अब इसका नाजञ करेंगे अब हमें उस विष्णु से अभयदान के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ।”

ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर सभी लोग तुरन्त क्षीर समुद्र के निकट गये और अच्युत को देखकर पवित्र हृदय से उनकी स्तुति की हाथ जोडकर बडी भक्त से प्रणाम किया और विष्णु से इस प्रकार विनती की

१०, देवताओं का विष्णु की स्तुति करना

हे त्रिलोकीनाथ, कमलालय-वक्ष, वसुमतिरक्षक, वनजाक्ष, आपके अतिरिक्त हमारा कोई (सहायक) नहीं, यह सत्य हे हे गोविन्द, परिपूर्णगुण चिदानन्द, हे देव, जगन्मय, देवाधिदेव, देवो के रक्षक, दिव्यावतार, अमृतसागर में पहले आपकी गरण में आये हुए हमें (आपने ) अपना अभयदान दिया था हे दानवदलन, आपके भृजवल-विक्रम से ही समस्त लोको की रक्षा होती है हे भक्‍तव॒त्सल, भक्तियोग को छोड अन्य उपायो से आपको पहचानना असभव है हे मधुसूदन, मन में आपका ध्यान करनेवालो को क्‍या कभी कोई विपदा सता सकती है ? जगत्‌ की सृप्टि, स्थिति, लय आदि आपकी लीलामात्र हूँ समस्त लोक आपकी माया का आधार लेकर ही आपका महनीय तनु धारण करते हे हे शेबशायी, आपका वैभव तथा आपकी महिमा अवाड्मानसगोचर है हैं शरणागत रक्षक, हे लोकेश, हम आपकी शरण में आये है हम शरणार्थियो की रक्षा आपको करनी ही चाहिए आप त्रिलोक-कटक रावण का वध करके हमारी रक्षा कीजिए हे लोकक- स्तुत्य, विना विलव हमारा काये सपन्न कीजिए और यञ पाइए निर्मेलचित्त, नि३चलब्रती, धर्मात्मा, उत्तमगुण-समन्वितन, राजा दशरथ अच्वमेध यज्ञ पूरा करके पवित्र मन से युक्त हुए है उस काकुत्स्थ-वशी (राजा दशरथ) की स्त्रियो का विचार करें, तो कोई भी स्त्री उनकी वरावरी नहीं कर सकती हे कमलगर्भ, आप अपने चारों अशो के साथ नर के रूप में जन्म लीजिए बर के प्रताप से जो देवताओं के लिए अवध्य है, जो लोकत्रासक हे जिस पापी ने गधर्व एवं किन्नरों का वध किया है, हे पुण्डरीक, ऐसे दशकधर का वध करके यज्ञ-सपादन कराइए और सयम-बनी पुरषो की तथा ससार की रक्षा कोजिए ।”

श्द सथनाथ २५२।५२/

इस प्रक्नार विनती करनेवाले देगताओ को देखकर वनजाक्ष (विप्णु) ने घन-गर्जन के समान गनीर व्वनि में कहा--हि देवताओ, तुम लोग सुखी होओ में मत्तयेलोक में बवतार लगा और उसके पच्चात्‌ दशकंवर का वंबु, नित्र, अमात्य, पौच तथा बचुओं के सग्धय वाथ करके, ग्यारह हजार वर्ष तक निबमानुकल इस पृथ्वी का पालन करूँगा ब्नह्मा क॑ वर से ही रानसेद्र इस अवनीतल पर जीवित है थो कहते हुए असुरारि (विप्णु) ब्रह्मा तबा देवदाओं को विदा करके चले गये

११. दशरथ को यज्ञ-पुरुष का पायस देना

उधर विमल हवनाग्नि से नीले बगवाले, अरुणावरघारी, सूर्य के समान तेजस्वी, महान्‌ विक्रमी ठथा पुण्यात्मा एुक दिव्य मूत्ति अपने हाथ में पायस (खीर) से भरे एक स्वर्ण-पात्र को लिये वाहर बाये उन्हें देख राजा अदुभुत जाच्चर्य में पड गये और विनय के साथ उठकर खड़ें हो गये राजा को देखकर (यनर-पुरुष ने) कहा--राजन्‌ में यज- पुरुष हूँ। तुम्हें पुत्र-दान देने की इच्छा से आया हूँ इस पायस को ग्रहण कर भक्ति के के साथ अपनों रानियो को दो ॥” इसपर राजा ने वडी भक्ति के साथ उनकी पूजा की और पायस यो यहय किया, जैसे जचीपति ने सुवा-क्लश ग्रहण किया था अग्निदेव के अन्तर्द्धाव होने के वाद राजा जउनन्‍्तपुर में गये, तो रानियो ने बड़े आवन्द से उसका स्वागत किया (राजा नें) देवताओं से बनायें गये उस पायस का आधा भाग कौसल्या को दिया, थेप आधे जय जावा सुमित्रा को दिया, बचे हुए भाग का आधा क्केयी को और डगय पुन. प्रसन्नता से सुमित्रा को दिया

उस परायस को भक्ति से ब्रहण करने के वाद रानियाँ गर्भवती हुईं उन्हें देखकर राजा आनन्द-मन्न दिखाई देते लगे। निदान, राजा ने ऋष्यश्वृग आदि मुनियों तथा अन्य राजाजो को बड़े जादर-सत्कार के साथ विदा किया और रानियो के साथ परम अनुरागवुक्‍त हो नगर में लोट जाये

१२. देवताओं को वानरों के रूप में जन्म लेने के लिए ब्रह्म की सलाह

अपना-अपना यज्ञ-माग लेकर जब देवता अपने लोक को जाने लगे, तब ब्रह्मा ने इन्‍्द्रादि देवताओं को देखकर क्हा---लोकरकणार्थ विप्णु इस पृथ्वी पर अवतार ले रहे हे इसलिए तुम्हें भी उनकी सहायता के लिए तैयार हो जाना चाहिए इसलिए - तुम लोग लोकहितावी चक्तिमान्‌, पराक्रमी, वल तथा पराक्रम में अपने समान शक्तिमान्‌ कई वानरों को, किन्नर, गयर्व, खेचर, यक्ष, पन्मनग, अमर, तथा सिद्ध स्त्रियों (के गर्भ) से उत्पन्न करो में अत्यन्त बलनिधि जाम्वचान्‌ को पहले ही जन्‍म दे चुका हूँ मेरे जेभाई लेने समय उसने जन्म लिया हैँ वह चिरजीवी है ॥”

इस तरह ब्रह्मा का वादेश पाकर देवता लोग प्रसन्न हुए इच्ध ने वालि को, अग्नि से नील को, नूर्थ ने सुग्रोव को, बृहस्पति ने ताह को, वरुण ने सपेण को कुबेर ने गवमादन को, विव्वकर्मा ने नल को, अच्विनोकुमारों ने हिविद-मेंद को, पजेन्य ने गरभ को और वायुदेव ने हवुमान्‌ को इस पृथ्वी पर जन्म दिया अन्य देवताओं “ने भी अपने- अपने तेज से क्रमित पराक्रमी तथा श्रेप्छ वानरो को जन्म दिया। वे (सभी) वानर जगत्‌ के

बालकांड १७

आप्त बधु, दावाग्नि-तुल्य विक्रमी, आकार तथा शक्ति में पर्वत की समानता करनेवाले, बंडे साहसी, कामरूपी, समुद्रो को भी पार करनेवाले, पहाडो को भी उखाड फेंकनेवाले, नख ओर दाँतो में अमित शक्ति रखनेवाले, अलौकिक शक्तिवाली तथा पृथ्वी को भी चीर डालनेवाली क्षमता रखनेंवाले थे ऐसे होने पर भी, आइचर्य |! उनमें कुछ लोग सुग्रीव की, कुछ हनुमान्‌ की, कुछ नील की, और कुछ मैदकुमूद की सेवा करते थे वे सत्र सिद्ध होते हुए अपना शौय॑ प्रकट करते हुए, मलय, दर्दूर, गधमादन, तथा विंध्य पर्वत एवं काननी और बहुत-से जल-नद-नदी प्रान्तो में बडे आनन्द के साथ विचरण करते थे

उस महिमायुकत पायस के प्रभाव से राजा की कुलवधुओ ने गर्भ धारण किया गर्भधारण के समय से (उनकी) क्षीण कटियाँ पुष्ट होने लगी अमृतमय भोजन की रुचि लगातार कम होने लगी सुन्दर देह की कान्ति पाडु रंग धारण करने लगी, मानों ये सभी रावण की सामज्य-लक्ष्मी की नाक में कालिख लगानेवाले चिह्न हो उनके कुचाग्र (इस प्रकार) काले होने लगे, मानो अनपत्यता-दोष (शरीर से) बाहर निकल रहा हो कपोल पतले हो गये दोहद (मचलो आदि) दीखते लगे | नाभियाँ उभरने लगी, त्रिवलियो की रेखाएँ मिट गई और (अनेक प्रकार की चीजों को पाने की ) इच्छाएँ उत्पन्न होने लगी घीरे-घीरे नौ महीने पूरे हुए

१३. श्रीराम आदि का जन्म

प्रशसनीय मधुमास के श्रेष्ठ शुक्ल पक्ष में, पूर्ण नवमी तिथि, वुधवार, पुनर्व॑सू नक्षत्र में मध्याक्षु के समय ग्रह-पचको के उच्च स्थिति में रहते समय, गुरु और चन्द्र का योग रहते हुए, ललित कके लग्त में, सर्वतोकाधार, जगदेकवीर, इंद्रादि देवताओं से स्वुत्य, दिव्य लक्षणों से देदीप्यमान, अव्यय, असमान, कात्तें-त्राण-परायण, भव्य, चिदानन्द, परम कल्याण- मूत्ति, देवताओं के रक्षक, दीनात्तिहरण, गुणो से अलकृत, महान कीत्तिवानू, शेषशायी, श्रीपति, हृषीकेश, उस कमल-गर्भ (विष्णु) के अर्द्धाश के रूप में, काकृत्स्थवशी श्रीराम कौसल्या के गर्भ से उत्पन्न हुए | जिस प्रकार अदिति ने इन्द्र को और प्राच्य-मती ने चन्ध को जन्म दिया था, वैसे ही पुण्य-वक्षत्र युक्त मीन लग्न में कैकेयी ने भरत को जन्म दिया | स्तुत्य आइलेबा नक्षत्र-युकत कर्क लग्न में कमलदललोचनी सुमित्रा ने समान-चरित्रवाले लक्ष्मण तथा झत्रुष्च को जन्म दिया देव-दुदुभियों से सारा आकाश गूंजने लगा, देवस्त्रियाँ नृत्य करने लगी, पुष्पो की अत्यधिक वृष्टि होने लगी, ब्ह्मादि देवता परितुष्ट हुए, अयोश्या में छोटे-बडे सभी निवासी उत्सव मनाने लगे

तब दशरथ ने पुण्यात्मा वसिप्ठ को बुलाकर (वालको का) जातकर्म आदि करवाया। फिर,पुत्र-जन्मोत्सव ऐसा मनाया कि देवताओ तथा पुरजनों का नेत्रोत्सव हो गया जात- शौच समाप्त होने के पश्चात्‌ एक पुण्य दिन को राजा ने उन वज्ञोद्धारक पुत्रों का चाम- करण-संस्कार करने की प्रार्थना वसिष्ठ से की उन्होने अपने मन में विचार करके कहा कि “रम्‌', अर्थात्‌ क्रीडा' नामक घातु से 'रमयति” अर्थ देनेवाला राम नाम से कौसल्या- सुत अभिहित होगा कैकेयी का पुत्र महान्‌ वलझाली, सुकुमार शरीरवाला तथा सुकीरत्ति- वान्‌ है, इसलिए वह भरत के नाम से विख्यात होगा विचार करके देखने से सुमित्रा के

डरे

शर्ट रंगनाथ रायाायरे

पुत्र सुन्दर तथा श्रेष्ठ गुणों से युक्त है, इसलिए उनके लिए लक्ष्मण तथा श्षेत्रुघ्त नाम उचित होंगे (राजा ने) उन लक्ष्मी-समन्वित (राजकुमारों को) राम, भरत, लक्ष्मण तथा अत्रुध्न जैसे सुन्दर नाम देकर नामकरण-सस्कार सम्पन्न किया और अपरिमित घन दान में दिया

१४. श्रीरासादि का वचपन

वे (वालक) माताओं तथा घाइयों के स्नेह तथा ममता-यबुक्‍त पालन-्योपण में (फलस्वरूप) बढने लगे (वें) भोली-भाली हेंसी के साथ आँखें खोलने लगे धीरे-धीरे अठ्पटाकर चलते हुए अपनी तोतली वोली से धवको आनन्द पहुँचाने लगे उनकी लटो में (प्रोई गई) मोती तथा रणियों की लड़ियाँ कप्रोलो तक फैली थी उनके भाल (रूपी) इन्दु पर अशोक के पत्ते के समाव एक मेंगटीका डोल रहा था मणिखचित वहुत सुन्दर वघनखा की श्रेष्ठ कान्ति उनके हृदय पर विराज रही थी शरार पर जहाँ-तहाँ मरकंत मणियों के आभरण शोना दे रहें थे, कटि को करपनी से घूंघरू के शब्द हो रहे थे तथा घुँघलूदार दूपुर पैरो में व्वनि कर रहे थे। वे राजा के सामने हँसते हुए अपनी बालक्रीडाएँ करते ओर उन्‍हें अपनी मोहनाकृति से मुग्ध कर देते थे वे चारो (कुमार) धघीरे-घीरे

वढने लगें और समान रूप से उनका मम्तसिक विकास होने लगा वे दगस्थात्मन आपस में जोडियाँ बना लेते रमणाय आकृतिवाले राम और लक्ष्मण की एक जोडों वनती और भरत-शत्रघ्त की दूसरी जोड़ी बततो उनके चूडाकरण तया यज्नोपवीत-सस्कार कराये गये और बे सुन्दर (राजकुमार) तरह-तरह के खेलों में

मग्त रहने लगे एक वार रघुराम अपने मित्रो के साथ बडे प्रेम से (अपने-अपने) गुइयाँ चुनकर, गेंद तथा डंडा लिये फ़ुर्ती से खेल रहे थे उसी समय कैकेयी की दासी मथरा वेग से वहाँ आई और कौतुक से गेंद को रोक लिया इस पर राम ने बडे क्रोध से डडे से उसपर प्रह्मर किया, जिससे तुरन्त उसकी टाँग टुट गई (इसके पच्चात्‌ भी) श्रीराम को अधिक उत्साह से खेलते हुए देखकर उनपर कुद्ध हो, लेंगडी टाँग से वह कैकेयी के महल में गई और सारा वृत्तान्त कह सुनाया कैकेयी ने तुरूत यह समाचार दशरथ को सुनाया सारी वातें जानकर राजा ने वसिष्ठजी को अयोध्या में वुलवाकर उन्हें भक्ति से प्रणाम किया और कहा--हें श्रेष्ठ मुनिचन्द्, आप इन बालकों को वेदादि समस्त विद्याएँ सिखायें / बह कहकर राजा ने वालको को वसिष्ठ को सौंप दिव्य उस मुनीच्वर ने भी वैसा ही किया राजकुमारों ने उस सयमी मुनि की कृपा से हाथी-घोडे को सवारी, रथ- सचालन आदि को क्रियाएँ सीख लो समस्त वेदो, शास्त्रो और जस्त्रास्त्रो के प्रयोग भी सीख लिये उनमें श्रीराम तो विप्णुदेव ही थे। इसलिए अपार शो, विवेक तथा सदू- गुणों में सबसे श्रेप्ठ थे १४, विश्वामित्र का आगमन

(राजा) बपने पुत्रों के विवाह की वात सोच रहे थे कि (एक दिन) विश्वामित्र मुनि पहुंचे द्वारपाल ने आकर महाराज दणरथ से निवेदन किया--टदिंव, व्बिवामिक्त

बा/लकाड ९6

मुनि द्वार पर आये हैँ तब दशरथ अपने वधु-वर्ग तथा वसिष्ठ मुनि के साथ बडी प्रसन्नता से, परमेष्ठी की अग॒वानी के लिए जानेवाले इन्द्र की तरह, उनका स्वागत करने गये उनकी अमित शक्ति को जानते हुए उनको लिवा लाये और अध्य, पाद्यादि देकर उनकी उचित रीति से पूजा की तब मुनि ने पूछा-- (हें राजन) तुम्हारी प्रजा कुशल से तो है, हे पूजनीय ब्रती वसिप्ठ, आप कुशल से हे ? हे मुनियो, आप कुशल है ?' (तब राजा ने कहा)--'हमें किसी बात का अभाव नहीं है | हम घन्य हैँ परम मुनीद्र, आप हमारा गृह पवित्र करने की इच्छा से यहाँ पधारे इस कृपा से में समस्त लोको में प्रख्यात हुआ और सभी राजाओ में आदरणीय हुआ आप अपने आगमन का कारण कहें आपका जो भी कार्य होगा, मे उसे सम्पन्न करूँगा

१६, यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम को भैजने के लिए राजा से विग्वामित्र की प्रार्थना

तब विद्वामित्र ने राजा को देखकर कहा--हे राजन, दसरात्रि-पर्यत यज्ञ करने की इच्छा से में (यज्ञ ) करने लगा, तो भयकर आकारवाले राक्षस हमारी यज्ञशाला में लगातार रक्‍त-मास की वर्षा करते हुए प्रवल विध्न डालने लगे यज्ञ करते समय हमें क्रोध नही करना चाहिए, इसलिए तुम्हारे पुत्र महाबली श्रीराम को यज्ञ-रक्षणार्थ ले जाने के लिए आया हूँ वे क्रूर राक्षत उनके सिवा अन्य किसी से नहीं मारे जायेंगे उनकी (राम की) महत्ता में जानता हूँ, (और) ब्रह्मा के पूत्र ये वसिष्ठ भी जानते है हे अनघ | राम बालक हु” ऐसा विचार मत करो | वे मेरे पुत्र हैं, ऐसा लोभ छोड दो वे स्वय यज्ञ-कर्ता, यज्ञ-मूत्ति तया यज्ञ-भोक्ता हैँ उन्हें लोकाराध्य मानकर भेजो में उन्हें अतुल्य शस्त्रास्त्र दूँगे उनसे ही हमारे यज्ञ की रक्षा होगी ।”

मुनि के ऐसा कहते ही राजा मूच्छित हो गये बडी देर के बाद उनकी मूर्च्छा दूर हुई वे फोके पड गये और दोन नथा दुखी होकर गद्गद-कठ से विश्वामित्र की विनती करते हुए बोले---“राम अभी बालक है, वह बच्चा हैं वह युद्ध-कला नहीं जानता वह पन्द्रह साल का ही हैं हिलती हुई शिखावाला है (अभी उसमें दृढ़ता नही आई हूँ ) अपने तथा शत्रुओं के बल का विचार करने को क्षमता उसमें नहीं हैं। हाय! आप दया- मय होते हुए ऐसे बच्चे को क्यों माँगते हे ? राक्षस तो कई दिव्य दास्त्रासत्र रखनेवाले है वे युद्धकला में निपुण होते है। वे विपुल बाहुबलवाले हैं उनके साथ लडने की योग्यता राम में कहाँ है ? कहाँ वे और कहाँ यह ? हे श्रेष्ठ मुनीश्वर, साठ हजार साल तक पृथ्वी का शासन करने पश्चात्‌ असमय वृद्धावस्था में मेने इसे प्राप्त किया हैं में इसे भेज नही सकता। यज्ञ रक्षा की चिन्ता आपको क्यो हैं ? आप जाइए, में आज ही सेना के साथ आपके पीछे-पीछे चला आऊँगा हे मृनिनाथ, आपके यज्ञ में बाधा डालनेवाले राक्षसो की शक्ति कितनी है ? वे कौन है ? उनके नाम कया हे ? यह राघव उन्हें कैसे जीत सकेगा ?”

तब विद्ायवामित्र ने राजा से कहा--परुलस्त्य ब्रह्मा का पोता, विश्ववस्‌ का पुत्र, अखिल लोक का कटक, पापी रावण के आदेश से बल प्राप्त करके घमण्ड से भरे मारीच तथा सुवाहु नामक (राक्षस) उग्र रूप धारण कर यज्ञ में विष्न डालते हे राम

के सिवा अन्य कोई भी रणभूमि में उनका सामना नही कर सकेगा ॥”

रण

थे से हे

9०.

९७० र्एनायथ रयायण

ऐसा मुनि के कहते पर, उन बातो पर विश्वास करके राजा ने मुनिनाथ से विना सकोच कहा-- वह (रावण) चौथा ब्रह्मा है, महान्‌ साहसी हैं और ब्रह्मा से वर प्राप्त किये हुए हैं | ऐसे रावण के भेजे हुए वीरो को जीतने में यह (राम) कैसे समर्थ होगा ? उन (राक्षसो) की शक्ति जाने विना में आने की वात कही थी अब आप लौट जाइए ।॥” यो राजा के कहते ही विश्वामित्र (क्रोध से) जलते हुए, रोष-रवत नेत्नो से देखने लगे उनके गड़स्थल अत्यधिक वेग से हिलने लगे, सारा शरीर काँपने लगा | वें राजा को देखकर वोले---काकुत्स्थ-बणजो को रोति पर विचार किये विना ही ऐसे कुवचन क्यो कह रहें हो ? (तुमने) मेरे आगमन का कारण वताने के लिए कहा यह कहा कि में आपका कार्य अवध्य सिद्ध करूँगा अब तुम मुकर रहे हो यज्ञ-रक्षा लिए म॑ंनते राम को भेजने की प्रार्यना की पर तुम हिम्मत हारकर कहत हो नहीं भेजूंगा हें असत्य- भाषी, तुम्हारा तो मूंह देखना भी नहीं चाहिए इसलिए में जा रहा हूँ ।” मुनि के इस प्रकार कहते ही समुद्र सूख गये, पृथ्वी धैस गई, समस्त लोक व्याकुल हो उठे दिग्गजों ने घुटने टेक दिये, देवता सहम गये, दिश्ञाएँ सिमट गई सभी भूत जवण हो गये मुनि के क्रोवावेश की कल्पना करके वसिष्ठ ने दशरथ को देखकर यो कहा- १७, राम-लक्ष्मण को विव्वायित्र के साथ मैजने के लिए वस्िष्ठ की सम्मति (वसिष्ठ ने कहा)--हें राजनू, सूंवजी इस ससार में कभी असत्य भाषण नही करते यदि तुम असत्य कहोगे, तो तुम्हारी श्रेष्ठ कीत्ति और तुम्हारे पूर्वजों की कीत्ति नष्ट हो जायगी देंने का वचन कहकर नही दोगे, तो शुद्ध (मन से) किये हुए सभी धर्म नष्ट हो जायेंगे दशरव महाराज बडें घर्मात्मा हें--ऐसे तुम इस पृथ्वी में विख्यात हो। लोकरक्षा के सिवा राजाओं का धर्म और क्‍या है ? इसलिए, हे राजनू, राम को माननीय गावि-युत्र के साथ जाने दो ऐसी ञका क्यो करते हो कि मेरा पुत्र बालक हैं, वह युद्ध में महावली राक्षसों की वरावरी नहीं कर सकेगा। कौशिक के रहते किस बात का भय है ? राजनू, विद्वामित्र का उग्र तप और उनकी शक्ति विचित्र हे ये पुृण्यात्मा देव, दानव, गवर्व तथा दैत्यो से भी अधिक दिव्यास्त्रो के प्रयोगो को जानते है कोई भी ऐसा विपय कही भी नही है, जिसे ये नहीं जानते हो हे जननायक, दक्ष (प्रजापति) के जया तथा सुप्रभा नामक दो पुत्रियाँ थी उन जया और सुप्रभा के द्वारा भृशाइव ने राक्षस-वघ के लिए अस्त्र के रूप में पचास पुत्र प्राप्त किये वे सव (पुत्र) कामरूपी हे हे राजन, उस भृशाइव ने (उन सभी अस्त्रशस्त्रो को) इन्हें दे दिया इसलिए ये मुनि सभी शास्त्रास्त्रो

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के ज्ञाता है तुम डरो मत इन मुनि की शक्ति तुम नहीं जानते इनको वचन देकर क्यों टाल रहे हो ? इनके साथ जाने से राम का हित ही होगा, उनकी जय अवश्य होगी क्या ये (स्वयं ) राक्षकों को जीत नहीं सकते थे ? राजन (तुम्हारे) हित-चिन्तक के रूप में, तुम्हारे पुत्र उज्ज्वल चरित्रवान्‌ (राम) को शस्त्रास्त्र विद्या में निपुण सिद्ध करने के उद्देश्य से ही ये यहाँ पवबारे हे जत यज्ञ की रक्षा के लिए राम को भेजो इन्हें (राम को) देने में

ही (तुम्हारा) कल्याण होगा

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१८, विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण को भेजना

इस प्रकार वस्तिष्ठ के कहने पर, उनकी वातों पर विश्वास करके राजा ने रामचन्द्र को बुला भेजा उनका बालकपन देखकर राजा की आँखों में आँसू भर आये उन्होने उन्हें गले से लगाया, प्रेम से आशीर्वाद दिये, उनके कंशों पर हाथ फेरा, कपोलो को प्यार से छुआ, थोडी देर सोचते रहे, फिर पुण्याह वाचन पुण्यत्नत, पुण्य हवन और ग्रहों की पूजा करके सुन्दर वस्त्र तथा भूषण प्रेम से दिये फिर स्वय, कौसल्या तथा वसिष्ठ ने (उन्हें) उचित आशीर्वाद देकर, पुण्य मुद्त्ते में अपने पुत्र-रत्न को पुण्यात्मा गाधि-पुत्र को सौपा | प्रेम और त्याग, इन दोनो का सघर्ष (मन में) चलते रहने पर भी (राजा ने) उस मुनि का सत्कार करके उन्हें विदा किया | तब लक्ष्मण भी उस राम से प्रार्थना करके उनके साथ गये ( उस समय ) वृष्टि हुई, अनुकूल पवन चलने लगा, श्रेष्ठ मगल वज उठे आकाश से देवता बडे प्रेम से घनुष, उत्तम शस्त्र, महान तृणीर, खड़ग आदि सहज रीति से धारण किये हुए, बडे उत्साह से जानेवाले राघव को देखने लगे अक्षय तूणीर, पहुँचा तथा अगुली-ब्राण पहने कटि से लटकनेवाले कृपाण के साथ दिव्य शर तथा चाप लिये हुए राघव उस मुनि के पीछे बडे उत्साह से इस प्रकार जा रहे थे, जैसे अश्विनि- देवता भक्त से ब्रह्मा की सेवा करते हुए जा रहे हो बे पुण्य-चरित आधा योजन चलकर सरयू नदी के तट पर (पहुँचते-पहुँचते) थक गये तब कौशिक ने राम-लक्ष्मण को वुलाकर उन्हें बल, अतिबल, नामक महामत्रो का उपदेश दिया, जिन्हें उन्‍होंने घोर तपस्या के उपरान्त प्राप्त किया था और जो ब्रह्मा की पुत्रियाँ थी और सभी मत्रो की मूलाधघार थी तथा सदा सुखग्रदायिनी थी राम-लक्ष्मण ने उस मत्र-शक्ति के प्रताप से सूर्य का-सा तेज प्राप्त कर लिया थकावट, भूख और प्यास आदि सकट से वे मुक्त हो शक्ति से शोभायमान हो गये उस रात्रि को दाशरथि सरयू नदी के किनारे, तरुण कोमल कुंश-शय्या पर, कौशिक से पुण्य-कथाएँ सुनते हुए बडे आनन्द से सो गये

गाधिपुत्र-प्रभात के समय शीघ्र ही उठे और वहाँ तृण-शय्या पर आँखें बन्द किये हुए राघवों को देखकर बडे कौतूहल से कहने लगे--हें अनघ, अरुणोदय हो चला प्रात काल के नित्य कर्मों का पालन होना चाहिए इसलिए तुम्हें अब जागना चाहिए यह सुनते ही (वे उठे और ) सध्यावन्दन से निवृत्त होकर प्रफुल्लचित्त से कौशिक को प्रणाम किया (उसके पश्चात्‌) नदी-धारा के किनारे-किनारे चलकर वे सरयू तथा गगा के सगम के पास पहुँचे और वहाँ कई सहस्न वर्षों से नियमवद्ध हो तपस्या करनेवाले परम सयमी मुनियो को देखकर, बहुत ही हर्षित होकर दशरथात्मज ने गाधि-पुत्र से यो कहा--

है

१९, अनंगाश्रम का वृत्तान्त हैं सयमीद्र, यह किसका आश्रम है ”? इस तपोभूमि में कौन रहते हे ?”' तब मुनि ने कहा--“यह अनगाश्रम के नाम से लोक में विस्यात है। इस आश्रम में बडे धैर्य के साथ तप में लीन शिव को देखकर कदर्प ने बडे दर्प के साथ चन्रशेखसर पर (प्रुष्प) वाण चलाया था और उस देव के भाल-नतेत्र की अग्नि से भस्म होकर अनग नाम पाया था

सर रंग्नाथ रयायर

(उसके) जयो से सवबित यह आश्रम-भूमि तव से अगदेंश कहलाने लगी! इस आश्रम भूमि में कठिन तपस्या करनेवाले पृण्वात्मा छतायबे हो जाते हूँ ।” इस तरह विश्वामित्र ने सादा वृत्तान्त कह सुनाया रघुवीर तथा मुनि वहाँ ठहसकर स्तानादि अनुप्ठान पूरा करके संतुष्ट हुए उस स्थान के आश्रमवासी मुनीशवरो ने दिव्य दृष्टि ने यह वात जान ली वे रमणीब रूपणले राम-लक्ष्मण तथा अमित तथोधनी कौनिक को अपने आश्रम में लिवा ले गये और अत्बन्त उत्साह से अर्य, पाद्यादि देकर उनका सत्कार किया पृष्य-क्रधाओं के कथन से वह रात्रि पृण्परात्रि हो यई दूसरे दिन जढ वें पुण्य सबमी उस नदी में नित्य कर्मो से निवृत्त हो चुके, तब विदवामित्र ने कहा-- हमें इस नदी का पार उतारने के लिए यह नाविक समर्थ हैं यह नाव सूरये- वद्जजों के लिए लायक हैं !/ यह सुनकर राम-लक्ष्मण ने उन मुनियों को प्रणाम किया मुनियों ने उनको विदा किया तब वें विव्वामित्र के साथ नाव पर चढ़कर सरयू नदी पार करने लगे जब नाव वीच वार में पहुँची, तव (रामने) आइचर्य के साव हाथ जोड- कर पूछा--बह कैसी ध्वनि आकाण तक बूंज रही हैँ कंपा करके बताइए ।' मुनि ने कहा--कैलास पर्वत के मानसरोवर सें जन्म लेकर, समृद्ध साकेतनगरी को चारो बोर से घेरने के वाद गंगा नदी में मिलनेवाली सरयू नदी की लहरो का यह घोष हैं इस पर (राम-लक्ष्मण) ने बड़ी श्रद्धा से उसे प्रणाम क्या उन पुण्यात्माओ ने नदी को पार किया और हाथी, सुअर, नेसा, हिरण, चरभ, अजगर, वाघ, रीछ, सिंह से भरे हुए जगल में प्रतरेभ किया तव राबव ने कहा--हि सुनीझ्वर, खदिर (कत्या), तिन्‍्दुक, पूण, खजूर, निम्व, वदरी, छ्ट, अग्ोक, पादलि आदि तर्ओो तथा वहुकटक एव लतानसर्विष्टित वृक्षों से युक्त, यह निर्जेज वन किसका आश्रम हैं ? कृपया बताइए ।” तव विव्वामित्र श्रीराम से सादा वृत्तान्त यो कहने लगे-- प्राचीन काल में इन्द्र वृत्रासुर का वव करने से मल-कलृव-प्राप्त तथा मलिनाग हुआ तव देवता तथा मुनि इन्द्र को पाप- मुक्त करने के लिए यहाँ ले आये जौर पुण्यसलिल तथा पवित्र मत्रो से पुण्याभिसेचन किया इससे उसके घरीर पर लगे मल-कलुय दोनो यहाँ के प्रदेशों में भर गये जोर इच्ध चुद्ध हो गया इसलिए इन्द्र ने इन प्रदेंगो को, मल युक्त होने से मलद' तथा क्लेश- कलित होने से करुप तथा 'पापध्न' नाम दिये वृत्रासुर के वध से लगे हुए पाप की मुक्ति इस प्रदेश सें होते से इन्द्र ने इन नगरो को घन-वान्य-वैभव से समृद्ध रहने का वर दिया हे रघुराम, एक बात और सुनो २०, विव्वामित्र का शीरामचन्द्र को ताड़का का वृत्तान्त सुनाना “इस पृथ्वी पर ताडका नाम की एक राक्षसी, एक हजार हाथियो का वल रखती हुई, बडे साहस के साथ, इन दोनों प्रदेशों में प्रवेश कर स्वेच्छा से लोगो को तग करतीहेँ ।” इसपर राघव ने पूछा--डैस क्त्री को किसने इतनी शक्ति दी ? यह दुष्टवृद्धि किसकी लड़की है ? यह पापिन क्यो इन दो प्रदेशो को पीड़ा पहुँचा रही है ? कृपया वताइए ।' “पू क्क्मीकि कौर कालिदिस ने भो अनंगाश्रस का वर्णन किया है, पर वह अंग- देश में हूँ था वह तो सरयू नदी के किनारे था। जंग्र-देश तो वत्तंमाव भागलपुर झौर मुंगेर जिले माने गये हैँ, जिसमें सरयू नदी नहों हूँ ।--सम्पादक

दे/्लकाड २३

इस पृथ्वी पर सुकेत नामक एक यक्ष ने पूर्व में ब्रह्म की तपस्या की थी और अत्यधिक भवित से उनको तृप्त किया और उनसे एक पुत्र माँगा (तब ब्रह्मा ने कहा) में तुम्हें पुत्र नही दूँगा एक हजार हाथियों का वल रखनेवाली एक पुत्री दूँगा ।! उस वर से उसे एक लडकी प्राप्त हुई। उसने विचार करके अपनी उस लडकी का विवाह सुद (नामक व्यक्ति) से कर दिया उसने (सुद ने) उस स्त्री से मारीच' तथा सुवाहु' नामक दो भयकर शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न किये इसके पश्चात्‌ उसकी मृत्यु हो गई वह स्त्री अपने पुत्रों के साथ बडे गर्व से अगस्त्य के आश्रम में जाकर बार-बार उनवो तग करने लगी अगस्त्य ने इन पापियों को देखकर क्रोध से उन्हें राक्षस वन जाने का ज्ञाप दिया उस विन से राक्षस-रूप धारण कर निर्दयी हो वह मनुष्यो का आहार करती हुई यही रहती है और पृथ्वी को दु देती है तुम्हारे अतिरिक्त कोई इसे मार नहीं सकता सिवा तुम्हारे हाथ के किसी से यह नहीं मरेगी यह मत कहो कि यह स्त्री है, इसलिए इसे मारना नहीं चाहिए यदि गोन-्ब्राह्मणो का हित हो, तो यही कारण स्त्रियो को मारने के लिए राजाओ को पर्याप्त है प्राचीन काल में सारे ससार का नाश करने के लिए उद्यत, मतिमान्‌ विरोचन की दुष्टा पुत्री को क्‍या इन्द्र ने क्रोध से नहीं मारा था ? क्‍या वह कार्य (ससार में) स्तुत्य नहीं हुआ है ? पहले दृढ़ ब्रतवाली भृगु-पत्नी के ससार में अशान्ति फैलाने का उपक्रम करने पर क्‍या विष्णु ने (स्वयं) उस स्त्री का वध नही किया था ? इसलिए हे पुण्य-चरित्र, लोकहित के लिए स्त्रियों का वध करना भी पुण्य ही है ।”

२१. ताड़का का वध

विश्वामित्र के ऐसे अनुपम वाक्‍्यों तथा अपने पिता के आदेश का विचार करके राघव ने , उस ब्रह्मर्षि के वचन की अवहेलना नही करते हुए कहा कि में ताडका को दण्ड दूंगा उन्होने (अपने) धनुष की टकार से सारे आकाश को गुंजा दिया। (उसे सुनकर) ताडका क्रोध से उबल उठी कर्ण-कठोर धनुष की टकार सुनकर उसका चचल लाल नेत्रो वाला मुख विक्ृत हो उठा वह अपने दोनो हाथो को ऊपर उठाये हुए इस प्रकार आने लगी, जैसे पखोवाला पहाड बडे वेग से रहा हो प्रकट अट्टहास से उसके बड़े-बड़े दष्ट्रो की काति चारो ओर बिखर रही थी (चलते समय) वह अपने पदाघात से अपनी अमित शक्ति का परिचय पृथ्वी को दे रही थी | सारा आकाश एकदम हिलन्सा गया इस प्रकार आनेवाली ताडका को देखकर दाशरथि राम ने सभुम-चित्त से अपने भाई से कहा-- देखा तुमने इसका ढंग, इसका रूप और इसकी भयकर दृष्टि इसको देखने पर किसे भय नहीं होगा ? से अवश्य इसका वध करूँगा ।”

इस प्रकार (श्रीराम) कह ही रहें थे कि (अपने) गर्जन से समस्त आकाश को कॉपाती हुईं, अपनी पद-धूलि से समस्त (ससार) को ढकती हुई वह भयकर राक्षसी वडी- बडी शिलाओ की वर्षा करने लगी इससे क्रुद्ध हो राघव ने अपने अनुपम अस्त्रों से उन शिलाओ को काट डाला और उस (राक्षसी) के दोनो हाथ भी काट डाले तब लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान इस प्रकार काट डाले, मानो वे यह बतलाना चाहते हो कि आगे में उस असुरूराज की वहन की भी यही दशा कर दूँगा

492 रंगनाशथ एायायर

हर | हि

आक्चय की दात है कि तव वह कामरूपिणी, माया का रूप घारण॑ करके, कई अस्त्रों की वर्षा करने लगी तब विब्वामित्र ने कहा--हें अनव, संध्या हो रही हैं सब्या के सम्य राक्षमों को जीतना कठिन हुँ | अव तुम उसपर दया करना छोड दो और लोक-हितार्य इसे तुरत मार डालो ॥'

तब गावेय का आदेश मानकर (राघव ने) बब्द-वेघी वाणों से उस मायाविनी की मायाओों को दूरकर, भबकर गर्जन करती हुई विजली के समान आनेवाली राक्षमी को (उन्होंने) देखा ठव उन्होंने एक महान्‌ अस्त्र उसके कुचाग्र पर ऐस्ता चलाया कि रक्त

ब्ध

निकली मानो रामचद्र असरो कक दण्ड >>- का उपक्रम नल करते की कई बाराऐँ वह निकला, माता रामचत्र ससुर का दण्ड दन का उपक्रम करत समय

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शरो को (रक्त का) उपहार दें रहे हा

तव वह (राजक्नसी) पृथ्वी इस तरह गिरी, मानों प्रलब-्मारुत से संघ्या को आऊकाञ् दूटकर पृथ्वी पर गिर गया हो समस्त प्राणी आनंडित हुए। देवता तथा मुनि हर्षपित हुए कौशिक ने राम को गले से लगाकर आज्नीर्वाद दिये

तब देवता तथा गवर्षो के साथ देवेन्र वह्हाँ जाबा और श्रीराम के दर्शन करूकें, उनकी पूजा तथा प्रार्थना की | फिर देव-मक्‍त गावेय को देखकर इन्द्र ने कहा--- हमारी रल्ला करने के लिए इस पृथ्वी पर जवतार लिये हुए इस महापुरुष को जाप भृज्ाइव की संतान-छपगी सभी अस्त्र-शक्त्र प्रदान करें ॥7 इस प्रकार कहकर इन्द्र देव-लोक को लौट गये। इतने में सूर्यात्त हो गबा वे लोग वही ठहर नये

२२. विश्वामित्र का श्रीराम को मुशाइव-संतान-रूपी शस्त्र देना दूसरे दिन विध्वामित्र ने राम को बडे प्रेम से अपने पास बुलाकर कहा--

है राम! तुम्हारा रण-कौशल देखकर हम वहुत जसन्न हुए बब हम तुम्हें ऐसे अस्त्रास्त्र देंगे, जो अमर, उरग, अनुर तथा यक्षो के साय बुढ़ों में श्रेप्ठ सिद्ध होगे ॥7

यो कहकर तन बौर मन से शुद्ध हो, मुनीब्बर ने राम को पूर्वाभिमुख विठाया, व्यान किया और क्रमण दइ-उत्र, वर्म-चक्र, काल-चक्र, विष्णु-चक्त, इन्द्र का वजत्ष और खड़॒ग, वदग-पात्य, वर्म-पाण, काल-पाच, परमकशिव का भयकर चूल, वक्तियुग्म (विष्णु- शब्ति तथा दद्व-बक्ति), भयकर उप्य तथा जनुप्ण बचनियाँ (शुप्काननि तथा आद्द्राशनि), कक्नल (जिन्हें राक्ल धारण करते हे), भयकर करवाल, मूतल, ककण और ऋरौचवाण आदि चस्त्र (श्रीराम को) ठिये इसके पह्चात्‌ (उन्होंने) वडी प्रसन्नता तथा प्रेम से आततेयान्त्र, ब्रह्मास्त्र, तेजअभास्त्र, ऐन्धास्त्र, ब्रह्मणिर, प्रस्थापन, नारायग, पैसाक, जिणिर, दाहण, शौर्य तथा सुदामनू प्रशमन, विलापन, विद्यद प्रभावाला व्याधर, वाबब्य, सौम्य, संठर्त्त आदि नामक अस्त्र तवा मायाबर, मानव, मदन, सौमन, रुद्र, सतापन, मौसल, दर्पण, हयभिर आदि अन्त्र, मायाओ का प्रयोग कर विजय दिलानेवाले गावर्व तथा सम्मोहनास्त्र, बत्य॑ंत विष्ठा-नमस्वित तबा चोणित्तारव्य अद्विवोय आस्नेवास्त्र, गरुहास्त्र, कौबे रास्त्र, नर्निहान्त्र, नागास्त्र, अवार्य वैष्णवास्त्र, सतत स्तुत्व वैद्यावरास्त्र, रौद्रास्त्र, राक्षसास्त्र, कल्याण- प्रद. पाशुपतास्त्र, कत्तेरीचक, मेबाल्तव जेसे अगणित अस्त्रसमूह, अखिल दारुण मोदकी, जझिल्नरी नामक गदाएँ, वामन, पैश्ाच्र तग्ा वायब्य अस्त्र, सोम, सौम्ब, सदर्दध, साम, मदन,

. ब/श/लकाड 52८ संतापन, तामस, जैसे दारुण अस्त्र, ककोल, करवाल, मूसल आदि धारण-योग्य अस्त्र राम को दिये उन्हें लेते हुए राम ने उस महात्मा को देखकर कहा “हे मुनिनाथ, आपकी

कृपा से अभी अस्त्र प्राप्त करके में कृतार्थ हुआ | अब आप मुझे उपसहार के अस्त्र प्रदान कीजिए ।”

ने मे

इस पर प्रसन्न हो उस मुनि ने उन्हें सत्यवत, रभस, परामुख, सत्य-कौत्ति, दशाक्ष, अवाइमुख, प्रतिहारतर, मारण, शुचि, शतवकक्‍त्र, देत्य, धृष्ट, लक्ष्य, कृशन, करवीरक, दश- शीर्ष, शतोदर, ज्यौत्तिय, विमल, मकर, विरुचि, निष्कुलि, प्रमथन, सुनाम, सर्वनाम, दुदुनाभ, पद्मनाभ, तृणनाभ, नैराश्य, का रूप, योगधर, सैमन, निद्रा, सधान, मोहन, विषमाक्ष, महानाभ, बाहुविभूति, जुम्भक, घन, धान्य, वृत्ततत, रुचिर, सार्चिर्माली, धृतिमाली नामक कामरूपवाले महान्‌ अस्त्रो का उपदेश राजकुमार को दिया इनके अतिरिक्त भी (मुनि ने) उस रघु- वश प्रभु को अनेक हास्त्रास्त्र-समूह दिये, उनकी शक्ति बताई, उनसे सवध रखनेवाले मत्र बताये, उनके प्रयोग की तथा उपसहार की विधि बताई शस्त्रास्त्र-सवधी सभी मर्म बताये

तब राम के आगे वे सभी ( इस्त्रास्त्र ) तरह-तरह के रूप धारण करके प्रकट हुए उनमें कुछ अग्नि-सदृश थे, कुछ भयकर थे, कुछ धूमिल काति के थे, कुछ अनुपम दीप्तिमान्‌ थे, कुछ दिव्य शरीरवाले थे, कुछ चद्र-प्रभा-विलसित थे, कुछ भानु- दीप्ति-विलसित थे, कुछ अधकार-विलसित थे, कुछ भयकर अदूटहास कर रहें थे और कुछ पवित्र रूप धारण किये हुए थे उन सब ने मुकुलित करो से (राम के आगे) खडे होकर कहा--हे राजनू, हम कौन-सा कार्य करें, हमें क्या आदेश देते हैँ ? हमें कहाँ भेजेंगे ?” तब राम ने कहा--मेरे स्मरण करने पर तुम चले आना, अभी तुम जा सकते हो ।” यह सुनकर सभी शस्त्रो ने उस वसुवेश की प्रदक्षिणा की और नमस्कार करके चले गये

तब राघव ने मुनिनाथ के सामने हाथ जोडकर विनय, भक्ति तथा विश्वास प्रकट करते हुए कहा--हे अनघ, आपकी कपा से में छतार्थ हुआ ।'

उसके पदचात्‌ वे विश्वामित्र के पीछे-पीछे चलने लगे चलते-चलते उन्हें वामनाश्रम का सुदर प्रदेश दिखाई पडा उसे देखकर काकुत्स्थवशी राम ने कहा-- हें सयमीद्र, इस पर्वत के निकट, नाना मृगो की ध्वनियो, सुदर पक्षियों तथा मृगो से भरा यह दर्शवीय तथा सुदर वन किसका आश्रम है ? यहाँ सब मृग वडे सुख से रह रहे है हे सर्वज्ञ, आपकी यज्ञ-मूमि यहाँ से कितनी दूर है ”? चचल तथा उद्धत राक्षस आपके यज्ञ को अपवित्र करने के लिए कहाँ से आते हे ? से अपने तेज बाणों से उन समस्त राक्षसों को मार डालूँगा और यज्ञ की रक्षा करूँगा ।/

तव कौशिक ने जगदभिराम राम के कपोल स्तेंह से छूकर वडे प्रेम से कहा-- है अनघ, क्या कोई ऐसा विषय है, जिसे तुम नहीं जानते ? यदि मुभसे ही सुनने की इच्छा है, तो सुनो ।॥'

९६ एंग्च/थ एराया/शय् २३, कौशिक का श्रीराम को सिद्धाश्रम का वृत्तांत सुनाना

“प्राचीन काल में विप्णुदेव बड़े आनद से तपस्या करने के लिए यहाँ अनेक युगों तक रहे इसलिए हैँ जनथ, इसे वामनाश्रम कहतें हे उसके पहले यह सिद्धाश्रम नाम नें विख्यात था हे जननाथ, विरोचन का पूत्र वलि अपने विद्याल राज्य-वैभव के कारण घमड से प्रवल होकर देव तथा सुरो को यातनाएँ देने लगा। तब मुनि तथा देवता इस आश्रम में आये और कमलनाम को प्रगाम करके कहा--हे भरणागत-प्रिय, हैं लोकेग, कमलगर्भ, हमारी रक्षा कीजिए हमें गरण दीजिए हमें त्रास देवेवाला वलि यज्ञ कर रहा हैं उस राजक्षस-वज्ञ-भूमि में जो कोई भी जो कुछ माँगता है, वह दे रहा हैं उस यज्ञ की समाप्ति के पहले ही आप हमारा हित सिद्ध कीजिए

उसी समय उज्ज्वल ब्रत-निर्प्ठ कक्यप ने अदिति के साथ एक सहत्न वर्ष का तप पूरा किया उसके उपरात संवुप्ट हो विप्णु ने उन्हें दर्गव दिये तब (उस दपति ने) प्रायंना की--हे रवि-्जणि-लोचन, आप अपने शरीर में हमें समस्त लोको के दर्शन कराइए हें आचन्त-रहित और वेद-वेच्य, हम आपकी चघरग में जाये हे ।'

“विष्णु ने छृपा-दृष्टि से कब्यप को देखकर कहा--आप अपने इच्छानुसार कोई वर माँग लीजिए, में दें दूँगा कश्यप ने वह़ी प्रसन्नता तथा भक्ति से हाथ जोडकर कहा--हे भगवन्‌, आप अत्यत तेज-समन्वित होकर मेरे तथा अदिति के पुत्र होकर जन्म लीजिए तथा सुरो की रक्षा कीजिए यहीं मेरी तथा देंवताओ की इच्छा हैँ हम सब की इच्छा बाप पूर्ण कीजिए ॥”

“कच्यप के इस प्रकार कहने पर विप्णु ने अपने अनुपम तेज से युक्त हो अदिति के गरभे में जन्म लिया उन्होंने वामन का रूप थारण कर उस दानव (वलि) से तीन पृग बरती माँगरी फिर, दो पयो से पृथ्वी तथा आकाण को नाप लिया और उस धन्यात्मा (वलि) को वॉविकर इन्द्र को तीनों लोक देते हुए कहा--ठुम इंने पर आासन करो ।' इसीलिए यह स्थान वामनाश्रम कहलाता है यही हमारा जाश्रम है इस पुण्यभूमि के निवासी तवोसिद्ध हें, अत यह सिद्धाश्रम भी कहलाता है। तुम्ही वामन होकर त्रिविक्रम का अवतार लेनेवाले विप्णु हो उन दिनों में भी यह तुम्हारा ही वन था | हें राम, जाज नी उसी रीति से यह तुम्हारा ही वन है इस प्रकार, कहते हुए कौदिक अपने आश्रम में गये और (वहाँ जाकर) राम-लक्ष्मण का सत्कार किया

२४, विव्वामित्र का यज्ञ

वहाँ के मुनियों नें बड़े प्रेम के साथ राम की पूजा की तव राघव ने विद्वामित्र देखकर बढ्े हर्ष से क्हा--हें मुनीश्वर, आप निश्चित होकर आज ही भन्न-दीक्षा लीजिए | यन्न के झत्रुओं का सहार में अवदय करूंगा ।'

तव्॒विव्वामित्र अत्यत हर्पित हुए जौर मुनियों को बुलाकर स्वय यज्ञ-दीक्षा लीं मुनियों ने बन्न की वेदियाँ तैयार कर दी और यज्न के आवश्यक अयो से यज्ञ-वेंदी सपन्न हो गई घी की आहुतियाँ पड़ने लगीं और जब्नि की ज्वालाएँ जाकाश् तक फैलने लगी हवन की अग्नि के प्रज्ज्वलित होने के साव-ही-साथ साम आदि वेंदो के आनन्द-घोष, निरतर

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( सुनाई पडनेवाली ) देवताओं का आह्वान करनेवाली ध्वनियाँ तथा होताओ के पृण्य- मत्रो के शब्दों से दिज्ञाएँ अत्यधिक गूँजने लगी | एक ओर बडे आइचर्य के साथ यज्ञ के कार्य हो रहे थे, दूसरी ओर रामचद्र धनुष धारण कर, भाई सौमित्र के साथ, वडी सतकंता से, राक्षतों के आरनें का मार्ग पहले ही जानकर उस मुनि विद्वामित्र की रक्षा इस प्रकार करने लगे, जैसे समस्त विश्व को अधकार से आवृत होने से बचाने के लिए चद्र और सूर्य अपनी झ्ारवत प्रभा फैलाते हे बडी भक्ति के साथ पाँच दिनो तक वे (उस यज्ञ की) रक्षा इस प्रकार करते रहे, जैसे पलकें पुतलियों की रक्षा करती है छठे दिन मारीच तथा सुबाहु अपना समस्त बल इकट्ठा करके, उद्धत गति से आकाश में ऐसे व्याप्त हो गये, मानो (उन सबके शरीर) काले मेघों की राशि हो और उनके श्रेष्ठ खड़्गो की काति विजली हो वहाँ खड़े होकर वे गर्णन करते हुए घमड से फूलकर यज्ञ-भूमि में लगातार रक्‍्त-मास की वर्षा करने लगे तब होताओ में कोलाहल होने लगा उपस्थित सदस्यों में कल-कल ध्वनि प्रारभ हो गई परिचारको के दीन वार्त्तालाप सुनाई पडने लगे

यह सुनकर रामचद्र ने क्रोध के आवेश में लक्ष्मण से कहा--हे लक्ष्मण, अब तुम मरी शक्ति देखो उनके घनुष की टकार विजय-लक्ष्मी के धनुष की टकार के समान थी। उन्हीने खडे होकर अपनी दृष्टि आकाश पर केंद्रित की और अत्यव बेग के साथ वायब्य वाण चलाया वह वाण मारीच को द्रुतगति से शत योजन तक उठा ले गया और उस क्रर राक्षस को समुद्र में फेंक दिया वज्ञ के प्रहार से समुद्र में गिरे हुए मैनाक की तरह वह असुर समुद्र में गिरा, फिर किसी तरह तट तक पहुँचा उसने उस सूर्यवशी (राम) के उज्ज्वल पराक्रम की प्रशसा जहाँ-तहाँ की, (अपने) राक्षस-दल को छोड दिया, अपना शौय॑ त्याग दिया, आसुरी वृत्ति को दबा दिया और आसुचद्राश्रम-भूमि में सतत तपस्या भें लीन रहने लगा |

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उसके पह्चात्‌ रघुराम ने सुबाहु के हृदय पर अग्नि-बाण चलाकर उसका सहार कर डाला एक मानव-शर से अन्य राक्षस-सेना का वध कर दिया। (यह देखकर) देवता बडे हर्ष से पुष्प-वृष्टि करने लगे। मुनियों ने (राम की) स्तुति की। जिस प्रकार वृत्रासुर का वध करने पर देवता लोग इन्द्र की प्रशसा करने के हेतु उनके चारो ओर एकत्र हुए थे, वैसे ही (आज) राम अपने भुज-बल के प्रताप से यज्ञ के शत्रुओं को दड देने के कारण (मुनिजनों के बीच) शोभायमान हो रहे थे

विश्वामित्र बडी निष्ठा के साथ यज्ञ की सभी क्रियाओ को समाप्त करके आये और राम को बड़े हर्ष से गले लगाकर उनकी प्रशसा की और आशीर्वाद देकर बोले-- 'रघुराम, तुम्हारी कृपा से में विना किसी कठिवाई के यज्ञ सपूर्ण करके कृतार्थ हुआ ।'

इस प्रकार, उस पुण्यात्मा विश्वामित्र मुनि का अनुराग प्राप्त करके राम ने वही रात्रि विताई और बडे सबेरे, प्रातकाल की सभी विधियो से निवृत्त होकर, सब मुनियों को प्रणाम करके, गाधि-युत्र से कहा--हे तपोनिष्ठ, अब हमारे लिए क्‍या भाज्ञा है ? हम आपके दास हुँ और आपकी कूपा के पात्र है ।”

र्८ र॑ंगनशथ एगायर

तव वहाँ के सभी मुनि गावि-पुत्र को आगे करके इस प्रकार कहने लगें--- हैं रवि- कुल श्रेप्ठ, महाराज जनक वडे सुदर ढग से बन्न कर रहें है हम वहाँ चलें उनके पास परमणिव का ब्व्य घनप हैं गवर्व तथा राक्षस आदि कई वीर उसे उठाने मे असमर्थ

हो चुके हूँ ऐसे धनुप को उठाकर उस पर प्रत््वचा चढानेवाल श्रप्ठ वीर के साथ ही अपनी पुत्री का विवाह करने की प्रतिज्ञा राजा जनक कर चुक हूँ इसलिए उस श्रेप्ठ धनुप को तथा जनक के यज्ञ को देखने आपको अवश्य जाना चाहिए

इस प्रकार विश्वामित्र तथा अन्य मुनियों ने उन वीर, पुण्यात्मा, दाभरथियों को मिथिलापुरी चलने की प्रेरणा दी सव लोग बडे हर्प से प्रस्थानकर गगा के उत्तर तठ पर पहुँचे! और हिमाचल तथा सिद्धाश्रम को दक्षिण में छोडकर* उत्तर की ओर बढ़े उस मार्ग से यात्रा करते हुए वे उस दिन तीसरे पहर तक तीन योजन चले वहाँ शोण नदी के किनारे वे ठहरे और वहाँ के पुण्य तीर्थ में स्तान आदि क्रिया से निवृत्त हुए (उसके पच्चात्‌) उस रम्य स्थल में मुनियों के साथ बडे आनद से रहते हुए राम ने कौणिक से यो कहा--

२४, कौशांबी का वृत्तांत

(श्रीराम ने कहा)--हे मुनिनाथ, अत्यधिक प्रजा-समृद्ध यह देश किसका हैं ? कृपया बतलाइएु तब विष्वामित्र ने कहा--हे राजन, सुत्तो, ब्रह्म के मानस-पुत्र कु नामक एक बजणस्व्री मुनि पूर्व काल में रहते थे। उन्होंने वैदर्भी नामक स्त्री से रूपवान्‌ तथा जात प्रकृतिवाले अधूत्तं रज, वसु, कुआव और कुशनाभ नामक चार पुत्र प्राप्त किये चारो पुत्र जत्यत साहस तथा चूरता के साथ अपने क्षत्रिय-धर्म का पालन करने लगे अपने पुत्रों के चरित्र तथा सद्युण देखकर कुश ने बडे हर्ष से कहा---इस पृथ्वी पर तुम लोगो को प्रजा का पालन करना चाहिए इससे तुम्हारी कीत्ति व्याप्त होगी ।!

“तब कुचल कुशाव ने वहुत प्रसन्न होकर कौबजांवी नाम से एक नगर का निर्माण किया है दणरस्‍्थात्मज, कुगनाभ ने महोदय नामक नगर बसाया | शूर अधृत्तेरज ने घर्मा- रण्य नामक सुंदर नगर का निर्माण किया और वसु नें गिरिवत्व नामक एक अत्यत दर्शनीय नगर वबसाया यह प्रदेश , जहाँ हम हे, महाराज वसु के राज्य में हैँ ; इस प्रदेश के चारो दिल्लाओ में पाँच पर्वत है उन पव॑तो के मध्य मागधी नामक एक नदी बहती है इस सारे मगव देंग पर वसु महाराज अत्यत धर्म की रीति से प्रजा का पालन करतें हें

“कुशनाभ ने घृताची नामक एक अप्सरा से प्रेम करके (विवाह किया)। मन्मथ-शर जसे नेत्रवाली सौ रूपवती पुत्रियो को प्राप्त किया एक दिन कमनीय कातिन्युक्त तथा

मनोहर यौवन-सपन्न वे युवतियाँ उद्यान में गईं

गंगा के दक्षिण तट से चल; क्योकि उत्तर तट पर पहुंचकर चलने से शोण नदी नहीं मिलगी “-प्तम्पादक

२० हिमाचछ तो “जनकपु' से भी उत्तर हैं, उसे दक्षिण में छोड़कर “सिद्धाअम से चलना अमंगत हेँं। वाल्मीकिरामायण में लिखा हे कि सिद्धाअरम हिमालय की ओर उत्तर विश्ञा सें जलने के उद्देश्य से वे चले ।--तम्पादक

बएालकीड र्‌€

“वहाँ अपने मजीर, मेखला तथा ककणों को मधुरमधुर मुखरित करती हुई ताल- गति के साथ लास्य करने लगी कुछ युवतियाँ मृदु-मधुर रीति से मृदग आदि वाद्यों को बजाने लगी, कुछ अपने कर-पल्‍लवो से वीणाओ को क्वणित करने लगी, कुछ अन्य युवतियाँ आमू-मजरी के मधु-पान से मस्त कोकिल-कठ से गान करने लगी। इस भ्रकार वे सभी कन्याएँ उस उद्यान में क्रीडाओं में मरंन हो गईं

उन सुदरियो को देखकर काम-पीडा से व्याकुल होकर पवनदेव ने उन मानिनियो से कहा--- है मानिनियो, आप किड्चित्‌ मेरी वात पर ध्यान दें हे पद्माक्षियों, आप मुझे (अपना पति) वरण करें और अमरत्व को प्राप्त करें। इस तरह आप अजर-अमर होकर सतत यौवनावस्था में रहती हुई उन्नत कीर्ति प्राप्त करेंगी ।'

“तब उन कन्याओ ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया--हे अनिल, आप सब के हृदयो में सचार करनेवाले हे आप हमें जानते हे हाय ! आप अपनी महत्ता का भी विचार किये विना क्‍या कह रहें हे ? हम उस कुशनाभ की पुत्रियाँ है, जो नीति-तय-सपन्न तथा धर्मानुरक्त हे हमारे पिता के रहते हुए हम अपने-आप किसी का वरण कर लें, तो इससे हमारे कुल को कलक लगेगा हमारे पिता हमें (विवाह में) जिन्हें देंगे, वे ही हमारे पति होगे

“यह सुनकर पवन अपने क्रोध को सँसाल नहीं सका उसने उनके अगो में प्रवेश करके उन्हें कृब्जाओ के रूप में परिवत्तिंत कर दिया खिन्न होकर वे सभी (क्न्याएँ) अपने पिता के सामने गईं और सिर भूकाये आँखों में आँसू भरे खडी रही कुशनाभ अपनी पुत्रियों की दशा देखकर सहम गये और पूछने लगे--हे पुत्रियो, तुम्हें ऐसा रूप कैसे प्र/प्त हुआ ? किसने ऐसा किया ? तुम बोलती क्यो नहीं हो ? इसका क्या कारण है ?”

“तब उन धवलाक्षियों ने हाथ जोडकर अपने पिता से कहा--'पिताजी, हमें देखकर पवन ने निर्लज्जता से कहा कि हे सुदरियो, तुम लोग मुझे वरो हमने उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं करको कहा कि आप यह बात हमारे पिता से जाकर कहिए | इसपर उस क्रूर ने कामाध होकर हमें कुब्जा बना दिया ।”

यह सुनकर उन्होने उन कमलाक्षियो से कहा--हे कनन्‍्याओ! ओऔचित्य और धर्म का विचार करके (कुल की मर्यादा का उललघन करना) अनुचित समभकते हुए तुम लोगो ने उस मर्यादा का पालन किया तुम्हारे इस गौरवपूर्ण कार्य से मेरे कुल की प्रतिष्ठा बढ़ गई हैं देवताओं के सबंध में क्रोध करने का साहस तुमने तहीं किया इस प्रकार तुम्हारा सहन कर जाना ही उत्तम हैँ क्षमा (सहनशीलता) ही सत्य है, शील है, तप हैं, घमं है और कीत्ति है वही समस्त लोको की रक्षा करनेवाली है

“इस प्रकार (सात्वना देकर) राजाने अपनी कनन्‍्याओ को विदा किया [ परचात्‌) उन्होने अपने मत्रियों से परामर्श करके पुण्यात्मा चूली नामक मुनिवर के पूत्र सद्गुण-सपन्न ब्रह्मदत्त को बुलावा भेजा और निर्मल मति से उस महात्मा की धर्म पत्नियों के रूप में अपनी कन्याओ को दे दिया चूली-पुत्र के उन्हें स्वीकार करते ही उन कन्याओ की त्रिकृति दूर हो गई ।”

रंगनाथ रशयायण

रब] कि

8.

है अवनीण, उस ठिन से वह उत्तम नगर कन्याकुव्जा के नाम से इस पृथ्वी पर विख्यात हुआ तव कुमननाभ अपनी पुद्धियों के कमनीय रूप देखकर बहुत प्रसन्न हुए और अपनी पत्रियों तथा जामाता को विदा किया तब कुथ ने अपने पुत्र कुचनाभ को सवोबित करके कहा-- तुम पुत्रकामेप्डिय्यन करो' तो तुम्हें जमित कीत्तिमान्‌ तथा पुण्यात्म गाधि नामक पुत्र होगा यो छह्ककर वें ब्रह्मतोक सिवारे

“कु के पौत्र रूप में गाथि ने जन्म लिया। हे द्रवात्मज, में उसी गावि का पूत्र हूँ क्य वंच्ज होने के कारण मुझे कौणिक भी कहते हे गुणवती तथा धर्म-निष्णाता वडी वहन सत्ववती, अपने प्राणेब्वर ऋचिक के साथ सणरीर इन्द्रलोक में गई और सम लोक का कल्याण करने के लिए प्रालेब-पर्बरत में स्वव कौथिकी नाम से नदी के रूप में वह रही है सिद्धाश्रम में प्रवेश में करने के कारण सच ही में तप सिद्ध हुआ प्राचीन काल से में अपना नाम तथा इस देच के निर्माण के सवव में यह वृत्तात सुचता रहा हूं जब हें राजन, वद्ध-रात्रि हो गई तुम ठहुत थर्क हुए हो, अत- विश्लाम करो

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6. -प/ (3 £|

“मनी वृक्ष स्थिर हो गये है, इस वन-प्रान्त में मृग-समूह का संचार अब नहीं रहा, विहग बअमबने घोसले में पहचकक्‍न अपनी मीठी वॉलिसय्गे को भूले हुए पड़े हैं, अव निश्ाछ र,

वक्ष तवा राक्षण अपने इच्छलुसार इस पृथ्वी पर सचरण_ ऋन्‍्ंगे, समस्त दियाएँ तथा

आकाश कालिख बोले हुए-पे अवज्ासम्य दीख रहे हे, ब्रह्मण्ड-त्ती गृह के लिए चीलावर में लगाये

हुए मोतियों से युक्त तव्‌ के सम्रान यह आकाञ नक्षत्रों से युक्त होकर बोभा

तवा जन-जन को आनदित कस्ते हुए सल्नत्र-पति अमी-अझी उदित हो रहा है

उन वचतों से प्रसन्न होकर सबथमी मुनियों ते विब्वासित्र से कहा--हे अनघ, आपका

व्य अमल हूँ आपके वच्चज बतुलनीय म्गह्मत्म्मगने हैँ आप ब्रह्मा के समान हे | आपका

ब्रह्म-तेज स्तुत्व हैँ तव विव्वामित्र ने उन मुनीज्वरो को बन्यवाद दिये फिर राजकुमार हे!

तथा मुनिजनों ने उस रात्रि को वही णबन किया

“प्रात काल होने पर ऋषियों तथा विच्वामित्र ने (राजकुमारों से) कहा--हें राज- कुमारों, जब तुम निद्रा तजों ।! वे जग॒ पड़े और प्रातःकाल की क्रियाओ से निवृत्त होकर कौशिक से कहा--“ग्ह ग्ोण नदी-रत्न कितना जगाव और सुंदर हैं ? मछलियों से परि- पूर्ण, अत्यत रमणीय सैंकत स्थल, मबुर जल तथा परिचित हस आदि खगब-कुल से जोमायमान, मद-मद पवन (के कारण ) तरल तरंगो से युक्त यह नदी बडी ही रमणीय हैं। हैं जनव, हम कहाँ और किस प्रकार इस नदी को पार करेंगे ?”

तठ विद्वामित्र ने कहा--मुनिलोग प्राय जिस स्थान से होकर इसे पार करते हैं, उसे जानकर हम भी वहीं से इसे पार करेंगे

इस प्रकार कहते हुए वे सव लोग कुछ दूर आगे चले (वे ऐसी जगह पहुंचे), जहाँ कुल हम, सारस, कारइग आदि जल-सक्षियों का कलनाद ऐसा मीठा सुनाई पड रहा था, मानों वें लोगों का क्वायनत कर रहें हो ताम ने उस ध्वनि को सनकर, मध्यात्ष

समय सिद्ध मुनियुगवों से सुसेवित, छझुद्ध तथा पृण्य जल से पूर्ण, पथ्ची में श्रेष्ठ नदी के

नाम से विख्यात जाक्वदवी को देखा और उसको प्रयाम करके कहा--हें गावेब, वह जो

ब/लकाड ३४

अगाथें श्रेष्ठ नदी दिखाई पड रही है, वहाँ तक हम कैसे पहुँचेंगे ?” तब मुनि बोलें---

फि

हैँ नरताथ, शोण नदी को पार करके तीन योजन आगे जाने पर हम उस महानदी के पास पहुँच सकते हैँ तब तक हमें मार्ग में जल और फल आदि बहुत मिल जायेंगे ।'

यो कहकर वे (शोण) वदी पार करके चलने लगे (निदान) वें उस गगा नदी के तट पर पहुँचे, जो सारस-समूह्‌, पृण्य-सलिल, विकसित-कमल, फेन तथा सुदर मछलियों से युक्‍त हो नित्य गभीर गति से बहती थी। वे वहाँ घन-लता-कुजों से युकतत एक समतल स्थान पर ठहर गये वहाँ राजकुमार मध्याक्ष की (संध्या आदि) पूजाओ से निवृत्त हुए, वडे आनन्द से उचित आहार ग्रहण किया और मुनियो की सगति में बैठकर वार्त्तालाप करने लगे

(उस समय) राजहसो द्वारा (कमल-पुप्पो को) हिलाये जाने से गिरे हुए कमल- रज से पूर्ण तथा राजीव-राजित तरगों से युक्त गगा नदी को देखकर क्षत्रिय-तिलक रामचद्र ने कौशिक से पूछा--हे महात्मा, गगा नदी इस पृथ्वी पर कंसे आई, यहाँ से वह स्वर्ग- लोक में कंसे पहुँची पाताल को वह कंसे प्राप्त हुई ? कंसे वह समुद्र में जा मिली ? उस महानदी का जन्म कैसे हुआ ? कृपया बताइए ।' तब उस पृण्यधनी विश्वामित्र ने राम से कहा--हिमवानू (हिमालय) के कमनीय

दीप्तिवाली दो पृुत्रियाँ है देवता लोग हिमालय से प्रार्थना करके उन दोनो में से बडी पुत्री पुण्यशीला गगा को यज्ञ के लिये स्वरगगलोक में ले गये दूसरी कन्या परम सुदरी पार्वती को भाल-लोचन (शिव) की घोर तपोनिष्ठा से सतुप्ट हो, उन्हें पत्नी के रूप में दिया गगा सुरुचिर गति से स्वर्ग में गई और वहाँ सुरतदी के नाम से विख्यात हुई ।'

इतना कहने के बाद मुनिवर ने राजकुमार को देखकर कहा--“और एक वृत्तात है, सूनो पार्वती से विवाह ,करने के पदचात्‌ चद्र-शेखर (शिव) वडी अनुरक्ति के साथ एक सौ दिव्य वर्षों तक रति-क्रीडा में निमग्न रहे। तव ब्रह्मा से लेकर समस्त देवता अपने-आप सोचने लगे कि इन दोनों (शिव-पावंती) का विषम तेज कौन धारण कर सकेगा ? इनके द्वारा उत्पन्न पुत्र की विषम शक्ति के सामने कौन टिक सकेगा ? इसलिए वे सब महादेव के पास जाकर बडी भक्ति से विंनम्न हो कहने लगे--हे देवाधिदेव, हे महेश, हे सर्वेश, आपकी महिमा सभी देवता जानते हे हे सर्वज्ञ, आप हम पर प्रसन्न होइए आपके महान्‌ तेज को धारण करने की क्षमता किस में है ? इसलिए आप यह क्रीडा छोड दें आप कृपा करके तपोवृत्ति ग्रहण कर ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए इस पर गौरीश ने उनकी वात स्वीकार कर ली और कहा-- (किन्तु) अब तो तेज अपने स्थान (रेत स्थान) से विचलित हो चुका है अब आपमें से कौन इस तेज को धारण करेगा ? तब उनकी बात मानकर हर ने अपने (तेज का) विमोचन धरती पर कर दिया तब देवताओ ने अग्निदेव को देखकर कहा--हे पावक, तुम पवन के साथ, घरती पर पढे हुए तेज में प्रवेश करो ।” अग्नि तथा वायु उस तेज को धारण करने में असमर्थ रहे तव गंगा नदी ने उस तेज को बडी श्रद्धा के साथ धारण किया लेकिन अपने प्रभु का तेज धारण किये रहना उसको लिए भी असभव हो गया वह भय से कॉँप उठी और उसकी लहरें

2 रंगर्नाश्यं एर्येगण्यर्ण

> जज 2 उसने क्षमित से उस नेज के ने तठ नय प्रन्द अन्त हुएु उसने ठव गई ॥। तब उसने नह्षानत चित्त से उस तेज को अपने ६5

| ्ज तिय्ठिद 2 ..... दया शिव का दा उस सरकडे जो पर उननेदाल सरखड्ा के बन में अ्तिख्ठझय जभु दिया वधिव का तंज उस सरकंड के

हुज्ञा £> झपतस -_. नित्ण ब्>जज+ निवत्त ७०. >> ञा पन्ची उन्द्दोने +> एुजल दिन ऋषिझ्ऊत्नियाँ अपने नित्ण इृत््यों से निवृत्त होने व्हाँआ पहुँची उन्हों व्क

> पं विचार क्थिा हम ठच हि ठिठर य्ही >> सन्‍कड़ो स्तान दसते समय आाउस में विद्वर क्या कि हम ठड से ठिदुर रही है, इसलिए सनन्‍कड

की उस कड़ी में त्रेतान्तिरों के समाच प्रज्वलित होनेगाली उन अन्नियों की हम चरण लेंगी (उसने पास ऊाजर अपनी ठड् दूर करेंगी)। इस प्रकार सोचकर वे ऋषि-पत्तियाँ उन अग्नियों के उास जा पहुँची

जो स्त्रिणँ उव अग्नियो के पास गई और उिन्होने बड़े उत्साह से उन्हें देखा, वे

नि टिक मििनिि मे हि अ्त्यत रे भीत कप उठी और हद पच्चात्त रे करती हि संत गर्भठती हो गई। (इस बत्यत मात हा उठी और पच्चात्ताप करती हुुू

न्ज्ज >> छआनतच्चि ल्ज्पि्ज्जिलज >> अजाजईी- नअभ योग: जाप जप कि वत्तान्त . जान लिया बर उडी झावहित मृतियों ये अण्नी योन-दृष्टि से उस सारे वृत्तान्त को जान लिया

च्द लए वि स्द्रियो 5 पुल सब्र तम्तार > गर्व तथा सख्र इच्छा फल खेत द्वार इच अन॒च्द्या त् तह्ा-शणथतु लब तुम्हार नव तथा सुद्ध का इच्छा का फल हू > उठउद्छान ञ>5 स्त्रियो छर क्राधोन्मतच >> >>: सारी ०2... _. 9 -अमिि हुए. -+- _-. बोले प्त्म (इसके द्छ् तर) चस्त्िय « क्रावन्मद् हा, सात पृथ्वा का कपात॑ हुएनस वाल-- तु

बे तम्हें का 0.9. नही करनी चाहिए अपने कप पतियों बिक पथक #य्छो जायो कक डर सब वाद्टहाच हा, तुम्ह क्षमा नहा रवा चाहिए | तुम जपने पांतियां से वक् हा जे |

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ल्च्ी >>» स्त्रियाँ जपने गर्भ पर वपतने >> हाथो कण ताइन करने लगी इस अक्नार चलता हुई ल्व्ियाँ अपन गे पर के हाथ से ताड़न करने लगी

गर्भ विच्छिन्न हो छह खडो में पथ्ठी पर गिर गये वे

प्‌ <........5 गिर ह्ए उन खंड़ो अनकर > 5 _+ तप करने >> ( स्त्र्या पर हुई उप सोडा का चुनतक्र उन्ह सरकंड के वन में रखकर कर चली गई उद्र ऊपर नें रद्धई एक >->>-_. एक्त्र >. होज्र बहनें + लगा और पर “छह उन्र ठेज वहाँ एक पट ऐुक्त्र हाज्र बहने ल* वहा इस पृथ्वचा पर

ब्वेठाद्ि के नाम से व्ल्वात हुआ | उस पर्वत पर परम छिव के तेज से कुमार वा जन्म जन्न-स्थन सरकडो दे भरा प्रदेश था, इसलिए वें गरजन्मा

(धरहमनव) ल्हलाये इस पृथ्वी पर जन्म लेने के पच्चात्‌ कृत्तिकाअ्ं ने उन्हें स्तन्य-पान लतक्र शातालोडा, इसलिए उनका नाम कात्तिक्े पड़ गया | वे माताएँ (छत्तिकाएँ) छह थी | ब्लएव उन्हें सतुप्ट करने के लिए कुमार ने छह मूह धारण करके स्तन-पान किया, इसलिए वें पत्मुख ( बौर पाणप्मातुर ) कहलाये अउच्द्रमौलि के वीर्य॑-स्कंदन (पतन) से उनका जन्‍म हुआ, इसलिए के स्कठ क्हलाये

के

“(किन) वहाँ देवठा भिव-पाव॑ती की स्तुति करने लगे (पत्रोत्पत्ति में बाबा डालने

के करा देवताओं पर) कद्ध होकर लाल-लाल नेत्रो से उन्हें देखती हुईं पार्वती ने कहा--- देखताओं कि तम द53...- वन बरा संतानहीन जाओ पु पु है देवताओं, ठदुन आर यह वनुवरा संतानहीन हो जाओ जाये से इस पश्ची को बहु- पद्ित्व प्राप्त होगा (बह सनकर) देवता व्याक्ल > रः पार्वती दित्द आप्त होना (बह सुनकर) देवता व्याकुल हुए उसके पब्चात्‌ चिवजी पार्व॑त >> 5 ्ब जे 5 के साव तपस्ण करने हिमाचल पर चले गये “इन्द्र के साथ सभी देदता ब्रह्मा के पास गये और उनसे विनती की-... 8 न्द्र्कछ्य साथ सन दता ब्रह्मा के पास गय उनसे की-- हें जलज-

+ त्यत भजदर एक सेनावति चइनव, हसन कर हवदा छुक सनावांद प्रदान कीजिए 7 तब उन्होने देवताओं को देख-

ब/लकाड ३३ देखकर कहा--गौरीश के पुत्र कात्तिकेय तुम्हारी सेना का नायकत्व ग्रहण करेंगे ।” देवता बहुत प्रसन्न हुए और कात्तिकेय उनके सेनाषिपति हुए इससे इन्द्र को उन्नति तथा सुख प्रपप्त हुए ॥”

इस प्रकार मुनि के कहने पर रघुराम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें देखकर कहा-- है सयमीश्रेप्ठ, इस महानदी (गगा) के त्रिपथगा होने का क्‍या कारण है ?'

२६. गंगा नदी का वृत्तान्त

तब कौशिक श्रीराम से उसकी कथा यो कहने लगे--“पुण्यवान्‌ सगर अयोध्या के विख्यात सम्राद थे पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने (एक बार) हिमाचल में भृगु की तपस्या की उनकी तपस्या से सतुष्ट होकर भूगु ने उन्हें देखकर कहा--हे राजन, तुम्हारे बहुत-से कीत्तिवान्‌ पुत्र होगे तुम्हारी एक स्त्री एक वशोद्धारक पुत्र का जन्म देगी और दूसरी स्त्री साठ हजार अतिवलशाली पुत्र उत्पन्न करेगी यह वरदान प्राप्त करके रानियो ने हाथ जोडकर बडे विनय से मुनि को प्रणाम किया और पूछा--हे मुनीश्वर, हम (दोनो) में से किसके एक पुत्र होगा और किसके साठ हजार पुत्र उत्पन्न होगे ?! तब मुनि बोले--तुम्हारी इच्छा जेसी हो, वैसे ही पुत्रों का जन्म होगा इससे प्रसन्न होकर बडी रानी ने राजा से (अपने) नाम को सार्थक करनेवाले एक ही पुत्र पाने की इच्छा प्रकट की दूसरी रानी ने साठ हजार पुत्रों को प्राप्त करना चाहा फिर उन्होने बडे हर्ष से उस मुनिश्रेष्ठ की परिक्रमा की, उन्हें प्रणाम किया और नगर को लौट आये

“कुछ दिनो के पश्चात्‌ बडी रानी केशिनी ने असमजस (अश्वमज) नामक एक पुत्र को जन्म दिया (दूसरी रानी) सुकृति ने लौकी के आकार का एक गर्भ-पिड उत्पन्न किया, जिसमें से बडे आइचयें से साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए तब धाइयो ने उन शिशुओ को घी के पात्रों में रखकर कुछ दिनों तक उनका पालन-पोषण किया वे क्रश रूप तथा यौवन प्राप्त करने लगे ज्येप्ठ पुत्र बडे दर्पष के साथ अपने छोटे भाइयों को बलातू पकड- पकडकर सरयू नदी में फेंक देता था और (उन्हें डूबते देख) बहुत हर्षित होता था ऐसे दुष्ट असमजस के अशुमान्‌ नामक एक तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ असनजस को अति- दुष्ट जानकर राजा ने उसे निर्वासित कर दिया और शाइवत-घर्म-निष्ठा में तत्पर हो अश्व- मेध-यज्ञ करने का यत्न करने लगे ।॥”

मुनि के यो कहने पर श्रीराम ने कौशिक से कहा--हें मुनिनाथ, मुभे अपने पूर्वजों के चरित सुनने की बडी इच्छा हो रही है कृपया विस्तार से कहें ।'

तब विश्वामित्र कहने लगे--हिमाचल और विंध्याचल के मध्य की भूमि में सगर ने अपना अद्वमेध-यज्ञ प्रारम किया यज्ञाइव की रक्षा करने के लिए अशुमान्‌ नियुक्त किया गया उस समय इन्द्र राक्षत का वेश धरकर अहव को चुरा ले गया और पाताल- लोक में प्रवेश करके वहाँ तपस्या में लीन कपिल मुनि के निकट यज्ञाइव को बाँधघकर स्वय स्वर्गंलोक को लौट आया अइव का पता लगने से कऋ्रुद्ध होकर राजा (सगर) ने अपने पुत्रो को सबोधित करके कहा---अइव का कही पता नही हैँ कोई कुटिलात्मा उसे चुरा ले गया हैँ | अत तुम लोग तुरत जाओ और जिस किसी के पास वह अश्व हो, उसका

4

३8 संगनाथ रायायफों

बव करके अब्व को जीघ्र ले आबजो ।॥ साठ हजार सगस्पुत्र अपने भुजन्वल का प्रदर्शन करते हुए, निकल पडे उन्होंने पहले स्वर्ग, फिर भूलोक में अच्छी तरह उस अच्व को ढूँढा जब कही भी उसका पता चला तब वे पृथ्वी को टुकडे-टुकडे करने लगे हममें से प्रत्येक्त एक योजन पृथ्वी को खोद डा्लेगे--ऐसा निध्चय करके वे प्राच्य दिशा से प्रारम करके, वडी-वड़ी कुदलों और घूलो से पृथ्वी को रसातल तक खोदने लगे इस प्रक्रित में सामने आनेवाले पात्तालवासी तथा अन्य प्राणियों के समूहों का सहार भी वे करते जाने थे

४इस प्रकार उन अतुल वलग्याली राजकुमारों ने साठ हजार योजन भूमि सहज ही खोद डालो | इस प्रकार अम्नख्य प्राणियों से युक्त जबद्भगीप को सतत खोदतें हुए, उपद्रव करनेवाले समस्यपुत्रो को देखकर अमर गवर्व तथा सिद्ध घबरा उठे और ब्रह्मा के पास जाकर भक्ति से प्रणाम करके बोले--हे जलजसभव, वन, पर्वत तथा द्वीपों से युक्‍तत इस पृथ्वी को समस्झपुत्र खोद रहे हें जो कोई भी उनकी दुष्टि में पड जाता है, उसे इसीने यन्न में वाद्य डाली है, यही अच्चहर हैं, ऐसा कहते हुए व्यर्थ हो उसका वव कर डालते हैं इस प्रकार उन्होने कितने ही जक्ति-सपन्न जलचरों का सहार कर डाला आप कृपया इसकी निवारण का कोई उपाय कीजिए

“तब ब्रह्मा ने उनसे कहा--अव्यय दामोंदर (विष्णु) कपिल मुत्ति-के रूप में-तप कर रहे है उस मुनि की क्रोवास्नि में वे सब भस्म हो जायेंगे

“सगर-ुत्रो ने वज्ञ के समान भयकर गर्जन करते हुए इस पृथ्वी को चारो ओर से खोद डाला, किन्तु उन्हें कही भी घोडे का पता चला | तब वे अपने पिता के पास लोठ आये और बोले--हे देव, हमने समस्त पृथ्वी छान डाली, किन्तु कही भी हमें अहव के चोर का पता नहीं चला | जब जैसी आपकी आाज्ञा हो

“तब राजा ने अत्बन्त क्रोव से अपने पुत्रों से कहा--तुम लोग समस्तः विश्व में व्याप्त होकर घोंडें की खोज करों | विना अब्ब के तुम लोग यहाँ मत आना।।'

#“सगरयपुत्रों ने पिता की आज्ञा विरोवारण करके वडी भयकर गति से रसातन में प्रवेश किया वहाँ वे पूर्व से लेकर दक्षिण की तरफ खोदने लगे पूर्व दिशा-भर में खोजने पर उन्हें कही भी घोडा दिखाई नहीं पड़ा उन्होनें वहाँ पर एक श्रेष्ठ गजेन्द्र को देखा, जो चारो ओर से प्थ्वी-तल को इस प्रकार सभाले हुए था, जैसे विष्ण ने अपनी सन्दर भुजाओं से पुथ्वी को ऊपर उठाया था सगर के पुत्रो ने उस गजराज को देखकर उसकी पूजा की बौर विना विलब किये आग्नेंय दि्या में चल पडे वहाँ खोजने पर भी उन्हें उन अब्बव का पता नही लगा वहाँ निरतर वहनेवाले मदजल की सुगवि से आक्ृष्ट, जअनरा से युक्त 'पुण्डरोकः नामक गज को देखकर उसकी पूजा तथा स्तुत्ति की और दक्षिण द्य्यि में चल पट़े वहाँ भी उन्हें अजब का कोई समाचार नहीं मिला किन्तु वहाँ उन्होने वामन' नामक श्रेष्ठ गजकों देखकर उसकी अर्चना की और नैऋती दिलणा-में खोज करने लगे वहाँ भी अब्व का पता नहीं लगा वहाँ उन्होंने कुमुंद-समान कोमल तथा कुमुद-पुष्प वर्णबवाले कुमुर्दा नामक कुजर को देना उन्होंने उसको प्रणाम करके परिचम

न्कालकाड ३२

:की- ओर. प्रस्थात किया वहाँ खोजने पर भी अद्व नही मिला पर -वहाँ उन्होने अजन- पर्वत के समान, मदजल से युक्त अजन” नामक हाथी को देखकर उसकी वदना की -वे वहाँ से -वायव्य दिशा में निकल पडे, पर बहुत समय तक खोजने पर भी ल्‍्ञभइव - का - पता नहीं लगा सके वहाँ 'तमुचि'- नामक राक्षस का सहार करनेवाले हाथी के -समान दाँत रखते हुए भी पुष्पदन्त' नाम से अभिहित गज को देखकर बडी भक्ति से “उसको प्रणाम किया और वहाँ से कुबेर की दिशा (उत्तर) में खोजने निकले वहाँ भी उन्हें अशबव नहीं दीख पडा वहाँ उन्होने समस्त गज-लोक के चक्रवर्ती के समान विराज- “मान सावंभौम' नामक गजेन्द्र को देखा और वडी भक्ति से उसको प्रणाम किया वहाँ से ऐशानी दिशा-में चले उस समय उन्होने निकट ही नेत्र बद किये हुए एकात तपोनिष्ठा में लीन हवनाग्नि के समान ( पवित्र ) अनघात्मा महामुनि कपिल को और उनके पास -ही अछ्व को (वँधा हुआ) देखा सगर-पुत्र उन्हें कष्ट देने लगे | जब मुनि ने -क्रोध में आकर उनकी ओर दृष्टि डाली, तब वे साठ हजार सगर७>जयुत्र वही भस्मीभूत हो गये

“अश्व के लाने में विलब होते देखकर 'सगर” बहुत दुखी हुए और उन्होने अपने पोते अशुमान्‌ को भेजा अशुपान्‌ भी उसी मार्ग से गया और पूर्व दिशा में रहनेवाले 'विरूपाक्ष। नामक हाथी को देखकर उसकी परिक्रमा की और उससे विनयपूर्वक पूछा-- है .गजराज, क्या आप बता करते है कि मेरे चाचा किस दिलख्षा में गये है, कहाँ हे और अश्व का चोर कहाँ छिपा है ?'

तव उस गजराज ने अशुमान्‌ को बडे स्नेह के साथ देखते हुए कहा--हे राज- कुमार, तुम किसी स्थान में अवश्य अश्व को देख सकोगे ।' वहाँ से चलकर प्रत्येक दिग्गज से इसी प्रकार प्रश्न करते हुए और इसी प्रकार का उत्तर प्राप्त करते हुए अत में उसने कपिल मुनि के निकट यज्ञाश्व को देखा वहाँ सगरपुत्रो के शरीरो की भस्म-राशियो को देखकर वह शोक-सतप्त हो गया उसने अपने पितरों की तिलोदक-क्रिया करने के विचार से जल की खोज की, प्र वहाँ जल कही भी नहीं मिला

२७ गंगावतरण की कथा

“उस राजकुमार पर दया करके उस समय वहाँ गरुड आये और राजकुमार से कहने लगे-हे पुत्र, कपिल को क्रोधित करके उनकी क्रोधाग्नि से सर्भी सगर-पुत्र भस्म हो गये हे. “इस तरह ' 'शोक-सतप्त क्यो होते हो ”? यह जोक करने का समय नही हैं एक बात सुनो सरसिजासन ([ ब्रह्मा ) के लिए वद्य, अरविद-चरणवाले, अरविददल-नेत्रवाले, आदि- पुरुष (विष्णु) ने दानव-राजा वलि को बाँवते समय, त्रिविक्रम का रूप धारण करके, अपनी अगणित शक्ति से दो पादों में ही समस्त पृथ्वी को समेट लिया था और जलजात, 'जलचर,- तथा शख-चक्र के लिए परिचित तीसरा चरण ब्रह्मतोक तक फैलाया था तब -बअह्या शीघ्र चहाँ आये और बडी भक्ति के साथ अपने कमडल के जल से उनके चरण- “कमल धोये वह जल स्वर्गलोक में मदाकिनी के नाम से वह रहा है तुम बडी भवित के साथ ब्रह्मा की कृपा पाने के लिए तपस्या करो और स्वर्गलोक की उस गगा को इस

३६ रंगनाय एयायणग

पथ्वी पर ले आओ उस पवित्र जल से इन भस्म-राणियों को सीचने से ही सगर-पुत्रो को स्वरगेलोक का सख प्राप्त होगा इसलिए तुम पहले इस अश्व को लेकर जाओ

“अगमान जब्व को अपने साथ लेकर गया और अपने दादा को सारी कथा कह सनाई )! सगर अन्यत दुखी हुए उन्होने पुण्य-यज्ञ समाप्त किया और उसके पश्चात मदाकिनी को पृथ्वी पर लाने के उद्देब्य से तीम हजार वर्ष तक सतत तप करते रहे और (विना सिद्धि प्राप्त किये ही) स्वर्ग सिधारे उस राजा का पोता जज्चुमान्‌ भी मदाकिनी को पृथ्वी पर लाने का दुढ सकल्प करके लगातार तीस हजार वर्ष तक तपस्था करने के वाद स्वर्ग-लोक को प्राप्त हुआ उसका पुत्र राजा ब्लीप भी मदाकिनी को पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तीस हजार साल तक तपस्या करता रहा और अत में वह भी रोग-पीडित होकर दिवगत हुआ उसके पुत्र पुण्यवान्‌ भगोरथ् ने अपना राज्य अपने मत्रियों के हायो में सौपकर धघर्मात्मा तथा सद्गुण-ज्रपन्न पूत्रों की प्राप्ति तथा पृथ्वी के समस्त पापों को दूर करने की इच्छा से जाकाण-गगा को पृथ्वी पर ले आने का दुढ सकल्प कर लिया उन्होने अत्यत्त भक्ति के साथ गोकर्णाश्रम में दस हजार वर्ष तक अनुपम रीति से तपस्या की उनकी तपस्था से सतुप्ट होकर ब्रह्मा ने उन्हें दर्णन देकर कहा कि तुम कोई वर माँगो

ध्तुव भगीरव ने हाथ जोडकर कहा--हे रती-ब्ल्लभ, हे लोक-बल्रप्टा, हे सर्यलोक- रक्षक, हे सत्यसपन्न, हे व्विता हमारे पूर्वज अपनी उद्दण्डता के कारण कपिल की क्रोध/रिति में भस्मीभूत होकर सौ सहस्न वर्षो से परलोक-गति से वचित हो भब्म के रूप में पढ़ें हुए हैं। उस भस्म को मदाकिनी के पवित्र जल से सीचे विना उन्हें मुक्ति नही मिल सकती ।'

#इस पर ब्रह्मा ने कहा--परमणिव के अतिरिक्त अन्य कोई उस गगा को धारण नहीं कर सकेंगे इसलिए, तुम निप्ठा के साथ शिव की तपस्या करो कि वें गगा को घारण करें इतना कहकर ब्रह्मा ने भगीरथ को उनकी इच्छा के अनुसार पुत्र-प्राप्ति का वर दिया और ब्रह्मलोक को चले गये

“उसके पच्चात्‌ भगीरब ने एक अगूठे पर खडे होकर शिवजी के प्रति घोर तपस्या की उनकी तपस्या से सतुप्ट होकर जिवजों ने उन्हें दर्शन देकर कहा--- तुम गगा को ले जाओ, म॑ उसे जपने सिर पर घारण करूँगा तव भगीरव ने गया की प्रार्थना की गगा गगन-मडल तथा नक्षत्र-मइल को भेदकर समस्त लोको को अपने गुरु गर्जन से गुंजाती हुई, सारे जगत्‌ को भयभीत करती हुई, यो प्रवाहित होने लगी, मानो वह कुल- पर्वतों से युक्त पृथ्वी के साथ महादेव को भी पाताल तक वहा ले जाना चाहती हो शिवजी ने उसका गवे-भग करने के लिए अपने जटा-जूट को ऐसा बढाया कि गरगा उसमें उलभकर बाहर निकलने में असमर्थ हो गई

/तव भगास्थ जाइ्वर्य करने लगे, उतनी विज्ञाल जल-धारा कहाँ छिप गई होगी! उन्हें भय हाने लगा इसलिए, वे फिर शिवजी के प्रति उग्र तपस्या करने लगे भगीरथ के तप से सतुप्ट होकर (शिव ने) अपन जटा-जूट मे बची हुई गगा

कहा-- अब तुम भूलोक में चली जाम

बालकांड

धतव गगा उनके जटा-जूट के दक्षिण भाग से बाहर निकली उस मदाकिनी की धारा में मुकुलित कमल ऐंती शोभा दे रहें थे, मानो वह (मदाकिनी) पाताल की ओर देवकर अपनी दिव्य-दुप्टि से वहाँ के कपिल मुनि को पहचानकर, उनकी महिसा पर आइचय॑े करती हुई हाथ जोडे उनसे प्रार्थना करती हो कि (हे मुनि) आपको जिन भयकर व्यक्तियों ने दुख दिया था, उन्हें सुगति प्रदान करने के लिए में रही हूँ, आप क्रोब करें उस घारा में भँवर ऐसे पड रहे थे, मानो उस मुनि के क्रोव की कल्पना करके मदाकिनी भय से व्याकुल हो रही हो धारा के वीच कमल-पुप्पों के भीग जाने से उनमें बैठे रह सकने के कारण अ्रमर आकाश में व्याप्त हो, इस प्रकार गृजार कर रहे थे, मानो सग्रुपुत्रो के पाप, वेग से आनेवाली मदाकिनी की घारा को देखकर इधर-उधर भागते हुए शिवजी से विनती कर रहे हो कि (हे शिवजी) गया हम पर आक्रमण करने के लिए रही है, हम अब भागकर कहाँ जायें ? हतत आकाभञ्-पथ में ऐसे मेंडरा रहे थे मानो शिव के जटा-जूट से पृथ्वी पर उतरनेवाली गया को घूप से बचाना चाहते हो। उस नदी की सुदर तथा उत्तुग लहरें ऐसी जोभा दे रही थी, मानों वे सगरुपुत्रो के पाप-समूह को मिटानेवाले उस (नदी के) हाथ हो धारा इतने अधिक फेन से व्याप्त थी, मानों भगीरथ की अनुपम क॑त्ति समस्त ससार में व्याप्त होने के लिए एकत्र हो रही हो उस नदी का अतुल घोष क्रमश वढता हुआ सारे ब्रह्म ण्ड तथा आकाश में व्याप्त हो गया इस्त प्रकार ठह जिव के जटा-जूट से विदु-सरोवर में यह कहती हुई उतरी कि में इत्त सत्तार के पापियों को पुण्य प्रदान करने के लिए रही हूँ ब्रह्मा आदि देवता उसकी स्तुति करने लगे सुर तथा खेचर बडे उत्साह से यह दृश्य देखने लगे गरुड तथा गवर्नर उसकी प्रशसा करने लगे

“मदाकिनी की घारा की सात शाखाएँ हुई पावती, ह्लादिनी, और नलिनी नामक तीन शाखाएँ पूरव की ओर गईं सीता, सुचक्षु तथा सिंधु नामक तीन जालाएँ पद्चिचम की की ओर गईं एक शाखा राजा भगीरथ के पीछे भूलोक की ओर चली वह श्रेप्ठ तथा विश्ञाल जल-घारा आकाश-मार्ग में शरत्काल के वादल के समान ज्ोभित हो रहीथी वह जल-धारा, पृथ्वी की तरफ इस प्रकार उतर रही थी, मानों स्व्गकाक्षी भूलोक- निवासियों के लिए सीढी लगी हो उसकी तरगो की ध्वनि पृथ्वी तथा आकाञ्य को गूँजा देती थी उस घारा में ऐसे भेंवर पड रहे थे, मानो वह यह वताना चाहती हो कि में (पृथ्वी) के समस्त पापों को उसी तरह नचा दूँगी (ध्वस कर दूंगी)

“पृथ्वी पर उसके उतरते समय जल की वूंदें आकाश की तरफ ऐसे उछल रही थी, मानो वे नक्षत्रों से मित्रता करना चाहती हो उसका स्वच्छ फेन-समूह ऐसा सुधोभित हो रहा था, मानो वह नदी (वर हर्ष से) हँसती हुई यह कह रही हो कि मे वर्मात्माओं की पवित्र कीत्तियो के लिए योग्य स्थान हूँ उस घारा में क्रीड़ा करनेवाली मछलियाँ ऐसी दीख रही थी, मानो नदी कह रही हो कि में अपने अनसस्य नेत्रो से पृथ्वी की श्रेप्ठता देखूंगी इस प्रकार भिन्न-भिन्न जलचरों से बृवत हो, वह नदी पृथ्वी पर उतर आई

झट रंगना/थ -शयहायण

धतव सौ-सौ सूर्थों की कान्ति के समान प्रकाशित होनेवाले, वहु-रत्न-खचित 'आभूषणों की कान्ति से सारे आकाश को दीप्तिमान्‌ करते हुए, गज तथा विमानों -में आरूढ होकर अमर, गवर्त तथा सिद्ध वडे कौतुक से इस दृश्य को देखने आये उस प्रवाह -की- चचल गति को देखकर महानागो ने भी उसके सामने घुटने टेके ।-देवताओं ने -जप आदि-करके उस सदी में स्तान किया और बहुत ही प्रसन्न. हुए अप्सराओ ने नृत्य किया, देवो तथा मुनियो ने बडे हर से उस नदी की पूजा पुष्पो से की उस पुण्य-्नदी की धारा में अमित पापी तथा श्ाप-पीडित जन स्तान करके स्वर्ग जाने लगे देवता, अप्सराएँ, गबर्वे, दनुज, पन्नग, यक्ष, किन्नर आदि बडे उत्साह से भगीरय के रथ के पीछे-पीछे चले

मतब वह गगा बडे-बडे पर्वतों को भेंदती हुई भगीरथ के पीछे-पीछे जाने लगी उसी मार्ग में जल्लु नामक ऋषि की वज्ञ-भूमि थी | गगा ने अपने अतुल प्रवाह से ' उस आ्राश्नम-मूमि को घेर लिया | यज्ञोपकरण सभी गगा के प्रवाह में वह गये यज्ञ में विष्न त्ड्मा हुआ देख, जहू कऋ्रछ हुए और उद्धत गति से आनेवाली उस गगा का सारा जल गो गये तब देवता तथा मुनियों ने भगीरब से कहा--हें राजनू, यह मुनि क्रोघ ममें आकर गया को पी गये हे आप उनसे अपना क्रोध त्यागनें तथा गगा को 'मुक्त करने की प्रार्थना कीजिए मुनि प्रसनन्‍्त होकर अयपकी प्रार्थना स्वीकार करेंगे ।/ तव भगीरथ बडी भक्ति तथा विनय के साथ हाथ जोडकर उस मुनि से प्रार्थना करने लगे

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है मनिचन्द्र, हें विमलात्मा, में इस श्रेष्ठ गया को घोर तपस्या के उपरास्त पृथ्वी पर ला सका हूँ कितु, यहाँ आने के वाद में उसे खो बैठा हें धन्यचरित, हे सयमीख्ध, आप क्ृपाकर उसे मुक्त कर दें ।” (राजा की बात सुनकर मुनिवर के मन में दया उत्पन्न हुई) वे वोलें--हें भगीरथ, गगानदी को इस प्रकार पृथ्वी पर ले आने में आपकी तपस्या, आपके महत्त्व तथा आपकी कीत्ति का वर्णन में कैसे करूँ ? अब में गगा को मुक्त कर दूंगा इस ससार में आपके यत की व्याप्ति होगी ।'

“इस प्रकार कहकर, गगा को मूह से छोडकर उसे जूठा करने की 'इच्छा से उन्होंने अपने कान के मार्ग से उसे बाहर छोड दिया पूर्व की तरह गगा प्रवाहित होने लगी तभी उसका नाम जाह्नवी पड़ गया

/जिस प्रकार पूर्वकृत पुण्य जीवन के विध्नों को दूर करता हुआ जाता है, उसी प्रकार जाह्ववी राजा के पीछे चली ओर समुद्र में प्रवेश करके रसातल में पहुँच गई वहाँ सगसयुत्रो की भस्म-राशियो को अपने पुण्य-सलिल से सीचा। तब कमलासन ([पत्रह्मा) ने बड़े हर्ँ से भगीरय से कहा--हे राजनू, जवत्तक समुद्र में "जल रहेगा तबतक ये सगर-पुत्र॒दिव्य चदन, वस्त्रामृूषणों से अलकृत 'हो स्वर्ग-लोक में दिव्य भोगो का अनुभव करेंगे हे अनध, आज से यह नदी:भागोरथी, त्रिपयगा तथा जाक्लवी के नामों से “समस्त लोको में विस्यात होगी तुम्हारे पूर्वज सगर, अच्ुमान्‌ तथा दिलीप ने 'जो-सकलप किया था, वे उसे निद्ध नहीं कर सके | तुम बड़े प्रयत्न के उपरान्त गगा को “इस पशथ्वी पर ले आये हो, (अतएव) तुम गगाजल के निर्मल तथा कमनीय पद को प्राप्त करके "चिर कीत्ति- वान्‌ होकर निवास करो काकुत्स्य-वज की प्रतिप्ठा तथा गौरव के आधारबनस्वरूप पुत्रो

बालक $९ को प्राप्त करो तुम सुदर धर्मो' के आधार हो गये अबः तुम इस पुण्य-सलिल में विधिवत्‌ पुण्य-्स्नानन करके उसका फल प्राप्त करो यो कहेकर कमलसभव (त्रह्मा) अपने लोकः को चले गये

“उसके पश्चात्‌ भगीरथ ने गया में स्तानः करके: बडी निष्ठा के साथ साठ” हजार सगर-पुत्रो की तिलोदक-क्रिया की उस पृण्य-क्रिया के फलस्वरूप सगर-पुत्रों ने अमरत्व प्राप्त किया' और भगीरथ को आशीर्वाद देकर स्वर्गलोक सिघारे। पृण्यवान भगीरथ अयोध्या लौटकर सुख से राज्य करने लगे

“पापों का नाश करनेवाला यह उपाख्यान जो कोई भक्ति से पढेगा या सुनेगा, वह अनत पुण्य प्राप्त करता हुआ घन-धान्य तथा यश से समृद्ध हो चिरजीवी होगा। उसपर सभी देवता प्रसन्न 'होगे, उसके सभी कार्य सिद्ध होगे, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी तथा उसके पितरो को सद्गति मिलेगी ।”

इस” प्रकार राघव 'ने गगावतरण की कथा कौशिक से सुनकर उनकी: प्रशसा करते हुए कहा--हे मुनीन्‍्द्र ' में आपसे पृथ्वी पर गगावतरण की कथा बडे आइचर्य के साथ सुन प्रसन्नः हुआ ।'

(उन्होने) वह रात्रि वही बिताई और प्रातकाल ही उस प्रसिद्ध नदी में स्तान करके सध्या: आदि कार्यों से ॉनिवृत्त होकर जाह्नवी नदी को पार किया नदी के उत्तर तट” पर निवास करनेवाले मुनियो की बडी 'भक्ति के साथ पूजा की और उस स्थान को छोडकर आगे चले

थोडी दूर जाने पर उन्हें विशाला' नामक सुदर नगर दिखाई पडा तब राम ने गाधेय को सबोधित करके पूछा--हे मुनि, इस नगर का नाम क्‍या है ? किस वश का राजा यहाँ राज्य करता है आप क्पाकर 'बतलाइए ।'

२८. अमृत-मंथन की- कथा

तब कौशिक ने राघव से कहा--“मंने बहुत पहले यह कथा इन्द्र से सुनी थी प्राचीन काल में दिति के अत्यन्त बलवान तथा पराक्रमी पुत्र तथा अदिति के बडे धमत्मा पुत्र उत्पन्न हुए उन्होने सोचा किः क्षीरसागर को पहले रस तथा औषधियों से भरकर उसका मथन करें और उस जलराशि से उत्पन्न होनेवाली'“श्रेप्ठ तथा कान्तियुक्त वस्तुओ को बडी प्रसन्नता से ग्रहण करें (इस प्रकार सोचकर) वे मदर”पर्वत को मथनी और वासुकी को रस्सी बनाकर मथन करने लगे “उस' समय समुद्र में से समस्त लोको को, मन्‍्मथ-समुद्र में डुबोने- की क्षमता रखनेवाला' सौद्य, क्वणित होनेवाली करधनी से युक्त गुरु नितम्ब, क्षीण कटि, सुन्दर कुच, कोमल अ्रू-लता-रूपी कोदण्डवाले कामदेव को वाणों के समान (तीक्ष्ण) , कटाक्ष; भव्य भुजन्लता-विक्षेप, अमर नव-यौवन तथा कमनीयता से सुशोभित साठ हजार अप्सराएँ तथा' उन सुन्दरियों के योग्य हाव-भावों से युक्त परिचारिकाएं उत्पन्न हुईं उन अप्सरान्युवतियो को देवता «तथा दैत्यो ने क्रश ले लिया उसके पश्चात्‌ भी समुद्र-मथन चलता रहा ।' तव वरुण की पुत्री वारुणी का जन्म हुआ दिति के पुत्रो ने उसका वरण करना स्वीकार नहीं किया इसलिए वे असुर कहलाये अदिति

86 रंगनाथ रायायपय

पत्रों ने उसे स्व्रीकार कर लिया इसलिए, वे सुर के नाम से विस्यात हुए उसके पब्चात उच्चै श्रद्य नामक अच्व, चब्वेत गज (ऐरावत) तथा कौस्तुभ-मणि का जन्म हुआ कौस्तुभ-मणि के बाद अमृत उत्पन्न हुआ असृत के वाद सुवा-कमण्डल को लिये धन्वन्तरि का जन्म हुआ फिर विप उत्पन्न हुआ जब वह (विष) अत्यन्त भयकर अग्नि के समान व्याप्त होने लगा, तव जिव ने उसका पान किया इसके उपरान्त अमृत के लिए मर और असर परस्पर बृद्ध करने लगे उस समय उन सुरासुरो को देखकर सुरो पर कृपा करते हुए, विप्ण एक सून्दरी का रूप घारण कर आये और अमृत का वितरण करने लगे उस समय राहु तथा केतु नामक राक्षस (विप्णु के मन को बात जानकर) सुरो की पक्ति में जाकर चैंठ गये और अमृत के लिए हाव फैलाया उनके शरीर की कान्ति देखे विना ही उस सुन्दरी ने जमृत दे दिया | रवि तथा जश्नि ने वड़ी घवराहट के साथ इसे देखा और सनन्‍्दरी को आँख के सकेत से यह बताया। तब विष्णु ने ऋुद्ध होकर अपना चक्र उन (राक़मों) पर चलाकर उनके सिर काट डाले उन्होंने उन राक्षसो के शिरो को ग्रद्दों के रूप में आाकाच में प्रतिप्ठित क्या अमृत-पान करने से वे मृत्यु को प्राप्त हुए विना रहने लगे उसी दिन से वे (राक्षस ) पुण्य के दिनो में सूर्थ और चन्द्र को पीड़ा पहुँचाते जा रहे

2ि+%

“मुच्दरी ने असुरो की जाँख बचाकर नसुरो को ही अमृत दिया और युद्ध में उनको विजय भी प्रदान की इच्द्र ने सभी देत्यो का नाज् किया और तीनो लोको का अधिपति वनकर राज्य करने लगा

“अपने सभी पुत्रो की मृत्यु से दुखी होकर दिति ने बड़ी दीनता से अपने पति कह्यप से कहा--हे महात्मा, आप मुझे एक ऐसा पुत्र प्रदान कीजिए, जो इच्ध को भी मारने की थक्ति तथा पराक्रम रखता हो उसकी प्रार्थना स्वीकार करके कच्यप ने कहा--हें भरे, यदि ठुम एक हजार साल तक जुद्धात्मा तथा पवित्र रह सकोंगी, तो तुम्हें तीनो लोको को जोततेवाला तथ्य इन्द्र का अन्त करनेवाला पुत्र मुझसे प्राप्त होगा ।! यो कहकर उन्होने अपने कर-कमल से दिति के चरीर का मृदु गति से परिमार्जन कर दिया उसके परचात्‌ वे तप करने चले गये

“उनकी चले जाने के वाद दिति कुशप्लव” (नामक स्थान में) उम्र तपस्या करने हक गई | कक वृत्तान्त जानकर इन्द्र माता दिति के पास शविप्य के रूप में पहुँच गया

वहा भक्ति के साथ उनकी पूजा-अर्चचा करने के लिए आवश्यक कुण फल, कद-मूल, जल वादि बस्नुएँ जुटाने हुए सतत उनकी सेवा-परिचर्या करता रहा दि जब जो वस्तु चाहती, वह उसके सकेत-मात्र से ही वह वस्तु वहाँ प्रस्तुत कर देता था इस प्रकार नौ सौ निन्‍्यानवे वर्ष बीत गये

“एक दिन दिति अपने मन की वात छिपा नहीं सकी उन्होंने इन्द्र से कहा--- है इन्ध, मेने तुम्हारे पिता से एक पुत्र की प्रार्थना की थी एक हजार वर्ष के उपरान्त मुक्त एुक पुत्र होगा, छसा वर उन्होंने मुर्के प्रदान क्या हैं। आज से दस वर्ष के पश्चात तुम्हारे भाई क्ा जन्म होगा | बुम ओऔर वह दोनो तीनो लोको का राज्य करोगे और यद्दस्दी बनोंगे

ढं/तठकोड है 9९

उस दिन मध्याक्ष के समय दिति थकावट के कारण, अपने केश विखेरकर (खाट पर) पायताने की तरफ सिर रखकर सो गईं उन्हें इस प्रकार देखकर इन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ और सोचा कि यही मेरे लिए अच्छा अवसर है उसने अपनी योग-शक्ति से दिति के गर्भ में प्रवेश किया और अपने वज्ायुध से अपने शत्रु-शिशु के खण्ड-खण्ड करने लगा शिशु का रुदत सुनकर दिति जाग पडी तब इन्द्र धीरे-धीरे कहने लगा---मा रुद मा रुद (मत रोओ, मत रोओ) दिति चिल्लाने लगी--शिज्षु का वध मत करो। दिति का क्रदन सुनकर इन्द्र गर्भ से बाहर गया और हाथ जोडकर बडी भक्ति के साथ दिति से कहा--माता, आप मुक्तकेशी होकर पायताने की ओर सिर किये सो रही थी इससे आपकी पवित्रता में भग पड गया इसलिए मेने अपने कार्य की सिद्धि के लिए आपके गर्भ में प्रवेश करने का साहस किया और मेरा नाश करने के लिए उत्पन्न होने- वाले गर्भस्थ शिश््‌ के सात खण्ड कर दिये नन्‍हा शिशु मेरा शत्रु था, इसलिए मेने उसका वध किया हे माता, धर्म का विचार करके आप (मुझे) क्षमा कीजिए ।” इस प्रकार इन्द्र दुख प्रकट करने लगा

“इन्ध को दुखी देखकर दिति ने कहा--हे स्वर्ग के स्वामी, इसमें तुम्हारा कोई दोष नही है सारा दोष मेरा ही है ये सातो खण्ड मरुत नाम से तेजस्वी बनकर उत्पन्न होगे तुम उन्हें इच्छानुसार सारे ससार में विचरण करने देना तुम मेरे इन सातो पुत्रो को सप्त मारतो के गण-तायक बनाना यही तुमसे मेरी विनती हैं

“इन्द्र उनकी प्रार्थना स्वीकार करके इन्द्रलोक को चला गया वे सातो शिशु क्रमश इन्द्र की मित्रता प्राप्त करके मरुदगण तथा देवता बन गये इसी पुण्य-अ्रदेश में देवेन्द्र ने दिति की परिचर्या की थी वही पर इक्ष्वाकु नामक राजा ने अपनी रानी अलवुषा से 'विशाल' नामक पुत्र उत्पन्न किया था उस विद्वाल ने यहाँ विशाला' नामक नगर का निर्माण किया उस विज्याल के हेमचद्र नामक पुत्र हुआ। उसने सुचन्द्र को, सुचच्ध ने धूम्राशव को, धूम्राइव ने सृजय को, सृजय ने कुशाइव को, उसने सोमदत्त को, सोमदत्त ने ककुत्स्य को और ककुत्स्थ ने सुमति को जन्म दिया वह सुमति अभी इस नगर में रहते हुए भत्यन्त धर्म-बुद्ध होकर राज्य कर रहा है हैं अनघ, धर्म तथा वैभवसपन्न ये राजा ससार में वैशालिक' के नाम से विख्यात हे हम यहाँ आज की रात्रि वितायें भौर प्रात काल होते ही राजा को देखने चलेंगे ।”

वहाँ का राजा सुमति विश्वामित्र के आगमन का समाचार जानकर अत्यन्त श्रसन्न हुआ वह अपने पुरोहित तथा बधु-जनों के साथ नगर के बाहर आया ओर विधिवत्‌ सयमीस्ध विद्वामित्र की पूजा करके उनसे हाथ जोड़कर बडी श्रद्धा से कहा-- है मुनीरद्र, में आज इस पृथ्वी पर घन्य हुआ मेरा जन्म सार्थक हुआ

परस्पर कुशल-प्रश्नो के पश्चात्‌ सुमति ने विद्वामित्र को सवोधित करके कहा-- हे मुनिनाथ, आपके साथ रहनेवाले असमान रूपवान्‌, विशालवाहु, दिव्य-पराक्रमी, गज की गतिवाले, सिह-सम शक्तिशाली, ललित तथा प्रफुल्ल अरविद-सम नेत्रवाले, धनुष तथा करवाल- घारी, आकाश जैसे रवि-शहि के सचार से अलकृत होता है, वैसे ही आपके पदल्यास को

क्र एंग्न/थ एम7वणग अलक्ृत करनेवाले, दर्शक्नो को दोनो ही सव प्रकार से समान दीखनेवाले ये कुमार कौन हूँ ? किसके पूत्र हे ? कृपया बताइए ॥'

तव विच्ठमित्र ने उसे देवकर कह्य--हि राजकुल-अन्द्र, हें सदुगुण-सागर, में इसका वृचान्त तुम्हें सुवाता हूँ, तुम सुदो सस्यू नदी के किनारे कोगल-देग में अयोध्या नामक नगर हैं उस नगर में अत्यत्त प्रीति से प्रजा का पालन करनेवाले नाजा द्ान्थ राज्य करते हैँ यह उनका श्रेप्ठ पुत्र राम हैं बह उसका अनुज लक्ष्मण है मेरी प्रार्थना पर राजा ने यन्-स्क्षणार्य इन दोनो को मेरे साथ भेजा है मेरे साथ आाकर (इन दोलतोंने) मेरे बन्च की सका की, बुद्ध में बद्दे पराक्रम के साथ लूवाहु का वव किया और

5 ता

मादीच को परास्त दिया। उसके पच्चात मिथिला जाने के उद्देच्य से गया पार करक यहाँ आब हैं

ये राजचस्ध सर्व-बअ-निलक हूँ उनके सामथ्ये की कथा आच्चर्य में डालनेंवाला हैं विच्वामित्र के वचन सनकर राजा समान आच्चण-चक्ति हुआ उसने उन राज-

कुमारों का आाइर-सत्कार क्णि उन्होंने फ्रेम से राजा का आतिथ्य ग्रहण किया सुवन रात्रि वही ठिताई और प्रभात होने पन राज्य ने उन्‍को वहाँ से छव्लि क्या |

२९. गीतम के आश्रम का वृत्तान्त

(व्ाँ से चलकर) मार्ग में चलसे-चलते राब्व ने गाँतम के आश्रम को देखकर गावि-पुत्र को सोधित करके कहा-- हि मुनीष्बर, ललित पललणो से युवत, आमु, कटहल नारगी, जबीर, नारिकेल, देगदार, विजीरी, नीवू, वेल, सुपारी, केला, अग्ोक, लाख, दाड़िम, तेंदू, सेमल, चंदन, कर्पूर, मीठे आम, शिलावॉ, गुग्युल, आदि पेडो सुोभित, सिंवुवार, पुन्नाग, मौलसिरी, चमेली, छुद, कर्रूर आदि पूण्रों की चुनथि से परिपूर्ण, सर्वत्र व्याप्त लौग तथा एला की लताओ से बुक्त, सरोवरों से सुझोभित, रम्य पक्षिणों के कल-कूजन से सुखरित यह गाश्वरम-मूमि आज निर्जन क्यों हूँ ? इसके एहलें कौन मुनि यहाँ तपस्या करते थे ? कृपया बतलाइए

आीक

तब मुन्ति ने कहा--क्िसी समय गौतम गम मुत्ति अहल्या के साथ इस आश्रम में बत्यन्त निप्ठा से घोर तपस्ण करते थे यह देख इन्द्र ने उनकी तपस्या में बाबा डालनी चाही एक दिन उसने मुर्मे के रूप में पर्णणाला के पास पहुँचकर वाँग दी। मनि (प्रात - काल हो गबा समझकर) जनुप्ठान करने के लिए (नददी-तट पर) चले गये तब इत्ध् गालमस का झूव बारग केसे जाबा और बहल्या को देखकर कहा---अभी रात्रि बहुत वाकी है। हें सुन्दरी, वह तुम्हारा ऋतु-काल हैं इस समब रति-बक्रीड़ा करने की इच्छा से ही में बाग हूँ इस पर (सा्ी दार्ते जानकर) वहत्या ने कहा--'मे जानती हे कि तुम इच्ध हो, बदर चले आाबो यो कहती हुई वह इन्द्र को पर्णगाला में ले गई और उसके साथ रति-जटीया की जब इन्द्र किमक तथा भय से वहाँ से जानें लगा, तभी गौतम मुनि वहाँ पहुँच गये (इन्द्र को देख) उन्होंने भाप दिया--रें पापी, क्या यह तुम्हारे लिए उचित हैँ कि तुम मेरा रूप बारण कर मेरी पत्नी से मिलो | इस पाप-कर्म के लिए तुन अडकोम-रहित हो जाओ गौतम का जाप अप्रतिहत होकर उसे लगा और तुरंत उसके अणग्डकोश भूमि पर गिर गये

बा/लकीड डे

“इसके पव्चात्‌ गौतम ने अहल्या को देखकर कहा--हे नारी, तुम पापाण होकर इस भूमि पर पड जाओ और प्रचण्ड धृप में लोटनी रहो ।' तब अहल्या ने उनसे पूछा-- है देव, आपके जश्ञाप का अत केसे होगा ?” तब गौतम ने कहा--वैकुठवासी, अवाप्त- कामी, लोक-रक्षक और पुराण-पुरुष (विष्णु) राम के रूप में जन्म लेंगे कौणिक के यज्ञ की रक्षा करने के वाद वे सूर्यवशतिलक इसी मार्ग से आयेंगे। यदि उनके चरणों का स्पर्श तुमसे होगा तो तुम झ्ाप-मुक्त हो जाओगी ।” यो कहकर वें जीताद्वि के लिए चल पडे वही मूनि-पत्नी यहाँ पाषाण के रूप में पडी हुई है

“जब सुरराज (इन्द्र) ने अपनी दुर्गति का समाचार देवताओं से कहा, तब उन्होनें मेष (भेड) का अडकोश लाकर इन्द्र के ऋरीर में जोड दिया इसी कारण से पुण्यवान्‌ लोग यज के समय मेषों का करते हे

“इस प्रकार मूनि के शाप से पीडित अहल्या इसी तपोवन में पडी हुई है हे राम, हें पृष्यधाम, तुम उस अहल्या का दुख-मोचन करो ।”

यो कहकर विश्वामित्र (राम-लक्ष्मण के साथ) गौतम के आश्रम में आये श्रीराम का चरण छूते ही, बादलो के हटने पर प्रकाणित होनेवाले चन्द्र के समान, धुआँ से मुक्त होने पर हवन-कुड की अग्नि-ज्वाला के समान, कलक-रहित कमलिनी के समान, मलिनता से रहित स्वर्ण के समान, राम के चरण-कमलो के रज का स्पर्श होते ही पाप-मृकत होकर उस स्त्री (अहल्या) ने जिला का रूप तजकर निज रूप प्राप्त कर लिया वह पहले ही अपने पत्ति से राम की महत्ता के विषय में सुन चुकी थी, इसलिए उस गजगामिनी ने उस महापुरुष का आतिथ्य किया और कहा--आपके शुभागमन से में इतार्थ हो गई आपके चरण-कमलो ने मेरा उद्धार कर दिया हें त्रिलोकीनाथ हे रघुनाथ ! आपका चरणोदक ही आकाश-गगा के रूप में धरती के समस्त पापों को दूर करने (पृथ्वी पर) आया है आपने अपने एक चरण से पृथ्वी को और दूसरे चरण से आकाश को नाप- कर बलि को दवाया था, सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर वेदों के शिरोभाग में विचरण करनेवाले आपके चरण यदि मुझे शाप-मुक्त कर दें, तो इसमें आश्चर्य ही क्‍या है ?' इस प्रकार अहल्या ने राम की स्तुति की इतने में गौतम मुनि भी वहाँ पहुँचे उन्होने रघु रामचन्द्र की पूजा की और पूर्व-जन्म की सुकृति-रूपी अहल्या को स्वीकार करके पूर्वंवतू उसी आश्रम में रहने लगे तब कुभ-वृष्टि (घोर वृष्टि) हुई और देव लोग दृदुभियाँ बजाने लगे

३०. मिथिला में आगमन वे पृण्यचरित वहाँ से चलकर जनक की राजधानी मिथिला नगर मेँ पहुँचे, जो गगनचुवी प्राकारो, सौध-समूहो, रत्न-खचित गृहो, रमणीय राजमार्गो, दुर्गों, मनोहर उद्यानो, सुन्दर वनस्पतियों तथा समस्त शुभो से परिपूर्ण था जनक की यज्ञ-भूमि में कलिंग, नैपाल, कर्णाटक, लाट, मालव, सोबीर, मगघ, पाचाल, कुरु, पाण्ड्य, वर्बल, कुतल, अवती, मरु, तरुप्क, आभीर आदि देशों के राजा विराज़मान थे वह यज्ञ-भूमि, यज्ञोपक्रणो तथा उसके अनुरूप पशुओं, यूपकाप्झठ, दवि-क्षीर से

2050 रंग्नाथ एयायण

भरे पूर्ण कुभो, समिधाओ से भरे सुदर स्थलो, पक्तियों में सजे हुए दर्भासनो, उचित आसनो पर विराजमान तपोनिधि मुनियों, अत्यन्त रमणीय रत्त-पल्लव तोरणो, सामादि वेदों के घोषो, सतत यज्ञ के दर्णनार्थ आनेवाले तपस्वियो, आकाण तक व्याप्त होनेवाला हवन का धुआँ, देवताओं का आह्वान करनेवाली घ्वनियों, पूजाओ को ग्रहण करनेवाले पुण्य सयमी (मुनियो) तथा पूजाओं को प्राप्त करने में थकनेवाले ब्राह्मणों से परिपूर्ण था

(गाधि-पुत्र को आया जानकर) जनक महाराज बड़े उत्साह से उनके सम्मुख गये, मुनिनाथ को दडवत्‌-प्रणाम किया और उन्हें ले जाकर उनकी उचित पूजा की और कुशल- प्रश्न पूछे उसके पच्चात्‌ वें उस मुनीन्द्र की प्रशसा करते हुए कहने लगें---आपके आगमन से में परम पवित्र हुआ मेरा यज्ञ समृद्ध हुआ इस प्रकार कहने के उपरान्त उस मुनीन्द्र के पीछे सुभोभित विज्ञाल वक्षवाले, काकपक्षघधारी, महाघनुर्धर, कोमल शरीरवाले, सुभग, यणस्वी, भूसि पर अवतार लिये हुए देवताओं के समान दीखनेवालें दयालु, सतत प्रसन्नवददनवाले, भुवतत-पावन चरित्रवालें, सूर्य तथा चन्द्र की-सी कान्ति से विलसित, आजानु- बाहु, अच्विनीकुमारों के समान दीखनेवाले, अतुल पराक्रमी और कमल-लोचनवाले, राम तथा लक्ष्मण को देखकर जनक ने विदश्वामित्र से पूछा--हें महात्मा, ये, धरनुर्वाणधारी तथा चतुर वालक किनके पुत्र हे ? ये नव-पल्‍लव के सदृच् अरुण तथा कोमल चरण-कमल यहाँ तक कैसे पैदल आये ?!

तव विब्वामित्र ने कहा--हें राजन्‌ ये अनघ महाराज दशरथ के पुत्र हे इन्होने अपनी अमित जक्ति से मेरे यज्ञ की रक्षा की कृपा करके अहल्या का उद्धार किया और आपके घर में रखे हुए जिव-वनु को देखने यहाँ आये हैं / मुनीण्वर की इन बातो से प्रसन्न होकर जनक ने उन (राजकुमारो) का स्वागत-सत्कार किया

फिर गौतम मुनि के जिष्य शतानन्द ने कौशिक को सबोधित करके कहा-- है महात्मा राघव को अपने साथ ले आकर आपने हम पर बडी कृपा की है। इस विदश्वप्रभु को यहाँ तक ले बाने का कार्य किसके लिए सभव था ? राघव के चरण-रज ने मेरी माता अहल्या के पापों का शमन कर दिया गौतम मुनि के ज्ञाप से मुक्ति प्राप्त कर मेरी माता फिर मुनि से मिल गई हे रामचद्र के चरण की महिमा का वर्णन मे किन शब्दों में करें ?!

३१. विश्वामित्र की शक्ति का परिचय

इसके पश्चात्‌ शतानद ने राम की ओर देख कर कहा--“हे रामचद्र, सुनते हे कि यह पुण्यात्मा कौशिक, इस पृथ्वी पर, आपके अभिभावक हे अब आपको किस वात की कमी है ? विश्वामित्र की असमान क्षमता का वर्णन करना कठिन है फिर भी आप सुनें हे दण्नस्थात्मज, कुश नामक मुनि ब्रह्मा के पुत्र थे, कुश ने कुशनाभ को जन्म दिया गावि उस कुशनाभ के पुत्र थे। ऐसे पवित्र गाधि के ये (विद्वामित्र) पुत्र हे | ये घर्म- निरत होकर, अमित पराक्रम के साथ पृथ्वी का शासन करते थे एक दिन विनोदार्य मृगया खेलने के लिए अपनी विद्याल सेना के साथ निकले बहुत समय तक वन में मृगया खेलने के पचश्चात्‌ बहुत ही थकके-माँदे होकर वे वसिष्ठ के आश्रम में पहुँचे वसिष्ठ का

ब/लकोड

आश्रम नाना प्रकार की सुगधित पृष्प-मजरियों से तथा विविध प्रकार के फलो से लदे वृक्षों से भरा था पक्षियों का कलर तथा वेद-धबोषो से सारा आश्रम गूंज रहा था उसमें कई सरोवर तथा यज्ञ की वेदियाँ थी भिन्न-भिन्न जाति के मृग अपने स्वभाव-सुलभ वैर को भूलकर वहाँ विचरण कर रहे थे उनका आश्रम वायु, जल तथा (वृक्षों से गिरे) पाडु-पत्रो पर जीवन व्यतीत करते हुए तप करनेवाले मुनियो, योगियो, पुगवों, पन्नगो, खेचरो, सिद्धो, सुपर्वों तथा किन्नरों से युक्त होकर ब्रह्मतोक के समान सुशोभित था विश्वामित्र ने बडी प्रसन्नता तथा भक्ति से वसिष्ठ को प्रणाम किया उन्होने आश्नीर्वाद दिये ओर उचित आसन पर बिठाकर उनका सत्कार किया और सुस्वादु फल, मूल आदि प्रस्तुत किये

“विश्वामित्र ने उन सबको ग्रहण करते हुए हाथ जोडकर बडी भक्ति के साथ पूछा-- है अनघात्मा ! लोकहितार्थ चलनेवाले आपके तप तथा हवन आदि अच्छी तरह हो रहे हे ? आप, आपके शिष्य और आश्रम के सभी व्यक्ति प्रसन्न तो है ?!

“तब वसिष्ठ ने कहा--हम सब प्रसन्न हे आप नीतिग्युक्त हो राज्य कर रहे है ? स्‍्तेह के साथ अपने भृत्यो का पालन करते है ? राज्य के सभी अगो का ( उचित रीति से ) पर्यवेक्षण कर रहे है ? आक्रमण करनेवाले शत्रुओं को आप पराजित कर तो रहे है ? आप स्वय सकुशल तो है ? आपके पुत्र और पत्लियाँ कुशल से हे ?'

“तब कौशिक ने वसिष्ठ से कहा--महात्मा, आपकी कृपा से हम सब कुशल-मगल से है ।! तब वसिष्ठ ने कहा--राजन्‌ में आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप मेरे यहाँ भोजन करके यहाँ से जाये ।”

“कौशिक ने उनका निमत्रण स्वीकार किया वसिष्ठ ने विद्वामित्र तथा उनकी सेना को भोजन देने के उदृह्य से अपनी काम-बेनु का स्मरण करके उससे प्रार्थना की कि राजा तथा उनकी सेना को विविध मिष्ठान्न तथा भोजन से तृप्त करना हैँ | इसके लिए आवश्यक वस्तुओ का तुम प्रवध करो

#तब कामधेनु विभिन्न प्रकार के भात, शाक, मिष्टान्न, अचार, विविध फल, खीर, मक्खन, चीनी, ताजा घी, कई प्रकार के मद्य और मास आदि से युक्त बढिया भोजन का प्रबथ किया जिसकी जो इच्छा होती, वह उसे विना माँगे ही मिल जाता था गाधेय तथा उनके सैनिक भर-पेट भोजन करके सतुष्ट हुए

“इसके पश्चात्‌ गा७थि-पुत्र ने मन में सोचा कि इस कामधेनु को किसी भी तरह मुनि से ले लेना चाहिए वे मृनि के पास जाकर वोले--हें मुनिवर, में आपको एक लाख अश्व, एक लाख हाथी, एक लाख गायें जऔर कई हजार मणियाँ दूँगा आप यह गाय मुझे दे दें ।” इस पर मुनि अत्यन्त दुखी होकर बोले--हे राजनू, यह गाय मेरा जीवन है, मेरा प्राण है, मेरी तपस्या का साधन है हव्य-कव्य तथा अतिथि-सत्कार इसी गाय के कारण विना विघ्न के सपन्न होते हे अत इस पृण्य-घेनु को में तुम्हें दे नही सकता ॥'

कष्ट रंगना/थ ए्यायणग

“तब महावली विव्वामित्र क्रोव में आकर बोले---में आपसे यह गाय देने की प्रार्थना क्यो करो ?” यह कहकर उन्होने अपने हजारो सेवकों की सहायता से वलातू उस गाय को पकडकर ले जाने का प्रयत्न किया | तव उस गाय ने उनके पीछे जाकर मुनियुगव को देखकर कहा--हें अनघ, वसिष्ठ, हे सयमीन्द्र | कोशिक (अपने वल के) मद में मुझे बलात्‌ ले जाने का यत्न कर रहा है | हाय! आप दुर्वार होते हुए भी उसे रोकते क्‍यों तहीं ? निर्विरोध मुझे उसके हाथों में सौपना, क्या आपको उचित जचता हैं ? हें अनघात्मा ! मेने आपके प्रति कोई अपराध नहीं किया हैं, फिर भी मेरी उपेक्षा करना क्या आपके लिए उचित हैँ ?!

“घेनु की वातें सुनकर वसिष्ठ दयाद्रचित्त होकर कहने लगे--'मे तुम्हें क्यो छोडने लगा ? राजा अपने भुज-बल से बलात्‌ तुम्हें ले जा रहे है यदि क्षत्रिय उद्ृण्ड हो जायें, तो ब्राह्मण उनका निवारण किस प्रकार कर सकते हैँ ? यह गाघधि-पुत्र इस पृथ्वी .के अवीज्वर हैँ इनके पास अक्षौहिणी सेना है में इन्हें कैसे जीत सकूगा ?'

तब थेनु ने मुनि से कहा--हें मुनिनाथ ! ससार में ब्राह्मण-तेज, क्षत्रिय के तेज से अधिक बलवान्‌ होता है, इसलिए में यह वात जानती हूँ कि कौशिक किसी भी दशा में आपसे अधिक श्रेप्ठ नहीं हों सकता आप मुझे आज्ञा दीजिए, में इसकी सारी सेना को एक ओर से नणप्ट कर दूँगी ।” तब वसिप्ठ ने गाय से कहा--अच्छा, तो तुम सेना उत्पन्न करके (राजा की सेना का) नाश करों

“वभिष्ठ की आज्ञा मिलते ही घेरु ने हुकार भरी उसके हुकार भरते ही उसके कान, पूँछ, ढाँत, रोम, खुर, जाँधघ, आँख, घुटने, इवास, गलकवल, और रोम-कूपो से भयकर आकारवाले असरूय किरात, पल्‍लव, काम्मोज तथा यवन वीर उत्पन्न हुए। वे प्रचण्ड विक्रमी, अदभुत आकार तथा विचित्र आयुध घारण किये हुए थे उनके नेत्र और हुकार अनोखे ढंग के थे योद्धाओ का वह समृह हाथी तथा अच्चबो पर (आरूढ होकर) विद्वामित्र की सेना का सहार करने लगा यह देखकर विद्वामित्र के पुत्र विविध आयुवों से सुसज्जित होकर वसिप्ठ का करने जाये किन्तु घेनु के हुकार-मात्र से भस्म हो गये

“अतुल पराक्रमी वीरो से पूर्ण अपनी सेना को मृत्यु का ग्रास बनते देखकर तथा अपने सो वीर पुत्रो की मृत्यु का विचार करके विश्वामित्र दुःख तथा शोक से सतप्त हो उठे वें अपने एक पुत्र को अपना राज्य सौपकर तप करने के लिए हिमालब में चले गग्मे

वहाँ उन्‍होंने जल में खडे रहकर त्रिपुरातककत (शिव ) के प्रति घोर तपस्या की शिवजी प्रत्यक्ष हुए और विष्वामित्र ने उनसे विविध दिव्यास्त्र प्राप्त किये

/इसके पबच्चात्‌ विव्वामित्र बडी ज्ीक्रता से वसिष्ठाश्रम के पास आये और (उस बआश्चम पर) जार्नेय वाण चलाने लगे उनके वाणों के तेज से वसिप्ठ के आश्रम में क्षरिन की ज्वालाएँ फंल गई यह देखकर वसिप्ठ, काल-दड लिये हुए यमराज के समान क्रोघोन्नत्त हो अपने हाथ में अथारी लिये हुए बाहर आये और वोले--ह पापी, हें विश्वा-

रर्‌

मित्र, क्या इस प्रकार कही पुण्य-भूसि तपोवन को जलाया जाता हैं ? तुम्हारी भक्ति कितनी हैं, बोर मेरी भक्ति कितनी ? (क्या इसका भी तुम्हें ज्ञान हैं ?)'

]

ढएलकोडं कं

#तब अत्यधिक क्रोध से उन्मत्त होकर कौशिक ने उनपर, रौद्रास्त्र, पशुपतास्त्र, गवित- मान्‌, वज्, ब्रह्मपाश, पैगाचास्त्र, काल-पाश, विष्णु-चक्र, कालचक्र, वास्णास्त्र, गावर्वास्त्र, वायव्यास्त्र आदि कई शक्तिशाली अस्त्रों को चलाया किन्तु वसिष्ठ ने अपने ब्रह्मदद की सहायता से उन सबको व्यर्थ कर दिया इन शस्त्रो से केवल अग्निकण विखर जाते ये इससे और भी कुद्ध होकर विश्वामित्र ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके उसे वसिपष्ठ पर चलाया। (यह देखकर) सब देवता, सयमी, गषव, पद्नग, भूत, दिक्‍्पाल, सभी नक्षत्र, ग्रह, सूर्य, चन्द्र और समस्त लोक क्षुब्ध हो उठे सभी दिशाएँ प्रज्वलित होने लगी सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर प्रचण्ड वेग से ब्रह्म-दण्डकी शक्ति का अतिक्रमण करके उस ब्रह्मास्त्र को अपनी ओर आते देखकर ब्रह्मादि देवताओं के लिए भी दुर्वार उस अस्त्र को वसिप्ठ ने सहज ही पकडकर निगल लिया वसिष्ठ की मूत्ति प्रभापुज ब्रह्म-तेज से दीप्त हो उठी उनके रोम-रोम से अनेक बाण, ज्वाला उगलते हुए, निकले और विश्वामिन्न को जलाने लगे। यह देखकर कौशिक अधीर हो उठ, उनकी सारी शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई वे सोचने लगे कि इस एक ब्रह्मदण्ड के कारण मरे सभी श्रेष्ठ अस्त्र-समूह व्यर्थ हो गये इनका ( वसिष्ठ का ) बक्रह्म-तेज अत्रस्त तथा अचल है। क्षत्रिय-तज ( इसके आगे ) किस काम का ?

“इस प्रकार परास्त होने के पण्चात्‌ विश्वामित्र अपनी धर्मपत्नी के साथ (दक्षिण की ओर जाकर) घोर तप करने लगे इसी समय उन्होने दुष्यद, मधुष्यद, दूढनेत्र तथा महारथ नामक चार शक्तिशाली पुत्र प्राप्त किये अविचल निष्ठा के साथ कई वर्षों तक तपस्या करने के उपरान्त ब्रह्मा ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया और बोले-- है अनघ, में तुम्हारे तप से सतुप्ट हुआ जाओ, में तुम्हे राजर्षि का पद देता हूँ ।'

“गाधेय अत्यन्त विनम्‌ होकर वबोले--इतने दिनो तक घोर तपस्या करने के वाद भी मे ब्रह्मषिं नही बन सका मेरा उग तप विफल हो गया है में राजर्षि का पद नहीं चाहता यह कहकर वे पुन घोर तपस्या में निरत हो गये

“इसी समय इधद्ध्वाकु-बश के त्रिशकु नामक यहास्वी राजा ने सबरीर स्वर्ग जाने के लिए यज्ञ करना चाहा | उसने बडी भक्ति से वसिष्ठ को बुलावा भेजा और अत्यन्त विनय से उनसे कहा--हे अनघ, सशरीर स्वर्ग में जाने के निमित्त आप मुझसे एक यज्ञ कराने की कृपा कीजिए आप (इसके लिए) मुनियों को यहाँ बुला भेजिए ।/ तब वसिष्ठ ते कहा--हे राजन्‌, पृथ्वी के निवासियों का सभरीर स्वर्ग में जाना असभव हूँ ।'

“इसके पदचात्‌ राजा दक्षिण दिगा में घोर निष्ठा से तपदचर्या में लीन वसिप्ठ के पुत्र के पास गया और प्रणाम करके कहा--महात्मा, सथभरीर स्वर्ग में पहुँचने के निमित्त आप मुभसे एक यज्ञ कराइए तव उन्होने कहा--अगर वसिष्ठजी इस प्रकार का सज्ञ कराने का आदेश दें, तो में अवश्य ऐसा यज्ञ कराऊँगा ।' तव राजा ने कहा--हें मुनि, वसिष्ठ मुनि ने तो कहा है कि ऐसा यज्ञ कोई राजा कर ही नहीं सकता इसीलिए तो में आपकी शरण में आया हैं आप मुझण्र कृपा करके मुझसे ऐसा यज्ञ कराइए पुरोहित ही तो राजाओं के लिए घधर्म-साधक होते है ॥'

क्ष्षे रंगनाथ एयायण

“दूसपर वसिष्ठ के पुत्र ने कहा--राजन्‌, तुम्हारें-जैसे दुमंतियों के अतिरिक्त दूसरां कोई निर्मल चित्तवाला व्यक्ति ऐसे यज्ञ की वात सोच भी सकता हैं ? मुनि-पुत्र के यह कहने पर राजा ने उपेक्षा से कहा--आपके पिता ने यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया है,

जे

और आप भी अस्वीकार करते हैँ मेरे हित की चिता करनेवालो से अब मेरा क्‍या सबंध ? में किसी और से यह यज्ञ कराऊंगा ।'

“तब रुप्ट होकर उस पुण्यात्मा ने कहा--तुम चाडाल हो जाओ तुरत राजा का रूप ऐसा विकृत हो गया, मानो उसका दीप्तिमान्‌ तेज वासिष्ठ की क्रोधारिति से भस्म हो गया हो उसका शरीर काला हो गया उसके शरीर पर के वस्त्र काले हो गये उसके केश विखर गये उसका रूप इतना मलिन हो गया, मानों उसके स्पर्श-मात्र से दूसरा भी मलिन हो जायगा उसके शरीर पर रहनेवाले कान्तिमान्‌ मणिमय स्वर्णामरण लोहवत हो गये उसके रूप, रग, वाणी आदि चाडाल-जाति के अनुरूप हो ग्रये

“इस प्रकार राजा को भयकर चाडाल-रूप धारण क्ये हुए देखकर नागरिक, सेवक, अमात्य तथा वबु-वर्ग ने उसे त्याग दिया तब राजा अत्यन्त भयभीत होकर लोगो (के मार्य) से वचता हुआ अपने-आपको छिपाता हुआ धीरे-धीरे महातेजस्वी विद्वामित्र मृनि के पास जा पहुँचा उसे देखकर गाघि-पुत्र का हृदय दया से उम्ड आया | वे बौले--अयोध्या का शासन करनेवालें, तुम्हें यह चाण्डालत्व कैसे प्राप्त हुआ ?'

धतव राजा ने हाथ जोडकर कहा--हें महात्मा, मेने वसिष्ठ से सशरीर स्वर्ग- गमन का यज्ञ कराने की प्रार्थना की थी, तो उन्होनें अस्वीकार कर दिया। उनके पुत्र ने कहा कि जब वसिष्ठ की ऐसी सम्मति हैं, तब यज्ञ हो नहीं सकता इसपर मेने दूसरों से यज्ञ सपन्न करवा लेने का विचार प्रकट किया, तो अत्यन्त कुद्ध होकर उन्होने मुझे चाण्डाल बन जाने का शाप दिया इसी कारण मुझे यह रूप मिला है मेने जो यज्ञ करने का सकलप किया है, उसे अवश्य पूरा करूँगा विपत्ति में भी में असत्य नहीं बोलता भविष्य में भी किसी भी प्रकार से में सत्य का पालन करूँगा मेने अबतक कितने ही

बिक

यज्ञ किये, कितने ही धर्म-सवधी कार्य किये और सुख-समृद्धि प्राप्त की मेने गृरुओ से प्रार्थवा की, परन्तु उनकी कृपा रहने से यह धर्म-कार्य पूर्ण नही हो सका दैव-बल के अभाव में पुरुषार्थ में भी दोष जाता हैं| हे अनघ, आप मेरे लिए ईइ्वर-तुल्य हे

किसी भी प्रकार आप मेरी रक्षा कीजिए

#तव विश्वामित्र ने उसे देखकर कहा--हें राजनू, अब तुम दुःख मत करो तुम्हें दीन जानकर में त्रिकरण शुद्धि (पविन्न मन, वचन एवं शरीर) से तुम्हें शरण दे रहा हे में मूनियो को बुलाकर तुमसे यज्ञ कराऊंगा और तुम्हें सशरीर स्वर्ग भेजूगा, जिससे तुम्हारी प्रतिज्ञा कूठी हो मे तुम्हें पवित्र बनाऊंगा ।” इस प्रकार कहकर उन्होने अपने शिष्यो से कहा--तुम लोग तुरत जाओ और बिशकु के यज्ञ के लिए ऋत्विजों तथा मुनियो को लेकर झोप्न आमो

सभी शिप्य तुरत गये और श्रेप्ठ मुनियो को साथ लिये हुए विब्वामित्र के पास आकर बोले--हे अनघात्मा, हम सभी मुनियों को बडी प्रसन्नता से ले आये हैं। वरिष्ठ के

बालकाड 96

आश्रम के मुन्रियो के अतिरिक्त शेष सभी मुनि गये हे वस्तिष्ठ के पुत्रो ने जो जो अपशब्द कहे, उन्हें सुन लीजिए। उन्होंने कहा--यह कितने आश्चर्य की वात है कि यज्ञ करानेवाला एक राजा हैं और यज्ञकर्त्ता एक चाडाल! भला चाडाल के यज्ञ में भाग लेने- वाले मुनि किस प्रकार वहाँ भोजन करेंगे ? देवता अपने ह॒विर्भाग लेने किस मूँह से आयेंगे ? विश्वामित्र की शरण प्राप्त करने-मात्र से कही नर स्वर्ग-लोक प्राप्त कर सकेगा ?*

“इन बातो को सुनकर विश्वामित्र क्रोध से जल उठे बोलें--अत्यत निष्ठा के साथ तपस्या करनेवाले मुझे, अपशब्द कहनेवाले सभी पापी ससार में सात सौ वर्ष तक राक्षस- भाव धारण किये हुए, मानव तथा कुत्तो का मास खाते हुए, नीच होकर रहेंगे दर्प से मेरी निंदा करनेवाला वह महात्मा पृथ्वी पर निषाद होकर जन्म लेगा ।” इस प्रकार, शाप देकर सयमी मुनियों को देखकर उन्होने कहा--हे मुनियो, ये राजा त्रिशकु उच्चकुलीन, कीत्तिमानू, धर्मत्न तथा सत्यनिष्ठ हे इसलिए इनसे आप यज्ञ कराइए, जिससे ये शरीर के साथ इंद्रपुरी को जा सकें ।'

“ऋषि के वचन सुनकर वे सभी मुनि परस्पर यो विचार करने लगें--यदि हम गाधि-पुत्र के वचनो को टाल दें, तो वे क्रोध में आकर हमें घोर शाप देंगे अत उनके कहे अनुसार हम राजा से यज्ञ करायेंगे यो सोचकर सभी मुनि यज्ञ-कर्म में लग गये विद्वामित्र ऋत्विक बने और मत्रो के उचारण के साथ उन्होने यज्ञ-भाग लेने के लिए देवताओ का आह्वान किया देवताओ ने उच्च स्वर में कहा कि हम नही आयेंगे

“तब क्रोधाग्नि से भभकते हुए, कुश की पवित्री हाथ में लिये हुए, खुबवा उठाकर कौशिक में कहा--हे त्रिशकु यदि मेने बाल्यावस्था से नियमों का पालन करते हुए तप किया हो, तो तुम सशरीर स्वर्गलोक में पहुँच जाओगे अब तुम जाओ ।/

रे

“इसपर त्रिशकु स्वर्ग में पहुँच गया किन्तु (वहाँ जाने पर) इन्द्र ने कहा--वुम चाण्डाल हो, हम तुम्हें यहाँ रहने नही देंगे और उसने त्रिशक्‌ को स्वर्ग से नीचे ढकेल दिया

“त्रिशकु सिर के वल नीचे की ओर गिरते हुए चिल्लाने लगा--हें विद्वामित्र, मेरी रक्षा कीजिए, मेरी रक्षा कीजिए तब विद्वामित्र का हृदय दया से भर गया उन्होने कहा--हे राजन, तुम आकाश में ही ठहर जाओ यो कहकर उन्होने चिशकु को आकाश में हो ठहरा दिया और बडे क्रोव में आकर इन्द्र से प्रतिरोध लेने के उद्देश्य से उन्होंने दक्षिण दिशा में अपर स्वर्ग का निर्माण किया उसमें उन्होने (नये) सप्त ऋषियो तथा नक्षत्रों का सर्जन किया | इतना ही नहीं, वे उस स्वर्ग में दूसरे देवताओं तथा अपर इद्र को भी उत्पन्न करने का सकलप मन-ही-मन करने लगे

“यह समाचार मिलते ही सभी मुनि तथा देवता विश्वामित्र के पास आकर बोले-- हे मुनिनाथ, यह त्रिशकु ग्रुर्ठ के शाप से पीडित है। यह स्वर्ग में रहने योग्य नहीं हैँ ।' इस पर विश्वामित्र ने कहा--हे देवताओं मेने त्रिशकु को सशरीर स्वर्ग भेजने का वचन दिया है मेरा वचन व्यर्थ नही होना चाहिए। इसलिए इस राजा को इसी स्वर्ग में रहने दो जबतक यह ससार रहेगा, ये नक्षत्र, देवलोक से भी ऊपर आसमान में तेज से प्रकाश-

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6० रंगनाथ एयायफे

मान रहेंगे उन नक्षत्रों के वीच त्रिचकु को इसी दशा में (सिर नीचा किये) देवताओं के समान रहने ढो और पुण्वात्मा तथा बणस्वी बनने दो इस व्यवस्था को स्वीकार कर मुनि तथा देवता विच्वामित्र की प्रजसा करते हुए अपने-अपने स्थान को लौट गये

ध्तत्॒विब्वामित्र ने (अपने आश्रम के) मुनियो को देखकर कहा--यह स्थान अब तपस्या के लिए उपयुक्त नहीं हैं यहाँ जब लोगों की भीड एकत्र होने लगी हैं अत हम यहाँ से किसी दूसरे स्थान में चले जायेंगे यो कहकर वे उस स्थान को छोड़कर (पश्चिम दिशा में) वि्याला के निकट पुष्कर-नतीर्थ में जा पहुँचे वहाँ केवल जल और फल का ही आहार करते हुए वहुत वर्ष तक वे तपस्या करते रहे

“उस समव अयोध्या के राजा, मन्‍्मथ के समान रूपवान्‌ अवरीष ने एक बचन्न करने का निश्चय किया उस यज्नाव्व को इन्ध ने चुरा लिया राजा ने यज्ञाव्व को कई स्थानों में ढूंढा, किन्तु अच्ब के मिलने से उसके प्रायदिचित्त-स्वरूप व्धि पूरी करने के निमित्त नस्पौत्नु की माँग करते हुए वह कई जआश्रमों में गया निदान भूयृतुग में अत्यत तपोनिप्ठा में सलग्त रुच नामक मूनि के पास पहुँचकर राजा ने मुनि को प्रणाम करके कहा--हे करुणानिधि, मेने यज्ञ करने का यत्न किया था, किन्तु यजाब्व कही खो गया हूँ आप कूंपया अपने एक पुत्र को यज्न-पञ्ु के रूप में मुझे दें उसके बदले में एक लाख गायें में आपको दूंगा ।” तब मुनि ने कहा--में अपने जेप्ठ पुत्र से अत्यधिक स्नेह रखता हूं इसलिए में उसको नहीं दे सकता तब मुनिपत्नी ने कहा--नें कनिप्ठ को बहुत चाहती हूँ म॑ उसे दे नहीं सकती उन दोनो की वार्ते सुनकर च्ुनजषेप ने राजा से कहा--ज्थेप्ठ पुत्र को मेरें पिता चाहते हे और कनिप्ठ पुत्र को मेरी माता चाहती हैं अत- उनकी वात छोड दीजिए, में आप के साथ चलूँगा इसके लिए जाप मेरे माता- पिता को सहत्त गावें दीजिए ।” राजा ने वैसा ही किया और चुन जेप को रथ पर बिठा- कर जीघ्र वहाँ से चल दिया

“इस प्रकार राजा घुन जेप को साथ लेकर पुप्कर-प्रदेश में स्थित आश्रम में पहुँचा वहाँ अमित तपरोनिष्ठा में लीन, अचल रीति से तपस्या करनेवाले अपने मामा विच्वामित्र को देखकर शुनशेप ने उनको प्रणाम किया और कहा--हें जनघ, मेरे माता-पिता ने मुझे इस राजा को बन्न-पक्षु के रूप में वेच दिया है आप कृपया इस राजा के यज्ञ को सफल वनाकर में प्राणों की रक्षा कीजिए। आज आप ही मेरे माता, पिता, गुरु और ववबु हे ।!

“इस प्रकार अत्वत दीन होकर जब जुनज्षेप ने कहा, तव विव्वामित्र ने अपने पुत्रो को सवोधित करके कहा--प्रुण्वात्मा लोग परलोक में सुगति प्राप्त करने के लिए ही पुत्र उत्पन्न करते हें इस बालक ने मेरी चरण ली हैँ, इसलिए इसकी प्राण-रक्षा करना ही अब मेरे लिए स्वर्ग हैं। यह मेरा भानजा है तुम लोग इसकी रक्षा करो और तुममें से कोई सके लिए अपने प्राण दो ॥'

“मुनियुत्रों में से कोई नी उनका आदेश पालन करने के लिए सन्नद्ध नहीं हुआ, तब अत्यत क्रुद्ध होकर मुनि ने उन्हें ज्ञाप दिया--तुम एक हजार वर्ष तक कुत्ते का मास खाते हुए दुःख भोगों ।॥'

बालकोंड

“इसके पद्चात्‌ विश्वामित्र ने उस शुनशेप को बडे प्रेम से अपने पास बुलाकर कहा--मे तुम्हें दो मत्र देता हैँ | तुम सतत उनका जप करते रहो वे (मत्र) तुम्हारी रक्षा करेंगे और अवरीष का यज्ञ भी सफल हो जायगा यो कहते हुए उन्होने उसे दो मत्रो का उपदेश किया

“दूसरे दिन राजा अपनी यज्ञ-भूमि में पहुँच गया। उसने उस निर्मल आत्मा (शुत - शेप) की पूजा आदि करके उसे यूपकाप्ठ से बाँध दिया तव वंह मुनि-पुत्र अत्यत शात तथा निशवचल चित्त से उन मत्रो का जप करने लगा तब देवेन्द्र नें वहाँ आकर अवरीष का यज्ञ सफल बनाया तथा रुचि मुनि के पुत्र को चिरजीवी बनाकर देवताओ के साथ (अपने लोक में) चला गया

“एक हजार वर्ष तक घोर तप करने के उपरान्त ब्रह्मा ने विश्वामित्र को दर्शन दिये, और बोले--तुम्हारी तपस्या सफल हुई तुम्हें ऋषित्व प्राप्त हो गया

“उनके चले जाने के पह्चात्‌ भी विश्वामित्र अत्यत निष्ठा के साथ तपस्या करने में ही सलग्न रहे तब कामरूप धारण करने में चतुर, कामदेव का कमनीय वाण ही अप्सरा के रूप में प्रकट हुआ हो, ऐसा दिखाई देनेवाला ललित यौवन-कला-विलास से युक्त मेनका (अ'सरा) जलक्रीडा करके वहाँ आई उसका जूडा शिथिल हो रहा था मनोहर नेत्र, स्तिग्ध कपोल, मत्रमुग्ध करनेवाला मुख, माणिक्य के-से ओठ, मधुर-मद मुस्कान, स्वर्ण कलश के समान कुच, सोलहो कलाओ से परिपूर्ण काति, स्वर्ण-चर्ण करनेवाले बाहुमूल, ललित रोमराजि, सिंह की-सी कटि, पुल्नाग के पुष्प के सदृश नाभि, गुरु नितव, तथा काम- विकारों को उद्गीपन करनेवाले उरुभाग से युक्त वह सुदरी विश्वामित्र के सामने उपस्थित हुई। अपने जरीर की काति को विकीर्ण करनेवाली उस अप्सरा को देखकर विश्वामित्र में काम-वासना प्रबल हो उठी उन्होने अपने ध्यान, मौन-न्रत तथा तपस्या को तिलाजहि देते हुए कहा--हे सुदरी, तुम मेरे साथ रतिक्रीडा में अनुरक्त हो जाओ ।” उनका आदेश स्वीकार करके मेनका ने दस वर्ष तक उस मुनि को रति-क्रीडा से परितृष्त किया तब विश्वामित्र ने मन-ही-मस विचार करके जान लिया कि मेरे तप में विघ्न डालने के लिए ही देवताओ ने इस सुदर रमणी को भेजा है इसलिए उन्होने उस कामिनी को देवलोक में भेज दिया और कामदेव को जीतने का विचार करके आप उत्तर पर्वत में कौशिकी नदी के तट पर निवास करते हुए एक सहस्न वर्ष तक बडी निष्ठा से घोर तपस्या करते रहे उनके कठोर तप से देवता भीत होकर ब्रह्मा के पास पहुँचे और बोले-- है कमलासन, विश्वामित्र अब आपसे महर्षि मान लिये जाने की अहँता (योग्यता) रखते हैं ब्रह्म भी विश्वामित्र के तप से सतुष्ट हुए और कौशिक के पास जाकर बोले--हे मुनि आज से तुम ससार में महषिं के रूप में विख्यात होगे ।” तब मुनिनाथ कौशिक ने कहा-- है कमलासन, जबतक आप सतृप्त होकर मुझे ब्रह्मर्षि घोषित नही करेंगे, तबतक में तपस्या करता ही रहूंगा ब्रह्मा ने कहा कि ऐसा ही करो” और वे अपने लोक को चले गय विद्वामित्र ने सकल्प कर लिया कि में ब्रह्मा को सतुप्त करके ब्रह्मर्षि का पद अवश्य प्राप्त करूँगा इस प्रकार दुढ निदपचय करके वे अन्न-जल त्यागकर ऊद्ध्वंवाहु हो,

4र्‌ रंगनाथ रायायण

वायु-मक्षण करते हुए ग्रीप्म ऋतु में, आश्रम के बाहर, तथा जाड़े में जल-कुडो में खडे रहकर अत्यत उग्र तप करने लगे

“इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये एक दिन इन्द्र ने रभा को देखकर कहा--है सुदरी, में तुमसे एक ऐसा कार कहूँगा, जिसमें देवताओं का हित निहित है किसी तरह तुम कौजिक को काम-पीडित करके उनके तप में विघ्न डालो तव रभा ने क्हा--हे देव, कौणिक क्रोब में मुझे झ्ञाप दे देंगे इसीका मुझे भय होता हैं ऐसे उम्र तप में लीन उस मुनि के पास पहुँचना क्‍या मेरे लिए सभव है ? हें शचीनाथ, में आपसे क्षमा चाहती हूँ | मे ऐसे महामूर्ख की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकती, आपके चरणो का सौगध खाकर कहती हूँ ऐसा मूर्ख कौन होगा, जो जान-वूककर आग में कूद पड़े ?*

यह सुतकर इन्द्र नें कहा--बदि तुम्हें इतना भय है, तो मनन्‍्मब और वसत भी तुम्हारे साथ जायेंगे, तुम जाओ ।' इन्द्र की इच्छा की अवहेलना कर सकते के कारण वह सुदरी, मन्मब तथा वसत की सहायता से कीर, कोकिल से युक्त हो, मयूर तथा सारिकाओं को साथ लेकर अपनी सखियो के साथ उस तपोवन में गई, जहाँ गाथि-पुत्र तप कर रहे थे

वहाँ पहुँचकर रभा मनोहर गति से लास्थ करने लगी कौणिक कछुद्ध होकर बोलें-- हैं पद्ममुखी, तुम दस हजार वर्ष तक पायाण वनकर पड़ी रहो उसके वाद एक श्रेष्ठ तपोनिधि ब्राह्मण के द्वारा नुम्हारा झाप-मोचन होगा

“मुनि के जाप देते ही रभा पापाणवत्र गई मन्मय भीत होकर वहाँ से भाग गया। शाप देने के कारण गाधथि-पुत्र ने देखा कि उनके तप का एक भाग नप्ठ हो गया है उन्होंने सोचा पहले काम-वासना के कारण मेरा तप नप्ट हो गया था और अब कोघ से मेने अपनी तपस्या खो दी इस प्रकार चिंतित होकर उन्होंने काम तथा क्रोध दोनों का त्यागकर निराह्ार तथा जितेन्द्रिय हो एक हजार वर्ष तक तप किया ब्रह्मा उनपर बहुत प्रसन्न हुए (तव विष्वामित्र ने) ब्रह्मर्षिं कहलाने की अदम्य इच्छा लिये उत्तर दिशा को छोडकर पूर्व दिया की ओर प्रस्थान किया और वहाँ इन्द्र के असस्य विध्तों से विचलित होते हुए अठल भाव से तप किया उसके परचात्‌ सिद्धाश्रम में पहुँचकर वहीं घोर तप करते हुए रहने लगे

“इस प्रकार श्रेप्ठ तपोनिप्ठा में एक सहस्न वर्ष बीत गये विद्वामित्र तपस्या की पूत्ति के पद्चात्‌ पारण करने के लिए नींवार-धान्य एकत्र करके ले आये, उसे पकाया और देवताओं को जरपंण करने के उपरांत भोजन करने ही वाले थे कि इन्द्र एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप घरकर वहाँ आया जौर भोजन माँगा। विब्वामित्र ने सारा भोजन उस ब्राह्मण को दें दिया इन्द्र नें विना एक दाना छोडें सव खा लिया | इस पर विव्वामित्र फिर एक हजार साल तक अविचल निष्ठा से तपस्या करते रहे

“इस घोर तपस्या के फलस्वरूप उनके सिर से घुआँ निकलकर सारें लोक में फैल गया सभी समुद्र छ्ुब्ध हो गये पृथ्वी काँगने लगी कुलपर्वत थर्रा उठे विद्याएँ उलक गई अमर, गवर्व तथा सभी मुनि ब्रह्मा के पास जाकर बोले--हे कमलनर्भ॑,

बा/लकाड ९३

कौशिक बडे उत्साह से उग्र तपकर रहे हे उनका मनोरथ पूर्ण करके यदि उनकी तपस्या को वद नही करायेंगे, तो उस पुण्यात्मा विद्वामित्र के तप से उत्पन्न अग्नि से सभी लोक भस्म हो जायेंगे ।!

“उनकी बातें सुनकर ब्रह्मा उनको साथ लिये हुए विश्वामित्र के पास आये और बोले--- है कौशिक सुनो अब इस उग्र तप की आवश्यकता नहीं है | आज से तुम ब्रह्मिं हो गये ।'

“तब कौशिक ने ब्रह्मा आदि देवताओ को देखकर बडी भक्ति तथा आइचये के साथ कहा--यदि मेने सच ही ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त कर लिया है, तो ब्रह्मा के पुत्र, चिर- पुण्यात्मा, लोक-पावन वसिष्ठ आकर मुझे ब्रह्मषिं कहें | तभी में विश्वास करूँगा ।'

“तब ब्रह्मा तथा देवताओ की प्रार्थना पर वसिष्ठ वहाँ आये और बोलें---अपने उग्र तप से तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें कोई सदेह नहीं हैं | तृम प्रसन्न होकर जा सकते हो ।' तब विश्वामित्र ने वडी भक्ति से वसिष्ठ की पूजा की सभी देवता विदश्वामित्र को अज्ञीववादि देकर देवलोक को चले गये

“विश्वामित्र की महिमा इन अद्भुत कार्यो से आपको विदित होगी ।॥” शतानद के इस प्रफार कहने पर राम, लक्ष्मण, जनक तथा उनके सभासद अत्यत प्रसन्न हुए (इतने में ) सूर्यास्त हुआ, मानों सूर्य रसातल में यह समाचार देने जा रहा हो कि कल राघव जनक

पे

के निवास में रखे हुए जिव-धतृष को तोडकर सीता का पाणि-ग्रहण करेंगे

जनक को विदा करके गाधथि-पुत्र ने राम तथा लक्ष्मण के साथ अपने निवास में बडे आनद से रात विताई सूर्योदय होते ही स्वान, पूजा आदि से निवृत्त होकर विद्यामित्र राम के साथ जनक के यहाँ गये और वोलें--हे जनक, कोटिसूये-प्रभा-समच्वित, पुण्य-चरित, अनन्य-गोचर तथा विश्वमृत्ति आपके यहाँ स्थित शिव-धनुप के दर्शनार्थ आये हें आप कृपया उस धनुष को मंगावें ।'

३२ शिव-धनुष का वृत्तांत

तव जनक बड़े आइचर्य-चकित होकर बोले--हे नियतात्मा, शिवजी ने अवकासुर, भस्मासुर आदि राक्षसों को इसी घन्‌ष से मारा था पूर्व काल में उसी घनुष से उन्होने भयकर राक्षसों का सहार किया था शकर ने अत्यन्त क्रोध करके इसी धनुष से त्रिपुर- दुर्गों को जीता था, इसी घनुष से उन्होने देवेन्द्र आदि देवताओं को भगाकर दक्ष के यज्ञ का ध्वस किया था शिवजी ने हमारे पितामह नीति-सपन्न निमि चक्रवर्त्ती से छह पीढी पूर्व के हमारे पूर्वज देवरात को यह घनुष सौपा तब से यह अतुल शक्ति-सपन्न धनुष हमारे घर में है | मैने यज्ञ करने का सकलप करके भूमि को शुद्ध करने के लिए जब उसमें हल चलाया, तो मुझे हल की फाल-रेखा में एक मजूषा (पिटारी) मिली। हर्ष-पुलकित हो जब मैने उसे खोला, तो मेरे आइचर्य की सीमा रही उसमें एक अत्यत प्रभा-समन्वित कन्या निकली मेने उसका नाम सीता रखा और उसे अपनी पुत्री मानकर बड़े प्रेस से उसका लालन-पालन करने लगा वसत ऋतु में वढनेवाली लता के समान तथा दिन-ति- दिन वृद्धि-पानेवाली चद्रकला के सदृश वह कन्या बढने लगी क्रमश यौवनावस्था को प्राप्त

8 रंग्नाथ ए्यशयर

हो गई यह देखकर इस पृथ्वी के कई नरेशो ने उस कन्या के साथ विवाह करने की प्रार्थना की तब मेने उन से कहा--इस चन्द्रमुखी को प्राप्त करने के लिए एक कन्या- शुल्क नियत है (वह शुल्क) यह जिव-घनुष हैं | जो नरेंश इस घनुष पर शत्यचा चढाकर अपने भुज-वल का परिचय देगा, उसी को में अपनी पुत्री बडें हर्ष से दूंगा बहुत-से राजा आये, किन्तु कितने ही राजा उस घनुष को उठाने में भी असमर्थ होने के कारण लज्जा से अपना सिर भी उठा सके इसलिए उन राजाओं ने सोचा--पुत्री को देने का वचन देकर, कोदण्ड का दुस्साध्य प्रतिवव लगाकर जनक ने हमें अच्छी तरह भ्रम में डाल दिया हैं हम उन्हें युद्ध में परास्त करके उनसे प्रतिशोध लेंगे इस प्रकार सोचकर वे अपनी विशाल सेना के साथ एक वर्ष तक हमारे किले पर घेरा डाले रहे जो अन्न तथा खाद्य-सामग्री हमने पूर्व से किले में सचित करके रखी थी, सब समाप्त हो गई अत. मेने मन में विचार करके देवताओं की प्रार्थना की उनकी हपा से प्राप्त चतुरगिनी सेना के साथ मेने झत्रु-लेना पर आक्रमण किया इस सेना का सामना कर सकते के कारण कुछ लोग भीत होकर भाग खडे हुए तथा कुछ मेरे साथ घोर युद्ध करके हार गये और तितर-वितर हो गये यदि राम अपनी आइचयेजनक शवित से उस शिव- धनुप का सवान कर सकें, तो में अपनी पुत्री का विवाह उनके साथ कर दूँगा ।”

३३ शिव-धनुर्भग

इसके पच्चात्‌ जनक ने घतुष की पेंटी ले आने के लिए दस हजार वलिष्ठ सेवकों को भेजा वह लोहे की पेटी वहुत ही विज्ञाल तथा आठ पहियो से युक्त थी वें सभी वलवान्‌ उस पेटी को अपना सारा वल लगाकर इस प्रकार खीचकर लाने लगे, मानो मेरु पर्वेत को ही लिये रहे हो यह देखकर जनक के अन्त पुर के परिचारक तथा परि- चारिकाएँ, जानकी, उर्मिला तथा जनक की पत्नी के निकट जाकर वोली--दिवियो, हमारा एक निवेदन सुनें हमारी राज-सभा में गराधि-पुत्र कौणिक के साथ दो आजानुवाहु, देवों तया गरधर्वों से भी अधिक तेजस्वी, दो उत्तम नर-रत्नो को आया हुआ देखकर महाराज जनक ने भूुनि से प्रइन किया कि ये कौन है ? तब कौशिक ने अत्यन्त हर्ष से कहा--हें राजन, ये दशरथ के पुत्र हे जिव-घनुष पर प्रत्यचा चढाने के लिए यहाँ आये हे इसलिए आप योग्य व्यक्तियो को भेजकर धनुष को मेँगवाइए ।” तब राजा ने अपने मत्रियो को वुलाकर धनुष को लाने के लिए भेजा है | हम वह दृष्य गवाक्ष से देख सकती हे आप भी ज्ञीत्र चलकर देखिए ।”

परिचारिकाएँ जब राम के कुल, रूप, शौय तथा गुणों का वर्णन कर रही थी, तव सीता को ऐसा भान हो रहा था, मानो उनके कानो में सृधा की वर्षा हो रही हो उन्हें रोमाच हो जाया उन्हें प्रीति तथा भय का अनुभव होने लगा वे सिर भाकाये खड़ी रही लज्जा से अभिभूत उस सुन्दरी को चुपचाप खडी देखकर सखियाँ उनकी परि- चर्या करने लगी ग्रुलाव-जल में कुकुम घोलकर एक ने उनके कपोलो पर सुन्दर ढग से “मकरिका-पत्र' की रचना की (चित्र बनाये) दूसरी ने जवादियुक्त चदन का लेप किया एक दूसरी परिचारिका ने माथे पर कस्तूरी का तिलक लगाया और एक उनके सामने

बालकेडें, शी

दर्पण लिये खडी रही एक युवती ने उनके केशो को कधा करके उनका जूडा बाँध दिया, तो अन्य एक ने उसे निराले ढग से पुष्पो से अलक्ृत कर दिया एक रमणी ने उन्हें सृगधित बीडा दिया किसी ने उनकी कटि-तट पर किकिणियुकत करघनी बाँधी, तो किसी सुन्दरी ने उनके कुचों पर डोलनेवाले मोतियो के हार पहनाये एक सखी ने चद्र-काति- सम धवल वस्त्र उन्हें उत्तम ढग से पहनाये इस प्रकार सभी सखियाँ सीता को एक स्वर्ण- पीठ पर विठाकर उनका अलकरण कर रही थी अलकरण समाप्त होते ही जनक की पत्नी उस कल्याणी राजकुमारी को साथ लेकर कनक-सौध के गवाक्ष के निकट आई | उन सब रमणियो के मन में सूर्यवश्ष में उत्पन्न राघव को कब देखेंगे ऐसा कुतृहल भरा था उन्होंने गवाक्ष से लोकाभिराम दिव्य धाम, अत्यत रूपवान्‌ू, विष्णु के समान तेजस्वी, धनुर्धर, प्रत्यचा के चिह्न से अकित कर-कमलवाले राम को देखा उनको देखकर सखियाँ मन-ही-मन सोचने लगी, रूप और रण में ये अद्वितीय है ये विष्णु के अशज हे और राजपुत्रो के रूप में जन्मे हें जानकी रामचन्द्र के लिए योग्य हे और उमिला सौमित्र के लिए इस प्रकार सोचती हुईं वे अत्यन्त आसक्ति के साथ सभा की ओर देखती रही

किक

इन्द्रसभा के समान सुशोभित उस राज-सभा में धनुष की पेटी लाई गई तब महाराज जनक ने शुभमूत्ति गाधि-पुत्र को देखकर कहा--हे मुनि, किन्नर, यक्ष, गधर्व, देवता, पन्नग, तथा राक्षस आवियो में से कोई इस घनुष की डोरी को चढा सका फिर नरो की कौन कहे ? यह धनुष आप राम-लक्ष््ण को दिखाइए तब मुनि ने रामचद्र की ओर देखकर कहा--हे रघुवश के वीर, इस महान्‌ धनुष को उठाकर उसकी प्रयचा चढा दो आदिवराह का अवतार लेकर समस्त भूतल को सहज ही उठाकर अपनी शक्ति का परिचय देनेवाले तुम्हारे लिए यह धनुष क्‍या वस्तु है ?

इस प्रकार मुनि का आदेश प्राप्त करके राम, लक्ष्मण